गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
एकादशः सर्गः - सामोद-दामोदरः ३५३ बालबोधिनी - सखी कहती है - राधे! तुम्हारी जाँघें आलस्ययुक्त एवं स्थूल हैं और यह निकुंज भी अति विस्तृत विविध लताओंसे एवं पल्लवोंसे रचित है, इन लताओंसे और भी नये-नये पल्लव प्रस्फुटित हुए हैं जिनसे यह लतानिकुञ्ज और भी अधिक घना हो गया है। अतः इस कोमल-पत्र-कुंजमें अपने प्रियतम श्रीकृष्णके साथ चिरकाल पर्यन्त विलास करती रहो। मधु-मुदित-मधुपकुल-कलित-रावे। विलस मदन-रस-सरस-भावे ॥ प्रविश....॥६॥ अन्वय - अयि मदन-रस-सरस-भावे (मदनरसेन शृङ्गाररसेन सरसभावः सारस्यं यस्याः अयि तादृशि) [ईदृग्विधायास्ते तन्निकटप्रवेश एव योग्यः] राधे मधुमुदित-मधुप-कुल-कलित-रावे (मधुना मकरन्देन मुदितं मत्तं मधुपकुलं भ्रमरवृन्दं तेन कलितः विहितः रावः गुञ्जनं यत्र तस्मिन्) इह (केलिसदने) माधवसमीपं प्रविश [ततश्च] विलस ॥६॥ अनुवाद - मदन-रससे सरस अनुरागमयी राधे! मधुपानमें प्रमत्त भ्रमरोंके कलनादसे निनादित निकुञ्ज-गृहमें प्रवेश करो और माधवके समीप जाकर उनके साथ विलास करो। पद्यानुवाद- गीत भ्रमर मद-माते गाते, 'सरस भाव' जन-हृदय जगाते- बालबोधिनी - सखी कहती है- हे राधे! कामदेवके उद्वेगसे उत्पन्न शृङ्गार-रसमें तुम भावमयी हो गयी हो। वसन्तमें परम आनन्द पानेवाले, पुष्परसके आस्वादनसे आनन्दपूर्वक गुंजार करनेवाले मधुमत्त भौंरोके झुण्डवाले लताभवनमें प्रवेश कर प्रेमरसका आस्वादन करो। यह एक बहुत बड़े आनन्दकी भूमिका है, प्रणय-मिलनका मंगल मुखरण है- चलो, इसमें प्रवेश करो।
३५४ श्रीगीतगोविन्दम् मधुरतर-पिक-निकर-निनद-मुखरे । विलस दशन-रुचि-रुचिर-शिखरे ॥ प्रविश.... ॥७॥ अन्वय—अयि दशन-रुचि रुचिर-शिखरे (दशना दन्ता एव रुच्या कान्त्या रुचिराणि मनोज्ञानि शिखराणि माणिक्यविशेषाः यस्याः अयि तादृशि; पक्वदाड़िमबीजाभं माणिक्यं शिखरं विदुः इति हारावली; ईदृग्दशनायास्तत्क्रियाविशेषकृत्यमेव योग्यमिति भावः) राधे मधुरतर-पिक-निकर-निनद-मुखरे (मधुरतरैः निरतिशय-श्रुति-सुखकरैः पिकनिकराणां कोकिलवृन्दानां निनदैः कूजनैः मुखरे शब्दिते) इह (केलिसदने) माधवसमीपं प्रविश [ततश्च] विलस (विहर) ॥७॥ अनुवाद—सुपक्व दाड़िम (अनार) के बीज एवं शिखर नामक मुक्ताओंके समान दशन पंक्तिमयी राधे ! कोकिलनिकरके मधुरतर कूजन-कलापसे मुखरित लता-वास-गृहमें तुम प्रवेश करो और माधवके समीप जाकर उनके साथ विलास करो। पद्यानुवाद— 'विलसो' भर आनन्द स्वरोंमें— कूक रही कोकिल मधुवनमें। चल राधा ! पिय ढिग उपवनमें ॥ बालबोधिनी—सखी कहती है—हे दशनकी दीप्तिसे शोभायमान शिखर-मणिमयी राधे ! कोकिलाओंकी अत्यन्त मधुर काकलीसे गुञ्जायमान इस लता-निकुंजमें प्रवेशकर श्रीकृष्णके साथ विहार करो। लताओंसे सघन इस केलिगृहमें श्रीहरिके साथ मनभर विलसो, देर-देर तक विलसो। विहित-पद्मावती-सुख-समाजे। कुरु मुरारे! मङ्गलशतानि। भणति जयदेव-कविराज-राजे॥ प्रविश.... ॥८॥
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३५५ अन्वय—हे मुरारे विहित-पद्मावती-सुख-समाजे (त्वल्लीला- वर्णनेन विहितः कृतः पद्मावत्या श्रीराधायाः स्वपत्न्या वा सुखसमाजः सुखसन्ततिः येन तस्मिन् पद्मावती-सुखसम्पादके इत्यर्थः) भणति (तद्रसं कीर्त्तयति) जयदेव-कविराजराजे (निजेष्टदेवोपासनाया नित्यत्व-सर्वोत्तमत्वनिश्चयावेशेन आत्मानं बहुमन्यमानस्य कविराज-राज इति प्रौढोक्तिरियं) मङ्गलशतानि (प्रभूतानि मङ्गलानि) कुरु (विधेहि)॥८॥ अनुवाद—कविकुलाधिराज कवि जयदेवके द्वारा श्रीराधाके विविध आनन्द-प्रसादनके लिए इस स्तुतिपरक गीतिकी रचना की गयी है। हे कृष्ण! आप इसका श्रवण कर प्रसन्न होवें और इस जगतका अनन्तान्त मङ्गल-विधान करें। बालबोधिनी—कवि जयदेव इस अष्टपदीको श्रीहरि चरणोंमें समर्पित करते हुए कहते हैं—हे मुरारे! जयदेव कविराजके इस गीतको श्रवणकर आप सबका हजारों प्रकारसे मङ्गल विधान करें। लक्ष्मीजीका एक नाम पद्मावती है, जयदेवकी पत्नीका नाम भी पद्मावती है। पद्मावतीके आराधक हैं जयदेव जो कविराजोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। अतः कविराजवर श्रीहरिसे प्रार्थना करते हैं—हे मुरारे! मैंने प्रासादके अन्तरमें पद्मावतीकी प्रतिष्ठा की है, आपकी प्रसन्नताके लिए यह कविता की है, आप प्रसन्न होवें और हमारा शतशः मङ्गल करें। अथवा श्रीजयदेव स्वयं श्रीराधासे अनुरोध कर रहे हैं—जो लक्ष्मीकी सारी सम्पदा, सारा सुख लेकर आज उपस्थित हैं, आप उन मुरारिके लिए सौ-सौ प्रकारके मङ्गल विधान करें। उनका मङ्गल तुम्हारे साथ रमण ही है। त्वां चित्तेन चिरं वहन्नयमतिश्रान्तो भृशं तापितः कन्दर्पेण च पातुमिच्छति सुधा-सम्बाध-विम्बाधरम्। अस्याङ्कं तदलङ्कुरु क्षणमिह भ्रूक्षेप-लक्ष्मीलव- क्रीते दास इवोपसेवित-पदाम्भोजे कुतः सम्भ्रमः॥१॥
