गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३७१ सानन्दं नन्दसूनुर्दिशतु मितपरं सम्मदं मन्दमन्दं राधामाधाय बाह्रोर्विवरमनु दृढं पीडयन्प्रीतियोगात्। तुङ्गौ तस्या उरोजावतनु वरतनोर्निर्गतौ मा स्म भूतां पृष्ठं निर्भिद्य तस्माद्बहिरिति वलितग्रीवमालोकयन्वः ॥३॥ अनुवाद—नन्दपुत्र श्रीकृष्णने श्रीराधाको मन्द-मन्द अपनी बाहोंके अन्तरालमें रखा, प्रीतिपूर्वक उनका गाढ़ आलिङ्गन किया। पुनः ग्रीवाको घुमाकर ऐसे देखने लगे मानो श्रीराधाके उन्नत उरोज उनकी पीठको भेदकर बाहर न निकल जायें—ऐसे श्रीकृष्ण सभीका आनन्द विधान करें। बालबोधिनी—नन्दपुत्र श्रीगोपाल एवं श्रीराधाका मिलन हुआ। इस मिलनसे श्रीकृष्ण अतिशय आनन्दसे परिपूर्ण हो गये और धीरे-धीरे श्रीराधाको अपनी बाहोंके विवरमें भर लिया। श्रीराधा शिरीष कुसुमोंसे भी बहुत अधिक सुकोमल हैं, इसलिए उन्हें बहुत कोमलताके साथ गले लगाया। पुनः अत्यन्त प्रीतिपूर्वक श्रीराधाका गाढ़ आलिङ्गन किया। यहाँ ‘दृढं पीडयन्’ इस पदसे श्रीकृष्णका अतिशय अनुराग प्रकट हो रहा है। पुनः अपनी ग्रीवाको वलायित करके उन्हें देखने लगे कि कहीं श्रीराधाके तुङ्ग उरोज उनकी पीठको भेदकर बाहर न निकल जायें। इस प्रसंगमें श्रीराधाके उरोज पृष्ठका काठिन्य एवं तीक्ष्णत्व अभिव्यक्त हो रहा है। यहाँ श्रीराधाकी प्राकृतिक रूपसे अति रमणीयता एवं सौकुमार्यता निदर्शित हुई है—वे फूलोंसे भी अधिक कोमल है। प्रस्तुत श्लोकमें शृङ्गार रस, वैदर्भी रीति एवं प्रसाद गुण है। जयश्री-विन्यस्तैर्महित इव मन्दार कुसुमैः स्वयं सिन्दूरेण द्विप-रण-मुदा मुद्रित इव। भुजापीड़-क्रीड़ाहत-कुवलयापीड-करिणः प्रकीर्णासृग्बिन्दुर्जयति भुजदण्डो मुरजितः ॥४॥