भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३६७ श्रीजयदेवकवि-भणित-विभव-द्विगुणीकृत-भूषणभारम्। प्रणमत हृदि विनिधाय हरिं सुचिरं सुकृतोदय-सारम् ॥ हरि.... ॥८ ॥ अन्वय—[भोः साधवः] श्रीजयदेव-भणित-विभव-द्विगुणीकृत- भूषण-भारं श्रीजयदेवस्य भणितमेव विभवः समृद्धिः तेन द्विगुणीकृतः नितरां परिवर्द्धित इत्यर्थः भूषणस्य अलङ्कारस्य भारः गौरवं यत्र तादृशं) [यैः स्वयमलंकृतं ते अलङ्काराः जयदेवस्य उपमादि-वाग्विलासैः द्विगुणीकृता इत्यर्थः] [तथा] सुकृतोदयसारम् (सुकृतस्य पुण्यविशेषस्य य उदय आविर्भावः फलमितियावत् तस्य सारभूतं) हरिं सुचिरं [यथा तथा] हृदि (चित्तमध्ये) विनिधाय (भक्तिभरेण स्थापयित्वा) प्रणमत ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कवि द्वारा विरचित विविध अलंकृत वाक्यरूप अलंकारसे जिनके परिहित भूषण-राशिकी शोभा द्विगुणित हो गयी है, हे रसिक भक्तों ! कृत-पुण्योंके फलस्वरूप उन श्रीकृष्णको हृदयमें यत्नके साथ धारण कर आप उन्हें प्रणाम करें। पद्यानुवाद— श्रीजयदेवकथित हरि-वर्णन द्विगुणित भूषण भार, हो हियमें अंकित जब जनके उदित पुण्यका सार। हुलस उठी राधा मधुवनमें। विलस रही राधा उपवनमें ॥ बालबोधिनी—प्रस्तुत प्रबन्धके इस आठवें पद्यके द्वारा कवि जयदेव कहते हैं कि हे भक्तजनों ! कवि-शिरोमणि जयदेवकी कविताके कारण श्रीकृष्णके आभूषणोंकी शोभा द्विगुणित हो गयी है अथवा जयदेव कवि द्वारा कथित श्रीकृष्णका वैभव द्विगुणित अलंकारोंसे युक्त है। चिरकालसे सञ्चित पुण्योदयके तत्त्वरूप श्रीकृष्णको चित्तमें धारण कर उन्हें प्रणाम कीजिए। बड़े पुण्योंसे ऐसे श्रीकृष्ण मनमें उदित होते हैं, वे श्रीराधाके संगसे जुड़कर द्विगुणित भूषणके भारसे