३५६ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—[अथ सखी तस्याः प्रसाद्मालक्ष्य कौतुकेन सनन्मर्माह]—[सखि] चित्तेन (मनसा) त्वां चिरं वहन् (धारयन्) [तव पीनस्तन-श्रोणी-गुरुभारेण] अतिश्रान्तः, कन्दर्पेण भृशं (अत्यर्थं) तापितश्च; [अतएव श्रमेण तापने च पिपासितः] अयं (श्रीकृष्णः) [तव] सुधासम्बाधम् (सुधया अमृतेन सम्बाधं सङ्कटं व्याप्तमिति यावत्) विम्बाधरं पातुम् इच्छति; तत् (तस्मात्) अस्य अङ्गं (क्रोड्) क्षणम् अलङ्कुरु (शोभय) अन्तस्थितायाः बहिःस्थितस्य पानानुपपत्तेरिति भावः]। [ननु अविदित चित्तस्य अङ्गप्रवेशे मन्मनः सङ्कुचित इतिचेत् तत्राह]— भ्रूक्षेप-लक्ष्मी-लव-क्रीते (भ्रुवोः क्षेपः चालनं स एव लक्ष्मीः ऋद्धिः तस्या लवेन लेशेन क्रीते) [अतएव] उपसेवित-पदाम्भोजे (उपसेवितं पदाम्भोजं पादपद्मं येन तादृशे) दासे इव [अस्मिन् श्रीकृष्णो] सम्भ्रमः (सङ्कोचः) कुतः [अल्पमूल्यक्रीते दासे इव क्रयक्रीते शङ्का न युक्ता, क्रीतस्यैव सेवोपयोगादितिभावः]॥१॥ अनुवाद—हे सुन्दरि ! तुम्हारे सामने अवस्थित अनङ्गतापसे सन्तप्त श्रीकृष्ण दीर्घकालसे तुमको मन-ही-मन धारण किये हुए अतिशय क्लान्त हो गये हैं, वे तुम्हारे बिम्बसम अधरकी मधुर सुधाका पान करनेके लिए लोलुप हो रहे हैं, तुम अभिलाषी प्रियके अङ्कको अलंकृत करो। वे तुम्हारे कटाक्षरूप विपुल वैभवके कणमात्रके क्षण-भर पान करनेके लिए चिरकृतज्ञ हो रहे हैं, उस कटाक्ष-विक्षेपरूपी मूल्यके द्वारा क्रीतदासकी भाँति तुम्हारे पदारविन्दके सेवक हो गये हैं, फिर सम्भ्रम क्यों? कैसी घबराहट ? बालबोधिनी—सखी श्रीराधासे कहती है—हे राधे ! आपको चिरकाल तक हृदयमें धारण करनेके कारण श्रीहरि श्रान्त-क्लान्त हो गये हैं, अन्दर-ही-अन्दर अभितप्त हो गये हैं, कामदेवने इन्हें अत्यन्त सन्तप्त कर दिया है, आपके सुधारससे परिपूर्ण कुन्दरु फलके सदृश अरुण अधरोंकी मधुराईका पान करना चाहते हैं। इसलिए हे प्रिये! अपने इन अभिलाषी प्रियके
एकादशः सर्गः-सामोद-दामोदरः ३५७ अंगोंकी शोभा बनिये ! एक क्षणके लिए ही कटाक्ष विक्षेप कर तुमने इन्हें अपना क्रीतदास बना लिया है। तुम्हारे चरणोंकी सेवा करनेवाले श्रीकृष्णके अंकको समलंकृत करो, बिना संकोचके उनके वक्षःस्थलको अलंकृत करो। इसमें कैसी लज्जा, कैसा भाव और कैसी हिचक ? प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीडित छन्द तथा रूपक एवं उत्प्रेक्षा अलंकार है। सा ससाध्वस-सानन्दं गोविन्दे लोललोचना। सिञ्जान-मञ्जु-मञ्जीरं प्रविवेश निवेशनम् ॥२॥ इति एकविंशः सन्दर्भः। अन्वय-गोविन्दे (श्रीहरौ) लोल-लोचना (लोले सतृष्णे लोचने यस्याः सा) सा (राधा) शिञ्जानमञ्जुमञ्जीरं (शिञ्जानः शब्दायमानः मञ्जुमञ्जीरः मनोज्ञनूपुरः यत्र तद्यथा तथा) ससाध्वस-सानन्दं (ससाध्वसं ससम्भ्रमं सानन्दञ्च यथा तथा; प्रथम-समागमवत् ससाध्वसं विनत्यनन्तर-प्राप्त्या सानन्दमिति ज्ञेयम्) निवेशनं (कुञ्जगृहं) प्रविवेश॥२॥ अनुवाद- श्रीराधा स्पृहायुक्त हृदयसे अपने चञ्चल नेत्रोंसे श्रीगोविन्दका अवलोकन करती हुई लज्जा और हर्षसे मणिमय नूपुरोंसे मनोहर शब्द करती हुई निकुंज गृहमें प्रवेश करने लगीं। पद्यानुवाद- हुलस उठी राधा मधुवनमें अपना ही प्रतिबिम्ब देखकर अपने जीवन-धनमें। चिर अभिलाष विलास भरे हरि, डूबे हर्ष मदनमें, सिहर उठी राधा अति मनमें, हुलस उठी राधा मधुवनमें। बालबोधिनी-सखीके द्वारा समझा-बुझाने पर श्रीराधाने रतिक्रीड़ाके लिए उपयोगी लता-निकुंजमें भीतर-भीतर कुछ
