गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउमग रही राधा तन-मनमें। विलस रही मृदु सुमन-शयनमें॥ बालबोधिनी-प्रस्तुत श्लोकमें कवि जयदेव वर्णन करते हैं कि अब श्रीराधा और श्रीमाधवमें चिरकालसे आकांक्षित उनका अतिशय प्रिय सुरत प्रारम्भ हुआ। उस रतिक्रीड़ाके आरम्भमें पुलकावलीके प्रस्फुरणसे ही बाधा उत्पन्न होती है। आलिङ्गनके आरम्भमें सात्त्विक रोमाञ्चका होना युक्तिसंगत ही है। रोमाञ्चसे पूर्णालिङ्गनमें बाधा होना स्वाभाविक ही है। काम-क्रीड़ाके लिए विलोकन-अवलोकन करने पर पलकोंका गिरना भी बाधा प्रतीत हुई। अभिप्राय विशेषसे देखनेके कारण पलकोंका गिरना भी असहनीय होने लगा। अधर-सुधा पान करते समय काम-कथाएँ कहना भी अन्तराय प्रतीत हुआ। अधरपानमें प्रियालाप भी सहनीय नहीं होता है। रति-प्रियालापसे अतिशय रुचिर अधरपान लगता है। काम-कलाओंसे पूर्ण युद्धमें आनन्दकी प्राप्ति भी बाधा ही प्रतीत हुई। प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है, यथासंख्य अलंकार है, संभोग नामका शृङ्गार रस है, प्रस्तुत श्लोककी भूमिका चन्द्रहास नामक चौबीसवें प्रबन्धकी है।
दोर्भ्यां संयमितः पयोधर-भरेणापीड़ितः पाणिजै राविद्धो दशनैः क्षताधरपुटः श्रोणीतटेनाहतः। हस्तेनानमितः कचेऽधरसुधापानेन सम्मोहितः कान्तः कामपि तृप्तिमाप तदहो कामस्य वामा गतिः ॥२॥ अन्वय-न केवलं प्रत्यूह एव बन्धनादिकमपि क्रीड़ारम्भको वभूवेत्याह]–कान्तः (श्रीकृष्णः) दोर्भ्यां (भूजाभ्यां) संयमितः (नियन्त्रितः) पयोधरभरेण (पयोधरयोः स्तनयोः भरेण) आपीड़ितः (नितरां पीड़ितः) पाणिजैः (नखैः) आविद्धः) विक्षतः) दशनैः (दन्तैः) क्षताधरपुटः (क्षतम् अधरपुटं यस्य तादृशः)