गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७२ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—[तत्र तया अभिलाष-विशेषेण आलोच्यमानं श्रीकृष्णस्य भुजदण्डं स्मरन् तत्सौन्दर्य वर्णयति कविः]—भूजापीड- क्रीड़ाहत-कुवलयापीड़करिणः (भूजापीडेन बाहुभ्यां सम्यक् पीड़नेन क्रीड़या अवलीलया हतस्य कुवलयापीड़ाख्यस्य कंसकरिणः) प्रकीर्णासृग्विन्दुः (प्रकीर्णाः विक्षिप्ता लग्ना इति यावत् असृग्विन्दवः शोणितविन्दवः यत्र तादृशः) जयश्रीविन्यस्तैः (जयश्रिया विजयलक्ष्म्या विन्यस्तैः अर्पितैः) मन्दा-कुसुमैः (देवतरुपुष्पैः) महितः (अर्चितः) इव; [जयश्रीपूजितत्वेन हेतुना उत्प्रेक्षान्तरमाह]—द्विप-रण-मुदा (द्विपेण करिणा सह यः रणः संग्रामः तेन मुदा हर्षेण) स्वयं सिन्दूरेण मुद्रितः (राजितः) इव [एतादृशः] मुरजितः (मुरारेः श्रीहरेः) भुजदण्डः जयति [अतएव विप्रलम्भानन्तरप्राप्तानन्देन सहितो गोविन्दो यत्र सोऽयम् एकादशः सर्गः) ॥४॥ अनुवाद—बाहु-युद्धमें कुवलयापीड़ नामक हस्तीको मार देनेसे रुधिर (रक्त) बिन्दुओंसे सुशोभित, हाथीके साथ युद्धके उल्लासमें सिन्दूरसे चिह्नित, विजय-श्री द्वारा मन्दार पुष्पोंसे विभूषित मुरजित्कृष्णका विशाल भुजदण्ड जयजयकारको प्राप्त हो। बालबोधिनी—कवि जयदेव कहते हैं कि श्रीकृष्णका मंगलकारी भुजदण्ड आपका कल्याण करे, उनकी भुजाएँ सर्वोत्कृष्ट हैं, जगत-वन्दनीय हैं। वे मुरजित हैं। उन्होंने अपनी दण्डाकार भुजाओंसे मुर नामक दैत्यको परास्त कर दिया था। अपने इसी प्रचण्ड भुजदण्डकी क्रीड़ासे उन्होंने कंसके कुवलयापीड़ नामक हाथीको मार डाला था। उसको मारनेसे जो रक्तकी बूंदें उनकी भुजाओंपर पड़ गई थीं, उन्हें देखकर ऐसा लगता था मानो विजयलक्ष्मीने स्वयं ही पारिजातके फूलोंसे उनकी पूजा की हो। वे स्वयं भी उस हाथीको मारकर अत्यन्त प्रसन्न हुए थे। उनकी इसी प्रसन्नताने ही सिन्दूरका रूप धारण कर लिया था। ऐसा