गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
३०८ श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—श्रीकृष्ण श्रीराधाजीसे कहते हैं—हे प्रिये ! तुम्हारा स्वभाव तो अति शोभन है। तुमने मेरे विषयमें जो अकारण मान ठान लिया है, वह तो उचित नहीं है। जबसे तुमने मान किया है, तबसे कामदाह मुझे जलाये जा रहा है, मानका कोई कारण भी तो नहीं है, व्यर्थ ही परस्त्री-रमणकी शंका कर रही हो—तुम्हारे ही आश्रयसे काम मुझे व्यथित कर रहा है। अपने मुखकमलका मुझे मधुपान कराओ, जिससे मेरा अन्तर्दाह प्रशमित हो जायेगा—यह अति दुर्लभ है। इसे जाने दो, पर कुछ बोलो तो सही, अनुकूल अथवा प्रतिकूल, पर कुछ तो कहो—जब तुम कुछ कहोगी तो तुम्हारा मुखकमल विलसित-विकसित होगा। इससे तुम्हारे दन्तकी कान्ति-कौमुदी प्रकाशित होगी और इससे मेरे अन्तःकरणमें निहित भय-तिमिर विनष्ट हो जायेगा। राधे, तुम्हारे चन्द्रवदनसे ऐसी अधर सुधा छलक रही है कि मेरे नयन चकोर तो इस आसवका पान करना चाहते हैं। प्रिये, चारुचरित्रे ! तुम ही तो मेरे नयन-चकोरकी जीवन-स्वरूपा हो। सत्यमेवासि यदि सुदति मयि कोपिनी देहि खरनयनशरघातम्। घटय भुजबन्धनं जनय रदखण्डनं येन वा भवति सुखजातम् ॥ प्रिये.... ॥२॥ अन्वय—अयि सुदति (प्रसन्नवदने) यदि [त्वदेकजीवने] मयि सत्यमेव कोपिनी (क्रुद्धा) असि, [तदा] खरनयन-शरघातं (खरैः तीक्ष्णैः नयन-शरैः घातं प्रहारं) देहि (कुरु इत्यर्थः), [एतेनापि यदि न तुष्यसि] भुजबन्धनं (भुजाभ्यां बन्धनं) घटय (विधेहि); [तेनापि असन्तोषश्चेत्] रदखण्डनं (रदैः दन्तैः खण्डनं दंशनं) जनय (कुरु); [किं बहुना] येन वा (अन्येन) [तव] सुखजातं (सुखसमूहः) भवति [तत्कुरु इति शेषः] [अत्र गूढोऽभिप्रायः स्वीयेऽपराधिनि दण्डएवोचितो नोपेक्षा कर्त्तव्या इति] ॥२॥
दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३०९ पद्यानुवाद— अगर रोष है, खर-नखर वाण छेदो भुजपाश बाँधो, अधर दन्त भेदो। अनुवाद—हे शोभन-दन्ते! यदि तुम यथार्थमें ही मुझपर कुपित हो रही हो तो मुझपर तीक्ष्ण नख-वाणोंका आघात करो, अपने भुजबन्धनमें मुझे बाँध लो, दाँतोंके आघातसे मेरे होठोंको काटो, जिससे तुम्हें सुख मिले—तुम वही करो। बालबोधिनी—श्रीकृष्ण श्रीराधाको मनाते हुए कह रहे हैं—हे शोभनदन्ते! सुन्दर दन्तराजिसे विलसित प्रियतमे राधे! तुम मेरे प्रति रोष मत करो। यदि वस्तुतः मुझपर क्रोध प्रकाशित ही करना चाहती हो, तो मुझपर अपने तीक्ष्ण नेत्र-वाणोंका प्रहार करो, फिर भी तुम्हारे क्रोधकी शान्ति नहीं होती है, तो मुझे और भी दण्ड दो। अपनी भुजाओंके बन्धनमें मुझे बाँध