भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३१५ त्याग करो। रमणीके अलक्तक रसरञ्जित मनोहर चरणयुगलको देखकर युवाओंके मनमें काम-भावनाका उद्रेक होता ही है। स्मर-गरल-खण्डनं मम शिरसि मण्डनं देहि पद-पल्लवमुदारम्। ज्वलति मयि दारुणो मदन-कदनानलो(१) हरतु तदुपाहितविकारम्॥ प्रिये चारुशीले.... ॥७॥ अन्वय—[अतस्तदङ्गीकारेणैव मे तापोपशमनमिति तद्गुण- स्फूर्तिपरवशः सन् प्रार्थयते]—[अयि प्राणेश्वरि] मम शिरसि (मदीयमस्तके) स्मरगरलखण्डनं (काम-कालकूट-दमनं) उदारं (वाञ्छितप्रदत्वात् महत्) मण्डनं (भूषणरूपं) पदपल्लवं देहि (अर्पय); दारुणः (भीषणः) मदनकदनानलः (कामसन्तापाग्निः) मयि ज्वलति; तदुपाहित-विकारं (तेन मदनतापानलेन उपाहितः उत्पादितः विकारः तम्) [ममेति शेषः] हरतु (शमयतु) [पदपल्लवधारण-मात्रेणैव तापोऽपयास्यतीति भावः] ॥७॥ पद्यानुवाद— धरो पाद-पल्लव, मदन-ताप हर्ता। इसी तप्त शिर पर हृदय शान्ति कर्ता॥ चटुल चाटु पटु हरि, भुला राधिका को। सुलावे हृदय पर, झुला साधिका को॥ प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा। अधर पद्म-रस दे हरो ताप सारा॥ अनुवाद—हे प्रिये! अपने मनोहर चरण किसलयको मेरे मस्तकपर आभूषण-स्वरूप अर्पण कराओ। जिससे मुझे जर्जरित करनेवाला यह अनङ्गरूप गरल प्रशमित हो जाय, मदन यातना रूप निदारुण जो अनल मुझे संतप्त कर रहा है, उससे वह दाहजन्य उत्पन्न विकार भी शान्त हो जाय। (१) मदनकदनारूनः इति क्वचित्; कामक्लेश एव दारुणोऽरुणः सूर्यः मयि ज्वलतीत्यर्थः।