काँपती हुई, कुछ उमगती हुई, इधर-उधर देखकर साभिलाष श्रीगोविन्दको निहारती हुई, चरण-नूपुरोंको झंकारती हुई प्रवेश किया। प्रविष्ट होते हुए जब उन्होंने श्रीकृष्णको देखा तो उन्हें ऐसा लगा कि वे मानो अंग-अंगमें श्रीराधाको ही धारण कर रहे हैं। गीतम् ॥२२॥ वराड़ीरागयतितालाभ्यां गीयते। बालबोधिनी—एक सुकेशी हाथोंमें कंकण धारण कर, कानोंमें ढेरसे पुष्प धारणकर लजाई हुई-सी हाथमें चामर लेकर वीजन करती हुई जब दयितके साथ विनोदन करती है, ऐसे समयमें उस वराङ्गनाके गीतको वराड़ी राग कहा गया है। राधा-वदन-विलोकन-विकसित-विविध-विकार-विभङ्गम्। जलनिधिमिव विधु-मण्डल-दर्शन-तरलित-तुङ्ग-तरङ्गम् ॥१॥ हरिमेकरसं चिरमभिलषित-विलासम्। सा ददर्श गुरुहर्ष-वशंवद वदनमनङ्ग-निवासम् ॥ध्रुवपदम् ॥ अन्वय—[एवं कुञ्ज प्रवेशमुक्त्वा श्रीकृष्णस्य तद्दर्शनानन्द- विकारान् वर्णयन् तस्या स्तद्दर्शनमाह]—सा (श्रीराधा) एकरसं (एकस्मिन्नेव आलम्बने श्रीराधारूपे रसो यस्य तं; तस्याः सर्वोत्तमत्व-निश्चयेन तदेकपरमित्यर्थः) [ननु अन्याङ्गनाभिः रममाणस्य कुतस्तत्परत्वमित्यत आह]—चिरं (बहुकालं) अभिलषित-विलासं (पूर्वोक्तरूपेण अभिलषितः आकाङ्क्षितः तया सह विलासो येन तम्) [अतस्तत्प्रसादावलोकनात्] गुरुहर्षवशंवद-वदनं (गुरुहर्षस्य वशंवदम् आयत्तं वदनं मुखं यत्र तादृशं हर्षेण स्मेराननमित्यर्थः) [अतएव] अनङ्गविकाशं (अनङ्गस्य कामस्य विकाशः यत्र तादृशं) [तदेकनिष्ठत्वं
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३५९ दृष्टास्तेन स्पष्टयति]—राधावदनवलोकन-विकसित-विविध- विकार-विभङ्गं (राधावदनवलोकनेनैव विकसिताः प्रकटिताः विविधविकाराः कामजाः हर्षस्तम्भादयः ते एव विभङ्गाः ऊर्म्मयः यत्र तादृशं) विधुमण्डलस्य चन्द्रमण्डलस्य दर्शनेन तरलिताः चञ्चलीकृताः तुङ्गाः महान्तः तरङ्गाः यत्र तादृशं) जलनिधिं (समुद्रम्) इव हरिं ददर्श; [अत्र श्रीकृष्णसमुद्रयोः विकारोर्म्योश्च साम्यम्] ॥१॥ अनुवाद—एकरस अर्थात् राधाविषयक अनुरागसे युक्त तथा चिरकालसे श्रीराधाके साथ विलासकी अभिलाषा रखने वाले श्रीराधा-वदन अवलोकन जन्य हर्षसे प्रफुल्लित, श्रीकृष्ण रोमाञ्च आदि विविध सात्त्विक मदन-विकाररूप भावोंसे युक्त हो रहे हैं। जिस प्रकार शशधर-मण्डलके दर्शनसे समुद्रमें उत्ताल-तरङ्ग समुदाय तरंगायित हो उठता है, उसी प्रकार काम-रसके समुद्र-स्वरूप, भावभङ्गिमा द्वारा मदन-आसक्ति प्रकाशित करनेवाले श्रीकृष्णको श्रीराधाने निकुञ्ज गृहमें देखा। पद्यानुवाद— राधा-वदन विलोकनसे हैं विकसित विविध विकार जैसे विधुको जोह जलधि लहरों भर लाता ज्वार। बालबोधिनी—निकुञ्ज गृहमें श्रीराधाने श्रीकृष्णको अत्यधिक स्नेहके साथ देखा, देखा श्रीकृष्णकी अनेक विशेषताओंको, सारी विशेषताएँ श्रीराधासे ही सम्बन्धित। श्रीहरि समभावपूर्ण हैं, एकरस हैं, एक ही शृङ्गार रस अपनी प्रधानता बनाये हुए है, वे अनेक प्रकारके शृङ्गार रसके भावोंसे परिपूर्ण हैं। राधाविषयक अनुराग ही उनमें उछल रहा है, चिरकालसे श्रीराधाके साथ विलास करनेकी इच्छा संजोये हुए हैं, केलिकुंजमें श्रीराधाका आना ही उनके जीवनका सर्वस्व है, उनके दर्शनसे उनमें आनन्दका उद्रेक हो गया, अनेक प्रकारके कम्प-पुलकादि सात्त्विक विकार उदित हो उठे।
३६० श्रीगीतगोविन्दम् ऐसा लग रहा था जैसे श्रीराधाका मुखमण्डल कामदेवका निवास स्थान है, जिसे देखकर श्रीकृष्णका मुखमण्डल हर्षसे दीप्त हो उठा है और अपनी मिलन-इच्छाको पूर्ण करना चाहता है, मानो श्रीराधाका मुख चन्द्रमण्डल हो, जिसे देखकर कृष्णरूपी समुद्र चञ्चल हो उठा हो और उसमें ऊँची-ऊँची तरंगें उच्छलित हो रही हों। श्रीराधाने देखा श्रीकृष्ण उन्हें देखते ही विविध काम-भावनाएँ प्रकाशित करने लगे हैं॥१॥ हारममलतर-तारमुरसि दधतं परिलम्ब्य विदूरम्। स्फुटतर फेन-कदम्ब-करम्बितमिव यमुनाजल-पूरम्॥ हरि....॥२॥ अन्वय—[अतःपरं सप्तमं यावत् श्रीहरिमेव विशिनष्टि]— उरसि (वक्षसि) विदूरं परिलम्ब्य (सुदीर्घमित्यर्थः) अमलतरतारं (अमलतरः अत्युज्ज्वलः) तारः मुक्ताफलं यस्य तादृशम्; मुक्ताशुद्धौच तारः स्यात् इति विश्वः) हारं दधतं (धारयन्तं) [अतएव] स्फुटतरफेन-कदम्ब-करम्बित-यमुना-जलपूरम् (स्फुटतरेण फेन-कदम्बेन-फेन-चयेन करम्बितं खचितं यमुना- जलस्य पूरं प्रवाहमिव स्थितं) [हरिं सा ददर्श इति शेषः]। [अत्र यमुना-जल-पूरेण श्रीहरेः फेनसमूहेन च हारस्य साम्यम्] ॥२॥ अनुवाद—श्रीहरिने निज विमल उर-स्थल पर निर्मल मुक्ताओंसे रचित मनोहर हारका परिधान कर रखा है, जो उनके हृदयका बार-बार आलिङ्गन कर रहा है। ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो यमुना नदीका जल स्फुट रूपमें विराजमान फेन-समूहको धारण कर रहा है। पद्यानुवाद— उर पर लहराता है हरिके अमल तारका हार, मानो फेन-कदम्ब-करम्बित जमुना-जलकी धार। हुलस उठी राधा मधुवनमें। विलस उठी राधा अति मनमें॥
