भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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एकादशः सर्गः-सामोद-दामोदरः ३७३ कहा जाता है कि उन्हें हाथीके उन्नत कुंभको देखकर श्रीराधाका स्मरण हो आया था। रक्त बिन्दुओंस सुशोभित उनकी भुजाएँ आनन्दरूपी सिन्दूरसे अलंकृत हो रही थीं अथवा विजयश्री द्वारा अर्पित किये गये मन्दार पुष्पोंसे समलंकृत हो रही थीं-ऐसा प्रचण्ड भुजदण्ड आप सबका मंगल-विधान करे। हे श्रीकृष्णके भुजदण्ड! आपकी जय हो, जय हो। प्रस्तुत श्लोकमें शिखरिणी छन्द है। अनुप्रास और उत्प्रेक्षा अलंकारकी संसृष्टि है। पाञ्चाली रीति, आरभटीवृत्ति तथा वीर रस है। सौन्दर्यैकनिधेरनङ्ग-ललना-लावण्य-लीलाजुषो राधाया हृदि पल्वले मनसिज क्रीड़ैकरङ्गस्थले रम्योरोजसरोजखेलनरसिकत्वादात्मनः ख्यापय- न्ध्यातुर्मानसराजहंसनिभतां देयान्मुकुन्दो मुदम् ॥५॥ इति श्रीजयदेवकृतौ श्रीगीतगोविन्दे राधिकामिलने सानन्द- दामोदरो-नामैकादशः सर्गः। अनुवाद-सौन्दर्यकी निधि, अनङ्गललना रतिके सदृश लावण्यमयी श्रीराधाके हृदय-सरोवरके मनोहर रङ्ग-स्थल स्तन-कमल पर क्रीड़ापरायण हुए एकाग्रचित्त, अपना ध्यान करने वालोंके मानस राजहंसत्वको ख्यापित करनेवाले श्रीमुकुन्द आपको आनन्द प्रदान करें। बालबोधिनी-श्रीमुकुन्द जो सभी मनुष्योंको क्लेशोंसे मुक्त कर उन्हें आनन्द प्रदान करते हैं। प्रस्तुत श्लोकमें पाठक तथा श्रोताओंको आशीर्वाद देते हुए कवि शिरोमणि जयदेवका कथन है कि श्रीराधा ही समग्र सौन्दर्यकी एकमात्र निधि हैं, उनका वक्षःस्थल श्रीकृष्णकी क्रीड़ाभूमि है। कविने श्रीराधाके वक्षःस्थलकी उपमा सरोवरसे की है। जिस तरह