गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३१३ सघन री जघन पर रशन मंजु डोले, करें घोष किण-किण, मदन-बोल बोले। प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा, अधर पद्म-रस दे हरो ताप सारा। अनुवाद—तुम्हारे कुच-कुम्भके ऊपर मणिमय मञ्जरी देदीप्यमान होकर तुम्हारे हृदय देशको सुशोभित करें, तुम्हारे परस्पर अविरल जघन युगलके ऊपर विराजमान काञ्चि कन्दर्पके आदेशका उद्घोष करे। बालबोधिनी—वचन-भङ्गीके द्वारा श्रीकृष्ण श्रीराधासे रति-केलिकी प्रार्थना कर रहे हैं। मेरे साथ काम-केलि रूप शुभ कार्यका शुभारम्भ किया जाय, लाज छोड़, तुम रति-क्रीड़ाके लिए कटिबद्ध हो गयी हो। सुरतारम्भसे पूर्व पूर्ण-कलशोंकी प्रतिष्ठा आवश्यक है। कलशवत् विपुलाकार स्तन-कलशों पर मणि-मञ्जरी प्रकाशित हो, अर्थात् यह मणिमय हार दोलायमान होकर तुम्हारे वक्षस्थलको सुशोभित करे, विशाल मध्य भाग मांसल जांघोंको घेरे हुए तुम्हारी करधनी, केलि-क्रीड़ा करते हुए किण-किण मधुर ध्वनि निनादित करती हुई कामदेवकी उमड़ती हुई आकांक्षाओंके आदेशोंकी उद्घोषणा करे। आदेश यह है कि इस वसन्त ऋतुकी मादक बेलामें सभी विलास-प्रवण नर-नारी विलास क्रियामें व्याप्त हो जायें, मानिनी-जन मानका त्याग करके रति-क्रीड़ामें प्रवृत्त हो जायें। स्थल-कमलगञ्जनं मम हृदय-रञ्जनं जनित-रति-रङ्ग-पर भागम्। भृण मसृण वाणि करवाणि चरणद्वयं सरस-लसदलक्तकरागम् ॥ प्रिये.... ॥६॥ अन्वय—हे मसृणवाणि (स्निग्धभाषिणि) भण (कथय, आज्ञापय इत्यर्थः); स्थल-कमल-गञ्जनं (स्थलकमलानां स्थलपद्मानां गञ्जनं तिरस्कारकम्; आरक्तत्वात् कोमलत्वाच्च) मम हृदयरञ्जनं (हृदयरञ्जनं) (हृदयपरितोषकरं) जनित-रति-रङ्ग-