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३६१ बालबोधिनी—प्रस्तुत पदमें श्रीकृष्णकी उपमा यमुनाके आपूरित जल प्रवाहसे की गयी है, उनके नीलवर्ण वक्षस्थलको बार-बार आलिङ्गन करनेवाला शुभ्र जानुपर्यन्त लटकता हुआ शुभ्र मुक्ताहार ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो यमुनाका नीला जल सफेद फेनसे मिश्रित होकर प्रकाशित हो रहा हो अथवा यमुनाके जलमें फेन मिल गया हो। प्रस्तुत पद श्रीराधा-दर्शनसे श्रीकृष्णमें उद्भूत स्वेद नामक सात्त्विक भावके प्रकाशनको भी सूचित कर रहा है। श्यामल-मृदुल-कलेवर-मण्डलमधिगत-गौरदुकूलम् । नील-नलिनमिव पीत-पराग-पटल-भर-वलयित-मूलम् ॥ हरि.... ॥३॥ अन्वय—अधिगत-गौरदुकूलं (अधिगतं प्राप्तं परिहितमिति यावत् गौरं पीतं दुकूलं पट्टाम्बरं येन तं) [तथा] श्यामल मृदुल-कलेवर-मण्डलं (श्यामलं मृदुलञ्च कोमलञ्च कलेवर- मण्डलं यस्य तं; यथोचितावयव-सन्निवेश-प्रतिपादनार्थं मण्डलत्वेनोक्तिः) [अतः] पीतपरागपटलभरवलयितमूलं (पीतेन परागाणां मध्यस्थरजसां पटल-भरेण समूहातिशयेन वलयितं वेष्टितं मूलं यस्य तं) नीलनलिनम् (नीलोत्पलम्) इव [हरिं ददर्श]। [नीलकमलेन श्रीहरेः परागेण च पीतवसनस्य साम्यम्] ॥३॥ अनुवाद—श्रीहरिने अपने श्यामल मृदुल कलेवर पर पीत वसन धारण किया है, ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो नीलपद्म सुवर्ण-पर्णके पराग-निलयसे साङ्गोपाङ्ग सराबोर हो गया हो। पद्यानुवाद— श्यामल कोमल वपु पर सज्जित सुन्दर गौर दुकूल, पीत पराग पटल है राजित ज्यों नलिनीके फूल। बालबोधिनी—श्रीहरिका श्रीविग्रह श्यामवर्ण है, जिस पर उन्होंने पीत वर्णका पीताम्बर धारण कर रखा है, वह इस
३६२ श्रीगीतगोविन्दम् प्रकार सुशोभित हो रहा है, जैसे नीलकमल अपने पीले परागसे परिपूर्ण रूपसे परिवेष्टित-मंडित हो रहा हो। इस बातकी भी सूचना दी जा रही है कि श्याम-वर्णके वक्षःस्थल पर तुम गौराङ्गीकी शोभा भी अत्यधिक होगी। इस प्रकार विपरीत-रति भी प्रदर्शित हुई है। तरल-दृगञ्चल-चलन-मनोहर-वदन-जनित-रतिरागम् । स्फुट-कमलोदर-खेलित-खञ्जन-युगमिव शरदि तडागम् ॥ हरि.... ॥४ ॥ अन्वय-तरल-दृगञ्चल-चलन-मनोहर-वदन-जनित-रतिरागम् (तरलस्य चञ्चलस्य दृगञ्चलस्य चलनेन कटाक्षक्षेपेण मनोहरं यत् वदनं तेन जनितः उत्पादितः रतिरागः सुरतौत्सुक्यं येन तं) [अतएव] शरदि (शरतत्काले) स्फुटकम्लोदर-खेलित- खञ्जनयुगम् (स्फुटं विकसितं यत् कमलं पद्मं तस्य उदरे अभ्यन्तरे खेलितं क्रीडापरं खञ्जनयुगं यत्र तादृशं) तड़ागम् इव [हरिं सा ददर्श इति शेषः]। [अत्र श्रीहरेः तड़ागेन वदनस्य कमलेन, नयनयोश्च खञ्जनयुगलेन साम्यम्] ॥४॥ अनुवाद-जिन श्रीकृष्णका मनोहर वदन शरद् कालके निर्मल सरोवरमें विकसित नील-कमलकी शोभाके समान है, उस मुख पर चंचल नयनोंकी अपाङ्ग-भङ्गिमा श्रीराधाके प्रति इस प्रकार मदन-अनुराग उद्दीप्त करा रही है, मानो कमल पर खञ्जन पक्षी क्रीड़ापरायण हो रहे हों। पद्यानुवाद- तरल दृगंचल चलन मनोहर वदन उदित रति-राग, खेल रहे खंजन कंजोदर मानो शरद तड़ाग। हुलस उठी राधा मधुवनमें। विलस उठी राधा अति मनमें ॥ बालबोधिनी-जब श्रीराधाने निकुंज-सदनमें प्रवेश किया, तब श्रीकृष्णके नेत्र अति चंचल हो उठे, उनके मन्द-मन्द
