गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१८ श्रीगीतगोविन्दम्
क्षणमिति भावः) घनस्तनजघनया (घनं निविड़ं स्तनजघनं यस्याः तादृश्या) [त्वया] क्रान्ते (निरन्तरं व्याप्ते) [अतः] परानवकाशिनि (अन्यावकाश-शून्ये) स्वान्ते (मदीये मनसि) वितनोः (तनुशून्यात् कामात्) अन्यः कोऽपि धन्यः (तादृक् सौभाग्यवान्) अन्तरं (अभ्यन्तरं) न विशति [मनोद्वारेणैव एतदभ्यन्तरं प्रविश्यते; मनस्तु मे त्वया परिव्याप्तं तर्हि केन पथा प्रवेष्टव्यमन्येन शरीरिणा जनेन, कामस्तु मनोभवः अतस्तत्र तस्यैव प्रवेशेऽधिकारोऽस्तीत्यर्थः]; [शङ्कां त्यक्त्वा यत् कर्त्तव्यं तदाह]—हे प्रणयिनि परीरम्भारम्भे (परीरम्भस्य आश्लेषस्य आरम्भे उपक्रमे) विधेयतां (इतिकर्त्तव्यतां) विधेहि (व्यवस्थापय) ॥१॥ पद्यानुवाद— घन उर जघन सतत आक्रांते! स्वान्ते। मम मन सूना। तज शंका भुजमें भर जाओ, जो हुलास हिय दूना॥ अनुवाद—दूसरी नायिकाके प्रति मुझे आसक्त समझकर व्यर्थकी शंकाओंका परित्याग कर दो। परस्पर अविरल स्तन एवं जघन युगल शालिनी हे प्रणयिनी राधे! मेरे मनमें किसी दूसरी नायिकाके लिए अवकाश ही नहीं है। मदनके अतिरिक्त दूसरे किसीके प्रवेश करनेका सौभाग्य नहीं है। परिरम्भणके लिए अब मुझे आदेश दो। बालबोधिनी—अब श्रीकृष्ण श्रीराधासे कह रहे हैं—क्यों यह शंका अपने मनमें व्यर्थ ही पैदा कर ली है। अन्य वनिता-सङ्गका आरोप मुझपर मत लगाओ। मेरा तो अन्तःस्थल और हृदय तुम्हारे कुच-कलशों एवं जघनोंके भारसे इस तरह आक्रान्त है कि कहीं दूसरोंकी स्मृतिका अवकाश ही नहीं है। मेरे हृदयमें तुम्हारे प्यारने सम्पूर्ण रूपसे व्याप्त होकर आक्रमण कर लिया है, वहाँ दूसरेके लिए किञ्चिन्मात्र भी स्थान नहीं है। वहाँ कोई कैसे प्रवेश कर सकता है। तुम्हारे रहनेसे मेरे हृदयमें मदनके अतिरिक्त