भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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अकारणमानोऽयुक्त इति भावः)। मदनाननलः (कामाग्निः) सपदि (झटिति; तव मान-समकालमेव इत्यर्थः), मम मानसं दहति; [तस्मात्] मुखकमल-मधुपानं (मुखमेव कमलं पद्मं तस्य मधु तस्य पानं) देहि (अन्तर्दाहस्य पानेनैव शान्तिः, अतो मां मुखपद्ममधु पायय इत्यर्थः) (ध्रु) ॥ [दुरापमिदं दूरेऽस्तु]—यदि किञ्चिदपि वदसि तदा [तव] दन्तरुचिकौमुदी (दन्तानां रुचिः दीप्तिरेव कौमुदी ज्योत्स्ना) [मम] अतिघोरं (भयजनकं) दरतिमिरं (प्रगाढं हृदय-निहितं तिमिरम् अन्धकारं) हरति। [किञ्च] तव वदनचन्द्रमाः (मुखचन्द्रः) स्फुरदधर-सीधवे (स्फुरतः उच्छलितस्य अधरस्य सीधवे अमृताय अमृतपानार्थमित्यर्थः) [मम] लोचनचकोरं (लोचनं नेत्रमेव चकोरस्तं) रोचयति (साभिलाषं करोति) [नयनस्य चकोरत्वेन त्वदेकजीवनत्वमुक्तम्] ॥१॥ पद्यानुवाद— प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा, अधर-पद्म-रस दे हरो ताप सारा। तनिक बोल बोलो, खिले दन्त ज्योत्स्ना, हरो घोर तम-मय, भरो प्राण-कोना, सुधा सम अधर मधु, वदन चन्द्रमा से— लगे लोल लोचन, चकोरक बने से प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा, अधर पद्म-रस दे हरो ताप सारा॥ अनुवाद—हे प्रिये ! हे सुन्दर स्वभावमयी राधे ! मेरे प्रति इस प्रकार अकारण मानका परिहार करो, मदनाननल मेरे हृदयको दग्ध कर रहा है, मुझे अपने मुखकमलका मधुपान करने दो, यदि तुम मुझसे कुछ भी बात करोगी तो तुम्हारी दशन पंक्तिकी किरणोंकी ज्योतिसे मेरा भय रूपी घोर अंधकार दूर हो जायेगा, तुम्हारा मुखचन्द्र मेरे नयन-चकोरको तुम्हारी अधर-सुधाका पान करनेके लिए अभिलाषी बना दे।