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३६३ मुस्कानसे युक्त अति मनोहर मुखड़ेको देखकर श्रीराधाके मनमें रतिविलास करनेकी इच्छा उत्पन्न हो उठी। श्रीकृष्णका सस्मित मुख उस शरद्कालीन प्रफुल्लित कमलके समान लग रहा था, जिस पर दो खञ्जन पक्षी क्रीड़ा कर रहे हों। वस्तुतः उनके नेत्रोंकी चंचलता क्रीड़ापरायण खंजरीट खगोंके (खञ्जन पक्षीके) समान लग रही थी। श्रीराधाको देखकर श्रीकृष्ण अविकारी ही रहे। अतएव यहाँ उनकी उपमा शरद्कालीन तड़ागसे दी गयी है। प्रस्तुत श्लोकमें नेत्रोंकी चंचलता रतिरागको व्यक्त कर रही है, उनके भ्रू-क्षेप (कटाक्ष) श्रीराधाके मन्मथको अभिवृद्धित करनेवाले हैं। शरद्कालमें खंजन खगका वर्णन उचित ही है। 'कमलोदर' पदसे 'पद्मासन' नामक रतिविशेष भी सूचित हुआ है। उनका मनोहर मुख युवतियोंमें रतिकी अभिलाषा उत्पन्न करनेवाला है। वदन-कमल-परिशीलन-मिलित-मिहिर-सम-कुण्डल-शोभम्। स्मित-रुचि-कुसुम-समुल्लसिताधर-पल्लव-कृत-रति-लोभम्॥ हरि....॥५॥ अन्वय—वदन-कमल-परिशीलन-मिलित-मिहिर-सम-कुण्डल- शोभम् (वदनमेव कमलं तस्य परिशीलनाय विकाशाय मिलिताभ्यां समागताभ्यां मिहिरसमाभ्यां सूर्यसदृशाभ्यां कुण्डलाभ्यां शोभा यत्र तादृशं; सूर्यमण्डलद्वयमिव कुण्डलयुगलं धारयन्त- मित्यर्थः) [तथाच] स्मित-रुचि-कुसुम-समुल्लसिताधर-पल्लव- कृत-रति-लोभम् (स्मितरुचिः मृदुहास्यप्रभा स एव कुसुमं तेन समुल्लसितः यः अधर-पल्लवः तेन कृतः उत्पादितः [तस्याः] रतिलोभो येन तादृशम्) [हरिं सा ददर्श] ॥५॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके वदन-कमलकी शोभाका परिशीलन करनेके लिए अरुण वर्णके सदृश लोहित वर्णीय मणिमय कुण्डलद्वय अति सुन्दर रूपसे शोभा पा रहे हैं एवं रुचिर
३६४ श्रीगीतगोविन्दम् मन्द-मन्द हास्यप्रभाकी कान्तिसे युक्त होकर उल्लसित, स्फूर्त्तियुक्त अधर-पल्लव श्रीराधाकी रति-लालसाको समुद्भूत करा रहे हैं। पद्यानुवाद— वदन कमल पर रविसे राजित युग कुण्डल अति सुन्दर। हिल पल्लवसे होंठ जताते चुम्बन हित ज्यों आतुर॥ बालबोधिनी—उस समय निकुंजमें श्रीकृष्णके कानोंमें विभूषित दोनों कुण्डल ऐसे लग रहे थे मानो दो सूर्य उनके प्रफुल्लित मुखकमलका स्पर्श प्राप्त करनेके लिए कपोलों पर मिलित हो रहे हों। इस प्रसंगसे अर्थात् मिहिर-प्रकाशसे रतिकालका अन्त भी सूचित हो रहा है। उस पर भी श्रीकृष्ण मन्द-मन्द मुस्करा रहे हैं। स्मित कान्तिसे उनका वदनकमल और भी रुचिर एवं समुज्ज्वलित लग रहा है। उनके अधरपल्लव रति-लोभकी तृष्णा अभिव्यक्त कर रहे हैं और श्रीराधाके अधर पानके लिए उत्कण्ठित हो रहे हैं। श्रीकृष्णके ऐसे मुखकमलको देखकर श्रीराधाके मनमें भी रति-इच्छा समद्भूत हो गयी। श्रीराधा ऐसे सौन्दर्य-सार भूषण श्रीकृष्णको देखती रहीं। शशि-किरण-च्छुरितोदर-जलधर-सुन्दर-सकुसुम-केशम्। तिमिरोदित-विधुमण्डल-निर्मलमलयज-तिलकनिवेशम् ॥ हरि.... ॥६ ॥ अन्वय—शशि-किरण-च्छुरितोदर-जलधरसुन्दर-सकुसुमकेशं (शशिनः चन्द्रस्य किरणैः छुरितं व्याप्तम् उदरं यस्य तादृशः यः जलधरः तद्वत्-सुन्दराः सकुसुमाः कुसुमखचिताः केशाः यस्य तम्) [अत्र केशानां जलधरेण पुष्पाणाञ्च इन्दूकिरणेन साम्यम्] [तथा च] तिमिरोदित-विधुमण्डल-निर्म्मल-मलयज- तिलकनिवेशं (तिमिरे अन्धकारे उदितं विधुमण्डलमिव निर्मलः मलयजतिलक-निवेशः चन्दन-तिलक-विन्यासः यस्य तम्)
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३६५ [हरिं सा ददर्श] [अत्र ललाटस्य तिमिरेण, तिलकस्य च इन्दुमण्डलेन साम्यम्] ॥६॥ अनुवाद—कुसुमोंसे अलंकृत श्रीकृष्णका केश-पाश चन्द्रकिरणोंसे अनुरञ्जित होकर नवजलधर मालाके समान प्रतीत हो रहा है, ललाट पर धारण किया चन्दनतिलक इस प्रकार शोभा प्राप्त कर रहा है, मानो निर्मल आकाशमें अन्धकारके मध्य पूर्ण विधुमण्डल उदित हुआ हो। पद्यानुवाद— घनमें इंदु किरण सम सज्जित सुन्दर कुसुमित केश, तिमिरोदित विधु मण्डल मानो मलयज-तिलक-निवेश। हुलस उठी राधा मधुवनमें। विलस उठी राधा अति मनमें॥ बालबोधिनी—श्रीकृष्णकी सुन्दर अलकावली पुष्पोंसे समलंकृत हो रही थी। उन प्रफुल्लित समुज्ज्वलित पुष्पोंकी शोभा ऐसी लग रही थी मानो काली-काली घटाओंके मध्यमें चन्द्रमा छिप रहा हो। अथवा उन काले केशोंके मध्यमें चन्द्रकिरण व्याप्त हो रही है अथवा बादलोंके बीचमेंसे चन्द्रमा उदित हो रहा हो। छोटे-छोटे बादलोंके बीचमें जहाँ चाँदनी आलोकित होती है वहाँ फूलोंके गुम्फन स्पष्ट दिखायी देते हैं। जहाँ नहीं होती, वे कजरारे बने रहते हैं। श्रीकृष्णके श्यामवर्णके मस्तक पर मलयगिरिका चन्दनका तिलक ऐसी शोभा दे रहा था मानो अंधकारके बीच पूर्ण चन्द्रमण्डल उदित हुआ हो। श्रीराधा मिलनसे श्रीकृष्णका परिधान एवं शृङ्गार गौरवर्ण हो गया है, श्रीराधामय हो गया है। ऐसे गौरमय श्रीश्यामसुन्दरको श्रीराधा देखती रहीं। विपुल-पुलक-भर-दन्तुरितं रति-केलि-कलाभिरधीरम्। मणिगण-किरण-समूह-समुज्ज्वल-भूषण-सुभग-शरीरम् ॥ हरि.... ॥७॥
