गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१६ श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—हे राधे ! मुझे अङ्गीकार करोगी, तभी मेरा ताप दूर होगा। सर्वविजयी तुम्हारे गुणोंकी स्फूर्ति होनेसे मैं विवश होकर तुमसे प्रार्थना कर रहा हूँ कि अपने पद-पल्लवको मेरे मस्तक पर अर्पित करो। ये पद-पल्लव अति उदार हैं, ये प्रार्थीजननोंके मनोभीष्टको पूर्ण करनेवाले हैं। नव-पल्लवके समान लालिमा, कोमलता और शैत्य आदि गुणोंसे विभूषित होनेके कारण अलङ्कार-स्वरूप हैं। इन चरणोंको मेरे मस्तक पर अर्पण करनेसे कामजन्य गरलका खण्डन तो होगा ही मेरा मस्तक भी समलंकृत हो जायेगा। यहाँ काममें सर्पविषकी उत्प्रेक्षाकी गयी है। तुम्हारे पैरोंका संस्पर्श पाकर कामगरल उसी प्रकार समाप्त हो जायेगा जिस प्रकार गरुड़का चरण-स्पर्श प्राप्तकर सर्पविष समाप्त हो जाता है। कामजन्य संताप सम्बन्धसे अन्तर्मनमें उदित मनोविकार आदि दोष भी तुम्हारे चरणोंके अर्पण करनेसे समाप्त हो जायेंगे। यह कामक्लेश अति निदारुण है, अनलके समान मेरे हृदयको जला रहा है। एक-एक मर्म अंगार बन रहा है। भीतर-बाहर ज्वलनशील यह काम-ज्वर तुम्हारे पद-पल्लवके सिर पर रखनेसे ही दूर होगा। इस सम्पूर्ण प्रबन्धकी नायिका श्रीराधा प्रौढ़ा तथा मानवती है और नायक श्रीकृष्ण अनुकूल हैं। इति चटुल-चाटु-पटु-चारु मुरवैरिणो राधिकामधि वचन-जातम्। जयति पद्मावती रमण जयदेवकवि भारती भणितमतिशातम् ॥ प्रिये चारुशीले.... ॥८ ॥ अन्वय—इति (उक्तप्रकारं) पद्मावतीरमण-जयदेव-कवि- भारती-भणितं (पद्मावती श्रीराधा-परतया तथानाम्नी श्रीजयदेवपत्नी; तद्गुण-वर्णनादिना तस्याः रमणः स चासौ जयदेवकविश्चेति; तस्य भारत्या वाण्या भणितं वर्णितं) राधिकाम् अधि (राधिकां लक्ष्यीकृत्य इत्यर्थः) चटुल-चाटु-पटु-चारु (चटुलं