गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६६ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—विपुल-पुलक-भर-दन्तुरितं (विपुलो महान् यः पुलकभरः रोमाञ्चातिशयः तेन दन्तुरितं विषमीकृतं क्वचिदुन्नतं क्वचिच्चानतमिति यावत्) [अतएव तद्दर्शनात् हृदि उद्गतैः] रतिकेलिकलाभिः (सुरतक्रीड़ाविलासैः) अधीरं (व्याकुलं) [तथाच] मणिगण-किरण-समूह-समुज्ज्वल-भूषण-सुभग-शरीरम् (मणिगणानां रत्नसमूहानां परिहितानामित्यर्थः किरणसमूहैः समुज्ज्वलानि भूषणानि अलङ्काराः तैः सुभगं सुन्दरं शरीरं यस्य तादृशं) [हरिं सा ददर्श इति शेषः] ॥७॥ अनुवाद—श्रीराधा-अवलोकनसे श्रीकृष्णका शरीर विपुल पुलकोंसे रोमाञ्चित हो रहा है, रति-केलि-विषयक विविध कथा मनमें समुदित होनेसे वे अति अधीर हो रहे हैं, श्रीविग्रह मणियोंकी किरणोंसे समुज्ज्वलित होकर अतीव मनोहर द्युतिको धारण कर रहा है। पद्यानुवाद— विपुल पलक भर ललक केलि रति दिखते अधिक अधीर। मणि गण किरण समूह समुज्ज्वल भूषण सुभग शरीर॥ बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णको देख रही हैं कि उनका सम्पूर्ण शरीर पुलकित हो रहा है, अद्भुत रोमांचसे युक्त हो रहा है, रति-क्रीड़ाके लिए वे एक विचित्र आकुल प्रत्याशासे अधीर तो हो ही रहे थे, श्रीराधा-मिलनसे तो रति-केलि-कलामें उपयोगी चुम्बनादि क्रियाओंमें व्यस्त होनेके कारण और भी चंचल हो उठे। मणिमय भूषणोंकी कान्तिसे देदीप्यमान होनेके कारण उनका श्रीविग्रह अत्यधिक सुशोभित हो रहा था, जिन आभूषणोंको उन्होंने धारण कर रखा था, उन आभूषणोंमें लगी हुई मणियोंके किरणसमूहसे सभी आभूषण चमचमा रहे थे—ऐसे मणिमय अलंकारोंसे सुन्दर वपुवाले श्रीकृष्णको श्रीराधाने देखा।