गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 344, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ें३१२ श्रीगीतगोविन्दम् परिपूर्ण कटाक्ष बाणसे कृष्णवर्ण इस शरीरको यदि रञ्जित कर दोगी—तो अनुरूप होगा। बालबोधिनी—श्रीकृष्ण कह रहे हैं—राधे! तुम्हारी आँखें तो स्वाभाविक ही नीलकमलके समान हैं, तुम अपने नेत्रोंको नये-नये अनुराग-रंगमें रञ्जित करनेमें सुनिपुण हो। अपने इन गुणोंको उपकरण रूपमें बनाकर यदि मुझे अङ्गीकार करती हो तो मेरा जीवन चरितार्थ हो जायेगा, पर अधुना तुम्हारे नेत्रोंने सहजताका परित्याग कर रक्तकमलकी आरक्तता धारण कर ली है। यह तो तुम्हारी कोई अनुरञ्जिनी विद्या है। ऐसा स्पष्ट हो रहा है कि कृष्णवर्णकी वस्तुओंको रक्त वर्णकी बना देनेकी तुममें सामर्थ्य है, अतएव तुम यदि इन कटाक्षरूपी मदन-शरोंसे मुझे बेध दो, तब तो मैं समझूँगा कि तुमने विद्याका समुचित प्रयोग किया है। राधे, क्रोध न कर मुझसे प्रेम करो एवं काम-क्रीड़ाव्यावृप्त हो जाओ। यही तुम्हारी स्वाभाविकता है। स्फुरतु कुचकुम्भयोरुपरि मणिमञ्जरी रञ्जयतु तव-हृदयदेशम्। रसतु रसनापि तव घन-जघनमण्डले घोषयतु-मन्मथनिदेशम् ॥ प्रिये.... ॥५ ॥ अन्वय—[एतच्छ्रवणेन किञ्चित् प्रसन्नामवलोक्य आह]—प्रिये, तव कुचकुम्भयोः (स्तनकलसयोः) उपरि मणिमञ्जरी (मणिमाला) स्फुरतु (दोदुल्यमाना भवतु); तव हृदयदेशं रञ्जयतु (शोभयतु) च, [किञ्च] तव घनजघनमण्डले (घने निविड़े जघनमण्डले) रसनापि (काञ्ची अपि) रसतु (शब्दायताम्); मन्मथनिदेशं (मन्मथस्य कामस्य निदेशम् आज्ञां) घोषयतु च (प्रचारयतु) च [वचनभङ्ग्या प्रार्थनाविशेषोऽयम्] ॥५॥ पद्यानुवाद— कनक-कुम्भ पर हार, धारो न अपना, लसे आज जिससे, हृदय-देश दुगुना,