भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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३०८ श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—श्रीकृष्ण श्रीराधाजीसे कहते हैं—हे प्रिये ! तुम्हारा स्वभाव तो अति शोभन है। तुमने मेरे विषयमें जो अकारण मान ठान लिया है, वह तो उचित नहीं है। जबसे तुमने मान किया है, तबसे कामदाह मुझे जलाये जा रहा है, मानका कोई कारण भी तो नहीं है, व्यर्थ ही परस्त्री-रमणकी शंका कर रही हो—तुम्हारे ही आश्रयसे काम मुझे व्यथित कर रहा है। अपने मुखकमलका मुझे मधुपान कराओ, जिससे मेरा अन्तर्दाह प्रशमित हो जायेगा—यह अति दुर्लभ है। इसे जाने दो, पर कुछ बोलो तो सही, अनुकूल अथवा प्रतिकूल, पर कुछ तो कहो—जब तुम कुछ कहोगी तो तुम्हारा मुखकमल विलसित-विकसित होगा। इससे तुम्हारे दन्तकी कान्ति-कौमुदी प्रकाशित होगी और इससे मेरे अन्तःकरणमें निहित भय-तिमिर विनष्ट हो जायेगा। राधे, तुम्हारे चन्द्रवदनसे ऐसी अधर सुधा छलक रही है कि मेरे नयन चकोर तो इस आसवका पान करना चाहते हैं। प्रिये, चारुचरित्रे ! तुम ही तो मेरे नयन-चकोरकी जीवन-स्वरूपा हो। सत्यमेवासि यदि सुदति मयि कोपिनी देहि खरनयनशरघातम्। घटय भुजबन्धनं जनय रदखण्डनं येन वा भवति सुखजातम् ॥ प्रिये.... ॥२॥ अन्वय—अयि सुदति (प्रसन्नवदने) यदि [त्वदेकजीवने] मयि सत्यमेव कोपिनी (क्रुद्धा) असि, [तदा] खरनयन-शरघातं (खरैः तीक्ष्णैः नयन-शरैः घातं प्रहारं) देहि (कुरु इत्यर्थः), [एतेनापि यदि न तुष्यसि] भुजबन्धनं (भुजाभ्यां बन्धनं) घटय (विधेहि); [तेनापि असन्तोषश्चेत्] रदखण्डनं (रदैः दन्तैः खण्डनं दंशनं) जनय (कुरु); [किं बहुना] येन वा (अन्येन) [तव] सुखजातं (सुखसमूहः) भवति [तत्कुरु इति शेषः] [अत्र गूढोऽभिप्रायः स्वीयेऽपराधिनि दण्डएवोचितो नोपेक्षा कर्त्तव्या इति] ॥२॥