३६६ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—विपुल-पुलक-भर-दन्तुरितं (विपुलो महान् यः पुलकभरः रोमाञ्चातिशयः तेन दन्तुरितं विषमीकृतं क्वचिदुन्नतं क्वचिच्चानतमिति यावत्) [अतएव तद्दर्शनात् हृदि उद्गतैः] रतिकेलिकलाभिः (सुरतक्रीड़ाविलासैः) अधीरं (व्याकुलं) [तथाच] मणिगण-किरण-समूह-समुज्ज्वल-भूषण-सुभग-शरीरम् (मणिगणानां रत्नसमूहानां परिहितानामित्यर्थः किरणसमूहैः समुज्ज्वलानि भूषणानि अलङ्काराः तैः सुभगं सुन्दरं शरीरं यस्य तादृशं) [हरिं सा ददर्श इति शेषः] ॥७॥ अनुवाद—श्रीराधा-अवलोकनसे श्रीकृष्णका शरीर विपुल पुलकोंसे रोमाञ्चित हो रहा है, रति-केलि-विषयक विविध कथा मनमें समुदित होनेसे वे अति अधीर हो रहे हैं, श्रीविग्रह मणियोंकी किरणोंसे समुज्ज्वलित होकर अतीव मनोहर द्युतिको धारण कर रहा है। पद्यानुवाद— विपुल पलक भर ललक केलि रति दिखते अधिक अधीर। मणि गण किरण समूह समुज्ज्वल भूषण सुभग शरीर॥ बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णको देख रही हैं कि उनका सम्पूर्ण शरीर पुलकित हो रहा है, अद्भुत रोमांचसे युक्त हो रहा है, रति-क्रीड़ाके लिए वे एक विचित्र आकुल प्रत्याशासे अधीर तो हो ही रहे थे, श्रीराधा-मिलनसे तो रति-केलि-कलामें उपयोगी चुम्बनादि क्रियाओंमें व्यस्त होनेके कारण और भी चंचल हो उठे। मणिमय भूषणोंकी कान्तिसे देदीप्यमान होनेके कारण उनका श्रीविग्रह अत्यधिक सुशोभित हो रहा था, जिन आभूषणोंको उन्होंने धारण कर रखा था, उन आभूषणोंमें लगी हुई मणियोंके किरणसमूहसे सभी आभूषण चमचमा रहे थे—ऐसे मणिमय अलंकारोंसे सुन्दर वपुवाले श्रीकृष्णको श्रीराधाने देखा।
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३६७ श्रीजयदेवकवि-भणित-विभव-द्विगुणीकृत-भूषणभारम्। प्रणमत हृदि विनिधाय हरिं सुचिरं सुकृतोदय-सारम् ॥ हरि.... ॥८ ॥ अन्वय—[भोः साधवः] श्रीजयदेव-भणित-विभव-द्विगुणीकृत- भूषण-भारं श्रीजयदेवस्य भणितमेव विभवः समृद्धिः तेन द्विगुणीकृतः नितरां परिवर्द्धित इत्यर्थः भूषणस्य अलङ्कारस्य भारः गौरवं यत्र तादृशं) [यैः स्वयमलंकृतं ते अलङ्काराः जयदेवस्य उपमादि-वाग्विलासैः द्विगुणीकृता इत्यर्थः] [तथा] सुकृतोदयसारम् (सुकृतस्य पुण्यविशेषस्य य उदय आविर्भावः फलमितियावत् तस्य सारभूतं) हरिं सुचिरं [यथा तथा] हृदि (चित्तमध्ये) विनिधाय (भक्तिभरेण स्थापयित्वा) प्रणमत ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कवि द्वारा विरचित विविध अलंकृत वाक्यरूप अलंकारसे जिनके परिहित भूषण-राशिकी शोभा द्विगुणित हो गयी है, हे रसिक भक्तों ! कृत-पुण्योंके फलस्वरूप उन श्रीकृष्णको हृदयमें यत्नके साथ धारण कर आप उन्हें प्रणाम करें। पद्यानुवाद— श्रीजयदेवकथित हरि-वर्णन द्विगुणित भूषण भार, हो हियमें अंकित जब जनके उदित पुण्यका सार। हुलस उठी राधा मधुवनमें। विलस रही राधा उपवनमें ॥ बालबोधिनी—प्रस्तुत प्रबन्धके इस आठवें पद्यके द्वारा कवि जयदेव कहते हैं कि हे भक्तजनों ! कवि-शिरोमणि जयदेवकी कविताके कारण श्रीकृष्णके आभूषणोंकी शोभा द्विगुणित हो गयी है अथवा जयदेव कवि द्वारा कथित श्रीकृष्णका वैभव द्विगुणित अलंकारोंसे युक्त है। चिरकालसे सञ्चित पुण्योदयके तत्त्वरूप श्रीकृष्णको चित्तमें धारण कर उन्हें प्रणाम कीजिए। बड़े पुण्योंसे ऐसे श्रीकृष्ण मनमें उदित होते हैं, वे श्रीराधाके संगसे जुड़कर द्विगुणित भूषणके भारसे
