गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७६ श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—जब श्रीराधा निकुंज-लता-गृहमें केलि-विलास शय्याके समीप पहुँचीं तो सखियाँ स्वयंको बाधक मानकर विविध प्रकारके बहाने बनाकर चली गयीं। श्रीकृष्णने श्रीराधाको मनमें अत्यधिक लज्जित होते हुए देखा। कामकी परवशताके वशीभूत हो मन्द-मन्द मुस्कराहट श्रीराधाके होठों पर खेल रही थी, उत्सुकतासे पूर्ण पल्लवोंकी सेजकी ओर देखे जा रही थीं, कुछ बोल नहीं पा रही थीं, मन अनुरागसे भरा हुआ था, नवीन पल्लवों द्वारा रचित शय्या ही उनका अभिप्राय-सर्वस्व हो रहा था। श्रीराधाकी ऐसी मानसिक स्थितिको देखकर श्रीकृष्णने सानुराग उनसे कहा। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी छन्द है। इस सर्गमें स्वाधीनभर्तृका नायिका वर्णित हुई है। शय्याका पुनः-पुनरावलोकन श्रीराधाकी संभोगेच्छाका निदर्शन करता है। त्रयोविंश सन्दर्भ गीतम् ॥२३॥ विभासरागेकतालीतालाभ्यां गीयते ॥प्रबन्धः ॥२३॥ गीतगोविन्द काव्यके इस २३वें प्रबन्धको विलास राग तथा एकताली तालसे गाया जाता है। किसलय-शयन-तले कुरु कामिनि! चरण-नलिन-विनिवेशम्। तव पद-पल्लव-वैरि पराभवमिदमनुभवतु सुवेशम् ॥१॥ क्षणमधुना नारायणमनुगतमनुसर राधिके! ध्रुवपदम् अन्वय—अयि कामिनि [मत्पूजा त्वय्यस्तीति कामिनीशब्दः प्रयुक्तः] किशलय-शयन-तले (नवपल्लवशय्यायां) चरण-नलिन- विनिवेशं (चरण-कमलयोर्विन्यासं) कुरु [पूजायां प्रथमाङ्गमासनम् अङ्गीकुरु] इदं (तरुण-पल्लवशयनं) सुवेशं (तत्तद्गुणैः शोभमानमपि) तव पद-पल्लव-वैरि (पदपल्लवस्य शत्रुभूतम्