भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३१७ चातुर्ययुक्तं चाटु प्रीतिकरं पटु कौशलपूर्णं चारु मनोहरं; यद्वा चटुलं चञ्चलं नानाविधमितियावत्, चटुल-चाटुना पटु मानापनयनसमर्थं चारु शोभनं) अतिशातं (परमसुखप्रदमित्यर्थः) सुरवैरिणः (मुरारेः) वचनजातं (वाक्यसमूहः) जयति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तताम्) ॥८॥ अनुवाद—पद्मावतीके प्रिय श्रीजयदेव कवि द्वारा विरचित राधिकाको सम्बोधित करके श्रीकृष्ण द्वारा उक्त चाटुयुक्त सुकुमार, मान हरणमें कुशल, मोहन माधुरीपूर्ण वचन समुदायकी जय हो। बालबोधिनी—इस प्रकार मुरवैरी श्रीकृष्णकी यह वचनावली जो श्रीराधाको अभिलषित करके सर्वोत्कृष्ट रूपसे प्रकाशित हुई है, वे सब प्रकारसे जययुक्त हों। अपनी परम प्रेयसी श्रीराधाके मान-अपमान हेतु ये वाक्य समूह अति समर्थ एवं परम सुखप्रद हैं। इस मनोहर अष्टपदीमें चतुर एवं प्रिय मीठी बातोंका ही संकलन है, पद्मावती अर्थात् श्रीराधा-श्रीकृष्णके ऊपर विजयिनी हों और विजयी हों। भारतीसे भूषित, पद्मावती-पति जयदेव, इसी अष्टपदीमें कवि जयदेवकी स्फूर्ति को श्रीकृष्णने जयदेवके वेशमें स्वयं लिपिबद्ध किया है—देहि पदपल्लवं मे उदारम्....। यह गीत गीतगोविन्दका उन्नीसवाँ प्रबन्ध है। इस प्रबन्धका नाम चतुर्भुजरागराजिचन्द्रोद्योत है। परिहर कृतातङ्के! शङ्कां त्वया सततं घन स्तनजघनया क्रान्ते स्वान्ते परानवकाशिनि। विशति वितनोरन्यो धन्यो न कोऽपि ममान्तरं प्रणयिनि! परिरम्भारम्भे विधेहि विधेयताम् ॥१॥ अन्वय—[अपरमपि कृत्यं विज्ञापयितुमाह]—अयि कृतातङ्के (कृतः आतङ्कः सन्देहः अन्यस्त्रीसम्भोगवितर्क इत्यर्थः यया तत्सम्बुद्धौ) शङ्कां परिहर (त्यज); सततं (निरन्तरं; नतु