गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३११ रत्न प्राप्तकर अपनेको कृतार्थ मानता है वैसे ही मैं तुम जैसी रमणी-रत्नको प्राप्तकर कृतकृत्य हो रहा हूँ। अतः मेरे ऊपर सदैव अनुकूल बनी रहो—यही मेरा हृदय निरन्तर यत्न कर रहा है। मेरा सम्पूर्ण प्रयास तुम्हारी कृपा प्राप्तिके लिए ही है। नीलनलिनाभमपि तन्वि तव लोचनं धारयति कोकनद-रूपम्। कुसुमशरबाणभावेन यदि रञ्जयसि कृष्णमिदमेतदनुरूपम् ॥ प्रिये.... ॥४॥ अन्वय—[स्वगुण-परीक्षणोपकरणत्वेन चेन्मामङ्गीकरोषि तथापि चरितार्थः स्याम् इत्यत आह]—अयि तन्वि (कृशाङ्गि) नील- नलिनाभमपि (नीलोत्पलतुल्यमपि) तव लोचनं [सम्प्रति अभिमानज-रोषात्] कोकनदरूपं (रक्तोत्पलरूपं) धारयति [एतेन त्वयि अनुरञ्जिनी विद्यास्ति इत्यवधारितम्; एषा विद्या मयि परीक्ष्यताम्]; [परीक्षाप्रकारमाह]—यदि [त्वं] कृष्णं (कृष्णरूपं मां) [तेन लोचनेन] कुसुमशरबाणभावेन (कुसुमशरस्य मदनस्य यः सम्मोहनाख्यः बाणः तस्य भावः उत्पत्तिः यस्मात् तथाभूतेन सानुरागकटाक्षावलोकनेन इत्यर्थः) रञ्जयसि, [तर्हि] इदं (कार्यमेव) एतदनुरूपं (एतस्य लोचनस्य योग्यं) [स्यात्]; शिक्षिता विद्या प्रयोगेणैव साफल्यं व्रजतीति भावः] ॥४॥ पद्यानुवाद— नलिन नेत्र नीले, बने कोकनद से। हुआ कृष्ण रञ्जित, अगर बाण-स्मर से ॥ तभी सिद्ध होगा नयन-रूप सुन्दर। तभी सिद्ध होगा, वदन-रूप सुन्दर ॥ प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा। अधर पद्म-रस दे हरो ताप सारा ॥ अनुवाद—हे कृशाङ्गि ! तुम्हारे इन्दीवरके समान नेत्रोंने इस समय रक्तोपलका रूप धारण किया है। मदन-भावसे