३६८ श्रीगीतगोविन्दम् श्रीराधासे जुड़कर द्विगुणित हो जाते हैं। ऐसे श्रीकृष्ण जिन्हें श्रीराधा निरन्तर देख रही हैं, नित्यकालके लिए हृदयमें विराजमान हो जायें। श्रीगीतगोविन्द काव्यके इस बाईसवें प्रबन्धका नाम 'सानन्द गोविन्दराग श्रेणिकुसुमाभरण' है। अतिक्रम्यापाङ्गं श्रवणपथपर्यन्तगमन- प्रयासेनेवाक्ष्णोस्तरलतरतारं पतितयोः। तदानीं राधायाः प्रियतम-समालोकसमये पपात स्वेदाम्बुप्रकर इव हर्षाश्रुनिकरः ॥१॥ अन्वय—[अथ श्रीकृष्णस्य श्रीराधिकादर्शनानन्द-विकारमुक्त्वा इदानीं श्रीराधायास्तद्दर्शनानन्दविकारमाह]—तदानीं प्रियतम-समालोक समये (प्रियतमस्य श्रीकृष्णस्य दर्शनकाले) अपाङ्गम् (नेत्रप्रान्तं) अतिक्रम्य श्रवण-पथपर्यन्त गमनप्रयासेनेव (कर्णान्तपर्यन्तं बहुदूरमित्यर्थः गमनप्रयासेनेव) तरलतर-तारं (तरलतरा अतिचञ्चला तारा नेत्रकनीनिका यत्र तद्यथा तथा) पतितयोः राधायाः अक्ष्णोः (नेत्रयोः अतृप्तयोरिति शेषः) स्वेदाम्भः-प्रकरः (श्रमजातघर्मजलप्रवाहः) इव हर्षाश्रुनिकरः (आनन्दाश्रुचयः) पपात। [अत्रायं भावः—यः अत्यन्तं गच्छति गतिवेगवशात् स घर्माक्तः भूमौ पतति; पतित्वाच झटिति उत्थाय किमहं केनापि दृष्ट इति सलज्जः तरलतरतारः दिशः अवलोकयति; द्रुततरगमनायासात् तस्य तनोः घर्मवारि प्रसरति च; तद्वत् श्रीकृष्णावलोकनसमये श्रीराधायाः नेत्रयुग्मम् अपाङ्गमतिक्रम्य कर्णयुगलं यावत् गतं, तेन च सुदूरगमनश्रमादिव आनन्दाश्रु- व्याजेन घर्मवारि निःससार] ॥१॥ अनुवाद—प्राणेश्वरके मिलन-क्षणोंमें श्रीराधाके अतृप्त नयन-युगलने अपाङ्गको अतिक्रमण कर श्रवण-पथ पहुँचनेका प्रयास किया। इस प्रयासमें चंचल बने नेत्रोंसे पसीनेके प्रसारके रूपमें हर्ष ही अश्रु-धारा बनकर प्रवाहित होने लगा।
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३६९ बालबोधिनी—चिरकालके विरहके पश्चात् जब श्रीराधाका श्रीकृष्णके साथ मिलन हुआ तो श्रीराधाके नेत्र अपाङ्गों (कटाक्षपातों) का अतिक्रमण करके कानों तक पहुँच गये। इसी श्रमसे मानो उनके नेत्रोंमें पसीना आनन्दाश्रुके रूपमें जलधाराके समान बहने लगा। इतने समय बाद प्रियतमको देखा तो हर्ष स्थिर न रह सका, आँखोंसे छलछलाने लगा। रतिक्रीड़ाके आस्वादनसे आँखें पसीना-पसीना हो गयीं। बड़ी-बड़ी आँखें कानों तक पहुँचना चाहती थीं और इसी प्रयासमें उनमें शैथिल्य आ गया। शिथिलताके कारण वे नमित हो गयीं, झुक गयीं, जलमय हो गयीं। नेत्र-प्रान्तका अतिक्रमण करके श्रवण पथ तक जानेके प्रयासमें स्वेद-अम्बु छलछलाया। नेत्रोंमें प्रिय-दर्शनकी आकांक्षासे अति चंचलत्व तो हो रहा था। श्रीराधाका सात्विक भाव प्रकाशित हुआ है। प्रस्तुत श्लोकमें उपमा अलंकार है और शिखरिणी छंद है। भजन्त्यास्तल्पान्तं कृत-कपट-कण्डूति-पिहित- स्मितं याते गेहाद् बहिरबहिताली-परिजने। प्रियास्यं पश्यन्त्याः स्मरशर-समाहूत-सुभगं सलज्जा लज्जापि व्यगमदिव दूरं मृगदृशः ॥२॥ अन्वय—[ततः शय्यान्तिकं गतायास्तस्याः प्रियदर्शनावेशेन लज्जा विगलिता इत्याह]—कृत-कपट-कण्डूति-पिहित-स्मितं (कृता या कपटकण्डूतिः छलकण्डुयनं तया पिहितम् आच्छादितं स्मितम् ईषद्धास्यं यथा तथा) अवहिताली-परिजने (तत्सुखानुकूल्ये अवहितः सावधानः यः आलीपरिजनः सखीजनः तस्मिन्) गेहात् (निकुञ्जभवनात्) बहिः याते (प्रस्थिते) [सति] तल्पान्तं (शय्यान्तिकं) भजन्त्याः (गच्छन्त्याः) स्मरशरसमाहूतसुभगं (स्मरशरेण समाहूतं यत् हास्यकटाक्षादिकं तेन सुभगं
३७० श्रीगीतगोविन्दम् सुन्दरं-यथास्यात् तथा; यद्वा स्मरशरसमाहूतसुभगमिति प्रियास्य- मित्यस्य विशेषणम्) प्रियास्यं (श्रीकृष्णवदनं) पश्यन्त्याः मृगदृशः (मृगाक्ष्याः श्रीराधायाः) लज्जापि सलज्जा [सती] दूरं व्यगमदिव (विशेषेण अगमदिव) [सखीसमक्षं श्रीराधा सलज्जा आसीत् अधुना तासां कुञ्जभवनात् बहिर्गमनेन सा लज्जां विहाय यथाभिलषितं विजहार इत्यर्थः] ॥२॥ अनुवाद—श्रीराधाकी सुखाभिलाषिणी सहचरियाँ कुरङ्गनयना राधिकाको केशवकी शय्या पर उपवेशन करते देख सावधानीसे कपट-कण्डूयनका बहाना करती हुई हास्य संवरण पूर्वक निकुंजगृहसे बाहर चली गयीं, तब स्मरपरवशा श्रीराधा अपने प्रियतम श्रीकृष्णके मुखमण्डलका मनोहर कटाक्ष निक्षेपके द्वारा अवलोकन करने लगीं और उनकी लज्जा भी सलज्जभावसे वहाँसे दूर चली गयी। बालबोधिनी—ज्यों ही श्रीराधाने लता-निकुंजमें प्रवेश किया, सेज पर आसीन हुईं तभी सावधान सखियाँ समझ गईं कि अब उनके यहाँ रुकनेका कोई औचित्य ही नहीं है, उनकी उपस्थिति श्रीराधामाधवके मधुर मिलनमें बाधक बन सकती है। वे चतुर सखियाँ बहाना बनाने लगीं, कान आदि खुजलाने लगीं और मुस्कराते हुए लता-निकुंजसे बाहर चली गयीं। फूलोंकी शैया पर विराजमान श्रीराधा कामदेवके बाणोंसे वशीभूत हो श्रीकृष्णको ऐसे देखने लगीं मानो उन्हें पुनः स्मरके शरोंसे बींध रही हों। श्रीराधाकी ऐसी प्रगल्भता देखकर लता भी लज्जित हो गयीं और उस मृगनयनी श्रीराधाको छोड़कर सखियोंके समान स्वयं भी दूर चली गयीं। अब इस रति-व्यापारमें लाज भी कहाँ रहेगी, देखते-देखते श्रीराधाने श्रीकृष्णको प्राप्त कर लिया। प्रस्तुत श्लोकमें रसवद् अलंकार एवं शिखरिणी छन्द है।
