भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३०९ पद्यानुवाद— अगर रोष है, खर-नखर वाण छेदो भुजपाश बाँधो, अधर दन्त भेदो। अनुवाद—हे शोभन-दन्ते! यदि तुम यथार्थमें ही मुझपर कुपित हो रही हो तो मुझपर तीक्ष्ण नख-वाणोंका आघात करो, अपने भुजबन्धनमें मुझे बाँध लो, दाँतोंके आघातसे मेरे होठोंको काटो, जिससे तुम्हें सुख मिले—तुम वही करो। बालबोधिनी—श्रीकृष्ण श्रीराधाको मनाते हुए कह रहे हैं—हे शोभनदन्ते! सुन्दर दन्तराजिसे विलसित प्रियतमे राधे! तुम मेरे प्रति रोष मत करो। यदि वस्तुतः मुझपर क्रोध प्रकाशित ही करना चाहती हो, तो मुझपर अपने तीक्ष्ण नेत्र-वाणोंका प्रहार करो, फिर भी तुम्हारे क्रोधकी शान्ति नहीं होती है, तो मुझे और भी दण्ड दो। अपनी भुजाओंके बन्धनमें मुझे बाँध लो, कैद कर लो, फिर भी सन्तुष्टि नहीं होती है तो अपने दन्त आघातसे मुझे खण्डित कर दो, मेरे शरीरको काट डालो, इससे भी तुम्हें सन्तोष नहीं होता हो तो तुम्हें जो उपाय उचित लगे, वही करो। मैं अपराध योग्य हूँ, दण्डनीय हूँ। अपने सुखके लिए मुझपर किसी भी दण्डका विधान करो। यहाँ ताड़न-बन्धन, खंडन आदिके व्याजसे नखक्षत, आलिङ्गन एवं चुम्बन आदिकी प्रार्थना की जा रही है। त्वमसि मम भूषणं त्वमसि मम जीवनं, त्वमसि मम भव-जलधि-रत्नम्। भवतु भवतीह मयि सततमनुरोधिनी, तत्र मम हृदयमतियत्नम् ॥ प्रिये.... ॥३॥ अन्वय—[ननु या तव प्रियतमा सैव दण्डं विदधातु इति चेत् तत्राह]—अयि प्रियतमे त्वं भूषणम् (अलङ्कारः) असि;