गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७० श्रीगीतगोविन्दम् सुन्दरं-यथास्यात् तथा; यद्वा स्मरशरसमाहूतसुभगमिति प्रियास्य- मित्यस्य विशेषणम्) प्रियास्यं (श्रीकृष्णवदनं) पश्यन्त्याः मृगदृशः (मृगाक्ष्याः श्रीराधायाः) लज्जापि सलज्जा [सती] दूरं व्यगमदिव (विशेषेण अगमदिव) [सखीसमक्षं श्रीराधा सलज्जा आसीत् अधुना तासां कुञ्जभवनात् बहिर्गमनेन सा लज्जां विहाय यथाभिलषितं विजहार इत्यर्थः] ॥२॥ अनुवाद—श्रीराधाकी सुखाभिलाषिणी सहचरियाँ कुरङ्गनयना राधिकाको केशवकी शय्या पर उपवेशन करते देख सावधानीसे कपट-कण्डूयनका बहाना करती हुई हास्य संवरण पूर्वक निकुंजगृहसे बाहर चली गयीं, तब स्मरपरवशा श्रीराधा अपने प्रियतम श्रीकृष्णके मुखमण्डलका मनोहर कटाक्ष निक्षेपके द्वारा अवलोकन करने लगीं और उनकी लज्जा भी सलज्जभावसे वहाँसे दूर चली गयी। बालबोधिनी—ज्यों ही श्रीराधाने लता-निकुंजमें प्रवेश किया, सेज पर आसीन हुईं तभी सावधान सखियाँ समझ गईं कि अब उनके यहाँ रुकनेका कोई औचित्य ही नहीं है, उनकी उपस्थिति श्रीराधामाधवके मधुर मिलनमें बाधक बन सकती है। वे चतुर सखियाँ बहाना बनाने लगीं, कान आदि खुजलाने लगीं और मुस्कराते हुए लता-निकुंजसे बाहर चली गयीं। फूलोंकी शैया पर विराजमान श्रीराधा कामदेवके बाणोंसे वशीभूत हो श्रीकृष्णको ऐसे देखने लगीं मानो उन्हें पुनः स्मरके शरोंसे बींध रही हों। श्रीराधाकी ऐसी प्रगल्भता देखकर लता भी लज्जित हो गयीं और उस मृगनयनी श्रीराधाको छोड़कर सखियोंके समान स्वयं भी दूर चली गयीं। अब इस रति-व्यापारमें लाज भी कहाँ रहेगी, देखते-देखते श्रीराधाने श्रीकृष्णको प्राप्त कर लिया। प्रस्तुत श्लोकमें रसवद् अलंकार एवं शिखरिणी छन्द है।