गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३६९ बालबोधिनी—चिरकालके विरहके पश्चात् जब श्रीराधाका श्रीकृष्णके साथ मिलन हुआ तो श्रीराधाके नेत्र अपाङ्गों (कटाक्षपातों) का अतिक्रमण करके कानों तक पहुँच गये। इसी श्रमसे मानो उनके नेत्रोंमें पसीना आनन्दाश्रुके रूपमें जलधाराके समान बहने लगा। इतने समय बाद प्रियतमको देखा तो हर्ष स्थिर न रह सका, आँखोंसे छलछलाने लगा। रतिक्रीड़ाके आस्वादनसे आँखें पसीना-पसीना हो गयीं। बड़ी-बड़ी आँखें कानों तक पहुँचना चाहती थीं और इसी प्रयासमें उनमें शैथिल्य आ गया। शिथिलताके कारण वे नमित हो गयीं, झुक गयीं, जलमय हो गयीं। नेत्र-प्रान्तका अतिक्रमण करके श्रवण पथ तक जानेके प्रयासमें स्वेद-अम्बु छलछलाया। नेत्रोंमें प्रिय-दर्शनकी आकांक्षासे अति चंचलत्व तो हो रहा था। श्रीराधाका सात्विक भाव प्रकाशित हुआ है। प्रस्तुत श्लोकमें उपमा अलंकार है और शिखरिणी छंद है। भजन्त्यास्तल्पान्तं कृत-कपट-कण्डूति-पिहित- स्मितं याते गेहाद् बहिरबहिताली-परिजने। प्रियास्यं पश्यन्त्याः स्मरशर-समाहूत-सुभगं सलज्जा लज्जापि व्यगमदिव दूरं मृगदृशः ॥२॥ अन्वय—[ततः शय्यान्तिकं गतायास्तस्याः प्रियदर्शनावेशेन लज्जा विगलिता इत्याह]—कृत-कपट-कण्डूति-पिहित-स्मितं (कृता या कपटकण्डूतिः छलकण्डुयनं तया पिहितम् आच्छादितं स्मितम् ईषद्धास्यं यथा तथा) अवहिताली-परिजने (तत्सुखानुकूल्ये अवहितः सावधानः यः आलीपरिजनः सखीजनः तस्मिन्) गेहात् (निकुञ्जभवनात्) बहिः याते (प्रस्थिते) [सति] तल्पान्तं (शय्यान्तिकं) भजन्त्याः (गच्छन्त्याः) स्मरशरसमाहूतसुभगं (स्मरशरेण समाहूतं यत् हास्यकटाक्षादिकं तेन सुभगं