लो, कैद कर लो, फिर भी सन्तुष्टि नहीं होती है तो अपने दन्त आघातसे मुझे खण्डित कर दो, मेरे शरीरको काट डालो, इससे भी तुम्हें सन्तोष नहीं होता हो तो तुम्हें जो उपाय उचित लगे, वही करो। मैं अपराध योग्य हूँ, दण्डनीय हूँ। अपने सुखके लिए मुझपर किसी भी दण्डका विधान करो। यहाँ ताड़न-बन्धन, खंडन आदिके व्याजसे नखक्षत, आलिङ्गन एवं चुम्बन आदिकी प्रार्थना की जा रही है। त्वमसि मम भूषणं त्वमसि मम जीवनं, त्वमसि मम भव-जलधि-रत्नम्। भवतु भवतीह मयि सततमनुरोधिनी, तत्र मम हृदयमतियत्नम् ॥ प्रिये.... ॥३॥ अन्वय—[ननु या तव प्रियतमा सैव दण्डं विदधातु इति चेत् तत्राह]—अयि प्रियतमे त्वं भूषणम् (अलङ्कारः) असि;
३१० श्रीगीतगोविन्दम् त्वं मम जीवनं (प्राणभूता) असि [त्वद्व्यतिरेकेण अन्यज्जीवना- दिकमपि मे नास्ति तर्हि अन्याङ्गनानां का वार्त्ता इति भावः]; [किञ्च] त्वं मम भवजलधिरत्नं (भवः संसारः स एव जलधिः तत्र त्वमेव रत्नरूपा सर्वप्रेयसीश्रेष्ठा इत्यर्थः) असि; [यथा कश्चित् रत्नाकरात् विचित्ररत्नं लब्ध्वा आत्मानं पूर्णमनोरथं मनुते तथा स्त्रीरत्नभूतां त्वां प्राप्य कृतार्थोऽस्मीति भावः]; [अतएव] भवती इह (अस्मिन् त्वन्मात्रशरणे) मयि सततम् (सदा) अनुरोधिनी (अनुकूला) भवतु। तत्र (तव आनुकूल्ये) मम हृदयम् (चित्तम्) अतियत्नं (अतिशयेन यत्नो यस्य तत् अतीव यत्नवदित्यर्थः) [तवानुकूल्यलाभार्थमेव हृदयं मे सततं यतते इति भावः]॥३॥ पद्यानुवाद— सखी, प्राण, भूषण तुम्हीं रत्न भव की। द्रवो आज रानी! हरो आग हिय की॥ प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा। अधर पद्म-रस दे हरो ताप सारा॥ अनुवाद—तुम ही मेरी भूषण स्वरूप हो, तुम ही मेरा जीवन हो, तुम ही मेरे संसार-समुद्रके रत्नस्वरूप हो, अब तुम ही सतत मेरे प्रति अनुरोधिनी बनी रहो—यही मेरा एकान्तिक प्रयास है। बालबोधिनी—यदि श्रीराधा कहे कि हे श्रीकृष्ण! मैं तो तुम्हें दण्ड भी नहीं दे पाती, तुम्हारी और भी प्रियाएँ हैं, उन्हींसे जाकर निवेदन करो। तो इस आशंका पर श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिये ! तुम ही मेरा सम्पूर्ण श्रृंगार हो, तुमसे ही अलंकृत होकर तो मैं सर्वत्र सौभाग्यवान हूँ, बाह्य आभूषणकी बात तो दूर रहे तुम ही मेरे जीवनका आधार हो, मेरी प्राण! तुम्हारे बिना तो मैं जी भी नहीं सकता। दूसरी रमणियोंकी तब बात ही कहाँ? तुम ही मुझे इस भवसागरमें मिली अनुपम रत्नराशि हो। जैसे कोई रत्नाकरसे विचित्र
दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३११ रत्न प्राप्तकर अपनेको कृतार्थ मानता है वैसे ही मैं तुम जैसी रमणी-रत्नको प्राप्तकर कृतकृत्य हो रहा हूँ। अतः मेरे ऊपर सदैव अनुकूल बनी रहो—यही मेरा हृदय निरन्तर यत्न कर रहा है। मेरा सम्पूर्ण प्रयास तुम्हारी कृपा प्राप्तिके लिए ही है। नीलनलिनाभमपि तन्वि तव लोचनं धारयति कोकनद-रूपम्। कुसुमशरबाणभावेन यदि रञ्जयसि कृष्णमिदमेतदनुरूपम् ॥ प्रिये.... ॥४॥ अन्वय—[स्वगुण-परीक्षणोपकरणत्वेन चेन्मामङ्गीकरोषि तथापि चरितार्थः स्याम् इत्यत आह]—अयि तन्वि (कृशाङ्गि) नील- नलिनाभमपि (नीलोत्पलतुल्यमपि) तव लोचनं [सम्प्रति अभिमानज-रोषात्] कोकनदरूपं (रक्तोत्पलरूपं) धारयति [एतेन त्वयि अनुरञ्जिनी विद्यास्ति इत्यवधारितम्; एषा विद्या मयि परीक्ष्यताम्]; [परीक्षाप्रकारमाह]—यदि [त्वं] कृष्णं (कृष्णरूपं मां) [तेन लोचनेन] कुसुमशरबाणभावेन (कुसुमशरस्य मदनस्य यः सम्मोहनाख्यः बाणः तस्य भावः उत्पत्तिः यस्मात् तथाभूतेन सानुरागकटाक्षावलोकनेन इत्यर्थः) रञ्जयसि, [तर्हि] इदं (कार्यमेव) एतदनुरूपं (एतस्य लोचनस्य योग्यं) [स्यात्]; शिक्षिता विद्या प्रयोगेणैव साफल्यं व्रजतीति भावः] ॥४॥ पद्यानुवाद— नलिन नेत्र नीले, बने कोकनद से। हुआ कृष्ण रञ्जित, अगर बाण-स्मर से ॥ तभी सिद्ध होगा नयन-रूप सुन्दर। तभी सिद्ध होगा, वदन-रूप सुन्दर ॥ प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा। अधर पद्म-रस दे हरो ताप सारा ॥ अनुवाद—हे कृशाङ्गि ! तुम्हारे इन्दीवरके समान नेत्रोंने इस समय रक्तोपलका रूप धारण किया है। मदन-भावसे
३१२ श्रीगीतगोविन्दम् परिपूर्ण कटाक्ष बाणसे कृष्णवर्ण इस शरीरको यदि रञ्जित कर दोगी—तो अनुरूप होगा। बालबोधिनी—श्रीकृष्ण कह रहे हैं—राधे! तुम्हारी आँखें तो स्वाभाविक ही नीलकमलके समान हैं, तुम अपने नेत्रोंको नये-नये अनुराग-रंगमें रञ्जित करनेमें सुनिपुण हो। अपने इन गुणोंको उपकरण रूपमें बनाकर यदि मुझे अङ्गीकार करती हो तो मेरा जीवन चरितार्थ हो जायेगा, पर अधुना तुम्हारे नेत्रोंने सहजताका परित्याग कर रक्तकमलकी आरक्तता धारण कर ली है। यह तो तुम्हारी कोई अनुरञ्जिनी विद्या है। ऐसा स्पष्ट हो रहा है कि कृष्णवर्णकी वस्तुओंको रक्त वर्णकी बना देनेकी तुममें सामर्थ्य है, अतएव तुम यदि इन कटाक्षरूपी मदन-शरोंसे मुझे बेध दो, तब तो मैं समझूँगा कि तुमने विद्याका समुचित प्रयोग किया है। राधे, क्रोध न कर मुझसे प्रेम करो एवं काम-क्रीड़ाव्यावृप्त हो जाओ। यही तुम्हारी स्वाभाविकता है। स्फुरतु कुचकुम्भयोरुपरि मणिमञ्जरी रञ्जयतु तव-हृदयदेशम्। रसतु रसनापि तव घन-जघनमण्डले घोषयतु-मन्मथनिदेशम् ॥ प्रिये.... ॥५ ॥ अन्वय—[एतच्छ्रवणेन किञ्चित् प्रसन्नामवलोक्य आह]—प्रिये, तव कुचकुम्भयोः (स्तनकलसयोः) उपरि मणिमञ्जरी (मणिमाला) स्फुरतु (दोदुल्यमाना भवतु); तव हृदयदेशं रञ्जयतु (शोभयतु) च, [किञ्च] तव घनजघनमण्डले (घने निविड़े जघनमण्डले) रसनापि (काञ्ची अपि) रसतु (शब्दायताम्); मन्मथनिदेशं (मन्मथस्य कामस्य निदेशम् आज्ञां) घोषयतु च (प्रचारयतु) च [वचनभङ्ग्या प्रार्थनाविशेषोऽयम्] ॥५॥ पद्यानुवाद— कनक-कुम्भ पर हार, धारो न अपना, लसे आज जिससे, हृदय-देश दुगुना,
दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३१३ सघन री जघन पर रशन मंजु डोले, करें घोष किण-किण, मदन-बोल बोले। प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा, अधर पद्म-रस दे हरो ताप सारा। अनुवाद—तुम्हारे कुच-कुम्भके ऊपर मणिमय मञ्जरी देदीप्यमान होकर तुम्हारे हृदय देशको सुशोभित करें, तुम्हारे परस्पर अविरल जघन युगलके ऊपर विराजमान काञ्चि कन्दर्पके आदेशका उद्घोष करे। बालबोधिनी—वचन-भङ्गीके द्वारा श्रीकृष्ण श्रीराधासे रति-केलिकी प्रार्थना कर रहे हैं। मेरे साथ काम-केलि रूप शुभ कार्यका शुभारम्भ किया जाय, लाज छोड़, तुम रति-क्रीड़ाके लिए कटिबद्ध हो गयी हो। सुरतारम्भसे पूर्व पूर्ण-कलशोंकी प्रतिष्ठा आवश्यक है। कलशवत् विपुलाकार स्तन-कलशों पर मणि-मञ्जरी प्रकाशित हो, अर्थात् यह मणिमय हार दोलायमान होकर तुम्हारे वक्षस्थलको सुशोभित करे, विशाल मध्य भाग मांसल जांघोंको घेरे हुए तुम्हारी करधनी, केलि-क्रीड़ा करते हुए किण-किण मधुर ध्वनि निनादित करती हुई कामदेवकी उमड़ती हुई आकांक्षाओंके आदेशोंकी उद्घोषणा करे। आदेश यह है कि इस वसन्त ऋतुकी मादक बेलामें सभी विलास-प्रवण नर-नारी विलास क्रियामें व्याप्त हो जायें, मानिनी-जन मानका त्याग करके रति-क्रीड़ामें प्रवृत्त हो जायें। स्थल-कमलगञ्जनं मम हृदय-रञ्जनं जनित-रति-रङ्ग-पर भागम्। भृण मसृण वाणि करवाणि चरणद्वयं सरस-लसदलक्तकरागम् ॥ प्रिये.... ॥६॥ अन्वय—हे मसृणवाणि (स्निग्धभाषिणि) भण (कथय, आज्ञापय इत्यर्थः); स्थल-कमल-गञ्जनं (स्थलकमलानां स्थलपद्मानां गञ्जनं तिरस्कारकम्; आरक्तत्वात् कोमलत्वाच्च) मम हृदयरञ्जनं (हृदयरञ्जनं) (हृदयपरितोषकरं) जनित-रति-रङ्ग-
३१४ श्रीगीतगोविन्दम् परभागं (जनितः कृतः रतिरङ्गे सुरतोत्सवे परभागः परमशोभा येन तादृशं) तव चरणद्वयं (पादयुगलं) सरस-लसदलक्तक-रागं (सरसेन आर्द्रेण लसता दीप्तिमत्ता उज्ज्वलेन इत्यर्थः अलक्तकेन रागं लौहित्यं यत्र तादृशं सुरञ्जितमित्यर्थः) करवाणि (विदधामि) ॥६॥ पद्यानुवाद— चरण युग तुम्हारे, कमलमान गंजन। रमण-राग कारी हृदय-भाग-रंजन॥ लगा दूँ उन्हीं में, इन्हीं हाथसे सब। सजीला रसीला महावर सजनि! अब॥ प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा। अधर पद्म-रस दे तरो ताप सारा॥ अनुवाद—हे सुमधुरवचने ! स्थल-कमलको पराजित करनेवाले, मेरे हृदयकी शोभा बढ़ानेवाले तुम्हारे ये चरण-युगल रतिकालमें कामोद्रेकको अभिवर्द्धित करनेवाले हैं। तुम आदेश करो, ऐसे चरणोंको मैं अलक्तक-रस (महावर) से रञ्जित कर दूँ। बालबोधिनी—श्रीराधा अभी भी कोई उत्तर नहीं दे रही हैं। तब श्रीकृष्ण कहते हैं—हे स्निग्धवचने, अतिशय मधुर वाणी बोलने वाली! कोमल वचनोंसे ही बाण चला लेती हो, तुम अपनी कोमल काकलीसे आज्ञा करो। स्थल-कमलकी शोभाको तिरस्कृत करनेवाले, मेरे हृदयको अनुरञ्जित करनेवाले इन चरण द्वयको अलता (महावर) रंगसे और रञ्जित कर दूँ, जिससे सुरतक्रीड़ाकी बेलामें ये चरण-युगल और शोभा धारण कर कामोद्रेक कर सकें। ये रंगमय होकर मेरे हृदयका राग बन जाएँ। हे प्रियभाषिणी ! ये अनुरञ्जित चरण-युगल रति-केलिरसमें एक अनिर्वचनीय सुषमाको धारण करेंगे। ये चरण श्रृंगार रसके सरस आधार हैं, शृंगार उत्पत्तिके द्वार हैं, स्पृहाकी उत्पत्ति करानेवाले हैं। चारुचरित्रे ! प्रसन्न हो, मान
दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३१५ त्याग करो। रमणीके अलक्तक रसरञ्जित मनोहर चरणयुगलको देखकर युवाओंके मनमें काम-भावनाका उद्रेक होता ही है। स्मर-गरल-खण्डनं मम शिरसि मण्डनं देहि पद-पल्लवमुदारम्। ज्वलति मयि दारुणो मदन-कदनानलो(१) हरतु तदुपाहितविकारम्॥ प्रिये चारुशीले.... ॥७॥ अन्वय—[अतस्तदङ्गीकारेणैव मे तापोपशमनमिति तद्गुण- स्फूर्तिपरवशः सन् प्रार्थयते]—[अयि प्राणेश्वरि] मम शिरसि (मदीयमस्तके) स्मरगरलखण्डनं (काम-कालकूट-दमनं) उदारं (वाञ्छितप्रदत्वात् महत्) मण्डनं (भूषणरूपं) पदपल्लवं देहि (अर्पय); दारुणः (भीषणः) मदनकदनानलः (कामसन्तापाग्निः) मयि ज्वलति; तदुपाहित-विकारं (तेन मदनतापानलेन उपाहितः उत्पादितः विकारः तम्) [ममेति शेषः] हरतु (शमयतु) [पदपल्लवधारण-मात्रेणैव तापोऽपयास्यतीति भावः] ॥७॥ पद्यानुवाद— धरो पाद-पल्लव, मदन-ताप हर्ता। इसी तप्त शिर पर हृदय शान्ति कर्ता॥ चटुल चाटु पटु हरि, भुला राधिका को। सुलावे हृदय पर, झुला साधिका को॥ प्रिये! चारुशीले! तजो मान प्यारा। अधर पद्म-रस दे हरो ताप सारा॥ अनुवाद—हे प्रिये! अपने मनोहर चरण किसलयको मेरे मस्तकपर आभूषण-स्वरूप अर्पण कराओ। जिससे मुझे जर्जरित करनेवाला यह अनङ्गरूप गरल प्रशमित हो जाय, मदन यातना रूप निदारुण जो अनल मुझे संतप्त कर रहा है, उससे वह दाहजन्य उत्पन्न विकार भी शान्त हो जाय। (१) मदनकदनारूनः इति क्वचित्; कामक्लेश एव दारुणोऽरुणः सूर्यः मयि ज्वलतीत्यर्थः।