एकादशः सर्गः—सामोद-दामोदरः ३७१ सानन्दं नन्दसूनुर्दिशतु मितपरं सम्मदं मन्दमन्दं राधामाधाय बाह्रोर्विवरमनु दृढं पीडयन्प्रीतियोगात्। तुङ्गौ तस्या उरोजावतनु वरतनोर्निर्गतौ मा स्म भूतां पृष्ठं निर्भिद्य तस्माद्बहिरिति वलितग्रीवमालोकयन्वः ॥३॥ अनुवाद—नन्दपुत्र श्रीकृष्णने श्रीराधाको मन्द-मन्द अपनी बाहोंके अन्तरालमें रखा, प्रीतिपूर्वक उनका गाढ़ आलिङ्गन किया। पुनः ग्रीवाको घुमाकर ऐसे देखने लगे मानो श्रीराधाके उन्नत उरोज उनकी पीठको भेदकर बाहर न निकल जायें—ऐसे श्रीकृष्ण सभीका आनन्द विधान करें। बालबोधिनी—नन्दपुत्र श्रीगोपाल एवं श्रीराधाका मिलन हुआ। इस मिलनसे श्रीकृष्ण अतिशय आनन्दसे परिपूर्ण हो गये और धीरे-धीरे श्रीराधाको अपनी बाहोंके विवरमें भर लिया। श्रीराधा शिरीष कुसुमोंसे भी बहुत अधिक सुकोमल हैं, इसलिए उन्हें बहुत कोमलताके साथ गले लगाया। पुनः अत्यन्त प्रीतिपूर्वक श्रीराधाका गाढ़ आलिङ्गन किया। यहाँ ‘दृढं पीडयन्’ इस पदसे श्रीकृष्णका अतिशय अनुराग प्रकट हो रहा है। पुनः अपनी ग्रीवाको वलायित करके उन्हें देखने लगे कि कहीं श्रीराधाके तुङ्ग उरोज उनकी पीठको भेदकर बाहर न निकल जायें। इस प्रसंगमें श्रीराधाके उरोज पृष्ठका काठिन्य एवं तीक्ष्णत्व अभिव्यक्त हो रहा है। यहाँ श्रीराधाकी प्राकृतिक रूपसे अति रमणीयता एवं सौकुमार्यता निदर्शित हुई है—वे फूलोंसे भी अधिक कोमल है। प्रस्तुत श्लोकमें शृङ्गार रस, वैदर्भी रीति एवं प्रसाद गुण है। जयश्री-विन्यस्तैर्महित इव मन्दार कुसुमैः स्वयं सिन्दूरेण द्विप-रण-मुदा मुद्रित इव। भुजापीड़-क्रीड़ाहत-कुवलयापीड-करिणः प्रकीर्णासृग्बिन्दुर्जयति भुजदण्डो मुरजितः ॥४॥
३७२ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—[तत्र तया अभिलाष-विशेषेण आलोच्यमानं श्रीकृष्णस्य भुजदण्डं स्मरन् तत्सौन्दर्य वर्णयति कविः]—भूजापीड- क्रीड़ाहत-कुवलयापीड़करिणः (भूजापीडेन बाहुभ्यां सम्यक् पीड़नेन क्रीड़या अवलीलया हतस्य कुवलयापीड़ाख्यस्य कंसकरिणः) प्रकीर्णासृग्विन्दुः (प्रकीर्णाः विक्षिप्ता लग्ना इति यावत् असृग्विन्दवः शोणितविन्दवः यत्र तादृशः) जयश्रीविन्यस्तैः (जयश्रिया विजयलक्ष्म्या विन्यस्तैः अर्पितैः) मन्दा-कुसुमैः (देवतरुपुष्पैः) महितः (अर्चितः) इव; [जयश्रीपूजितत्वेन हेतुना उत्प्रेक्षान्तरमाह]—द्विप-रण-मुदा (द्विपेण करिणा सह यः रणः संग्रामः तेन मुदा हर्षेण) स्वयं सिन्दूरेण मुद्रितः (राजितः) इव [एतादृशः] मुरजितः (मुरारेः श्रीहरेः) भुजदण्डः जयति [अतएव विप्रलम्भानन्तरप्राप्तानन्देन सहितो गोविन्दो यत्र सोऽयम् एकादशः सर्गः) ॥४॥ अनुवाद—बाहु-युद्धमें कुवलयापीड़ नामक हस्तीको मार देनेसे रुधिर (रक्त) बिन्दुओंसे सुशोभित, हाथीके साथ युद्धके उल्लासमें सिन्दूरसे चिह्नित, विजय-श्री द्वारा मन्दार पुष्पोंसे विभूषित मुरजित्कृष्णका विशाल भुजदण्ड जयजयकारको प्राप्त हो। बालबोधिनी—कवि जयदेव कहते हैं कि श्रीकृष्णका मंगलकारी भुजदण्ड आपका कल्याण करे, उनकी भुजाएँ सर्वोत्कृष्ट हैं, जगत-वन्दनीय हैं। वे मुरजित हैं। उन्होंने अपनी दण्डाकार भुजाओंसे मुर नामक दैत्यको परास्त कर दिया था। अपने इसी प्रचण्ड भुजदण्डकी क्रीड़ासे उन्होंने कंसके कुवलयापीड़ नामक हाथीको मार डाला था। उसको मारनेसे जो रक्तकी बूंदें उनकी भुजाओंपर पड़ गई थीं, उन्हें देखकर ऐसा लगता था मानो विजयलक्ष्मीने स्वयं ही पारिजातके फूलोंसे उनकी पूजा की हो। वे स्वयं भी उस हाथीको मारकर अत्यन्त प्रसन्न हुए थे। उनकी इसी प्रसन्नताने ही सिन्दूरका रूप धारण कर लिया था। ऐसा