गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१४ श्रीगीतगोविन्दम् परभागं (जनितः कृतः रतिरङ्गे सुरतोत्सवे परभागः परमशोभा येन तादृशं) तव चरणद्वयं (पादयुगलं) सरस-लसदलक्तक-रागं (सरसेन आर्द्रेण लसता दीप्तिमत्ता उज्ज्वलेन इत्यर्थः अलक्तकेन रागं लौहित्यं यत्र तादृशं सुरञ्जितमित्यर्थः) करवाणि (विदधामि) ॥६॥ पद्यानुवाद— चरण युग तुम्हारे, कमलमान गंजन। रमण-राग कारी हृदय-भाग-रंजन॥ लगा दूँ उन्हीं में, इन्हीं हाथसे सब। सजीला रसीला महावर सजनि! अब॥ प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा। अधर पद्म-रस दे तरो ताप सारा॥ अनुवाद—हे सुमधुरवचने ! स्थल-कमलको पराजित करनेवाले, मेरे हृदयकी शोभा बढ़ानेवाले तुम्हारे ये चरण-युगल रतिकालमें कामोद्रेकको अभिवर्द्धित करनेवाले हैं। तुम आदेश करो, ऐसे चरणोंको मैं अलक्तक-रस (महावर) से रञ्जित कर दूँ। बालबोधिनी—श्रीराधा अभी भी कोई उत्तर नहीं दे रही हैं। तब श्रीकृष्ण कहते हैं—हे स्निग्धवचने, अतिशय मधुर वाणी बोलने वाली! कोमल वचनोंसे ही बाण चला लेती हो, तुम अपनी कोमल काकलीसे आज्ञा करो। स्थल-कमलकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाले, मेरे हृदयको अनुरञ्जित करनेवाले इन चरण द्वयको अलता (महावर) रंगसे और रञ्जित कर दूँ, जिससे सुरतक्रीड़ाकी बेलामें ये चरण-युगल और शोभा धारण कर कामोद्रेक कर सकें। ये रंगमय होकर मेरे हृदयका राग बन जाएँ। हे प्रियभाषिणी ! ये अनुरञ्जित चरण-युगल रति-केलिरसमें एक अनिर्वचनीय सुषमाको धारण करेंगे। ये चरण श्रृंगार रसके सरस आधार हैं, शृंगार उत्पत्तिके द्वार हैं, स्पृहाकी उत्पत्ति करानेवाले हैं। चारुचरित्रे ! प्रसन्न हो, मान