गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१० श्रीगीतगोविन्दम् त्वं मम जीवनं (प्राणभूता) असि [त्वद्व्यतिरेकेण अन्यज्जीवना- दिकमपि मे नास्ति तर्हि अन्याङ्गनानां का वार्त्ता इति भावः]; [किञ्च] त्वं मम भवजलधिरत्नं (भवः संसारः स एव जलधिः तत्र त्वमेव रत्नरूपा सर्वप्रेयसीश्रेष्ठा इत्यर्थः) असि; [यथा कश्चित् रत्नाकरात् विचित्ररत्नं लब्ध्वा आत्मानं पूर्णमनोरथं मनुते तथा स्त्रीरत्नभूतां त्वां प्राप्य कृतार्थोऽस्मीति भावः]; [अतएव] भवती इह (अस्मिन् त्वन्मात्रशरणे) मयि सततम् (सदा) अनुरोधिनी (अनुकूला) भवतु। तत्र (तव आनुकूल्ये) मम हृदयम् (चित्तम्) अतियत्नं (अतिशयेन यत्नो यस्य तत् अतीव यत्नवदित्यर्थः) [तवानुकूल्यलाभार्थमेव हृदयं मे सततं यतते इति भावः]॥३॥ पद्यानुवाद— सखी, प्राण, भूषण तुम्हीं रत्न भव की। द्रवो आज रानी! हरो आग हिय की॥ प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा। अधर पद्म-रस दे हरो ताप सारा॥ अनुवाद—तुम ही मेरी भूषण स्वरूप हो, तुम ही मेरा जीवन हो, तुम ही मेरे संसार-समुद्रके रत्नस्वरूप हो, अब तुम ही सतत मेरे प्रति अनुरोधिनी बनी रहो—यही मेरा एकान्तिक प्रयास है। बालबोधिनी—यदि श्रीराधा कहे कि हे श्रीकृष्ण! मैं तो तुम्हें दण्ड भी नहीं दे पाती, तुम्हारी और भी प्रियाएँ हैं, उन्हींसे जाकर निवेदन करो। तो इस आशंका पर श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिये ! तुम ही मेरा सम्पूर्ण श्रृंगार हो, तुमसे ही अलंकृत होकर तो मैं सर्वत्र सौभाग्यवान हूँ, बाह्य आभूषणकी बात तो दूर रहे तुम ही मेरे जीवनका आधार हो, मेरी प्राण! तुम्हारे बिना तो मैं जी भी नहीं सकता। दूसरी रमणियोंकी तब बात ही कहाँ? तुम ही मुझे इस भवसागरमें मिली अनुपम रत्नराशि हो। जैसे कोई रत्नाकरसे विचित्र