गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३६५ [हरिं सा ददर्श] [अत्र ललाटस्य तिमिरेण, तिलकस्य च इन्दुमण्डलेन साम्यम्] ॥६॥ अनुवाद—कुसुमोंसे अलंकृत श्रीकृष्णका केश-पाश चन्द्रकिरणोंसे अनुरञ्जित होकर नवजलधर मालाके समान प्रतीत हो रहा है, ललाट पर धारण किया चन्दनतिलक इस प्रकार शोभा प्राप्त कर रहा है, मानो निर्मल आकाशमें अन्धकारके मध्य पूर्ण विधुमण्डल उदित हुआ हो। पद्यानुवाद— घनमें इंदु किरण सम सज्जित सुन्दर कुसुमित केश, तिमिरोदित विधु मण्डल मानो मलयज-तिलक-निवेश। हुलस उठी राधा मधुवनमें। विलस उठी राधा अति मनमें॥ बालबोधिनी—श्रीकृष्णकी सुन्दर अलकावली पुष्पोंसे समलंकृत हो रही थी। उन प्रफुल्लित समुज्ज्वलित पुष्पोंकी शोभा ऐसी लग रही थी मानो काली-काली घटाओंके मध्यमें चन्द्रमा छिप रहा हो। अथवा उन काले केशोंके मध्यमें चन्द्रकिरण व्याप्त हो रही है अथवा बादलोंके बीचमेंसे चन्द्रमा उदित हो रहा हो। छोटे-छोटे बादलोंके बीचमें जहाँ चाँदनी आलोकित होती है वहाँ फूलोंके गुम्फन स्पष्ट दिखायी देते हैं। जहाँ नहीं होती, वे कजरारे बने रहते हैं। श्रीकृष्णके श्यामवर्णके मस्तक पर मलयगिरिका चन्दनका तिलक ऐसी शोभा दे रहा था मानो अंधकारके बीच पूर्ण चन्द्रमण्डल उदित हुआ हो। श्रीराधा मिलनसे श्रीकृष्णका परिधान एवं शृङ्गार गौरवर्ण हो गया है, श्रीराधामय हो गया है। ऐसे गौरमय श्रीश्यामसुन्दरको श्रीराधा देखती रहीं। विपुल-पुलक-भर-दन्तुरितं रति-केलि-कलाभिरधीरम्। मणिगण-किरण-समूह-समुज्ज्वल-भूषण-सुभग-शरीरम् ॥ हरि.... ॥७॥