३१६ श्रीगीतगोविन्दम् बालबोधिनी—हे राधे ! मुझे अङ्गीकार करोगी, तभी मेरा ताप दूर होगा। सर्वविजयी तुम्हारे गुणोंकी स्फूर्ति होनेसे मैं विवश होकर तुमसे प्रार्थना कर रहा हूँ कि अपने पद-पल्लवको मेरे मस्तक पर अर्पित करो। ये पद-पल्लव अति उदार हैं, ये प्रार्थीजननोंके मनोभीष्टको पूर्ण करनेवाले हैं। नव-पल्लवके समान लालिमा, कोमलता और शैत्य आदि गुणोंसे विभूषित होनेके कारण अलङ्कार-स्वरूप हैं। इन चरणोंको मेरे मस्तक पर अर्पण करनेसे कामजन्य गरलका खण्डन तो होगा ही मेरा मस्तक भी समलंकृत हो जायेगा। यहाँ काममें सर्पविषकी उत्प्रेक्षाकी गयी है। तुम्हारे पैरोंका संस्पर्श पाकर कामगरल उसी प्रकार समाप्त हो जायेगा जिस प्रकार गरुड़का चरण-स्पर्श प्राप्तकर सर्पविष समाप्त हो जाता है। कामजन्य संताप सम्बन्धसे अन्तर्मनमें उदित मनोविकार आदि दोष भी तुम्हारे चरणोंके अर्पण करनेसे समाप्त हो जायेंगे। यह कामक्लेश अति निदारुण है, अनलके समान मेरे हृदयको जला रहा है। एक-एक मर्म अंगार बन रहा है। भीतर-बाहर ज्वलनशील यह काम-ज्वर तुम्हारे पद-पल्लवके सिर पर रखनेसे ही दूर होगा। इस सम्पूर्ण प्रबन्धकी नायिका श्रीराधा प्रौढ़ा तथा मानवती है और नायक श्रीकृष्ण अनुकूल हैं। इति चटुल-चाटु-पटु-चारु मुरवैरिणो राधिकामधि वचन-जातम्। जयति पद्मावती रमण जयदेवकवि भारती भणितमतिशातम् ॥ प्रिये चारुशीले.... ॥८ ॥ अन्वय—इति (उक्तप्रकारं) पद्मावतीरमण-जयदेव-कवि- भारती-भणितं (पद्मावती श्रीराधा-परतया तथानाम्नी श्रीजयदेवपत्नी; तद्गुण-वर्णनादिना तस्याः रमणः स चासौ जयदेवकविश्चेति; तस्य भारत्या वाण्या भणितं वर्णितं) राधिकाम् अधि (राधिकां लक्ष्यीकृत्य इत्यर्थः) चटुल-चाटु-पटु-चारु (चटुलं
दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३१७ चातुर्ययुक्तं चाटु प्रीतिकरं पटु कौशलपूर्णं चारु मनोहरं; यद्वा चटुलं चञ्चलं नानाविधमितियावत्, चटुल-चाटुना पटु मानापनयनसमर्थं चारु शोभनं) अतिशातं (परमसुखप्रदमित्यर्थः) सुरवैरिणः (मुरारेः) वचनजातं (वाक्यसमूहः) जयति (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तताम्) ॥८॥ अनुवाद—पद्मावतीके प्रिय श्रीजयदेव कवि द्वारा विरचित राधिकाको सम्बोधित करके श्रीकृष्ण द्वारा उक्त चाटुयुक्त सुकुमार, मान हरणमें कुशल, मोहन माधुरीपूर्ण वचन समुदायकी जय हो। बालबोधिनी—इस प्रकार मुरवैरी श्रीकृष्णकी यह वचनावली जो श्रीराधाको अभिलषित करके सर्वोत्कृष्ट रूपसे प्रकाशित हुई है, वे सब प्रकारसे जययुक्त हों। अपनी परम प्रेयसी श्रीराधाके मान-अपमान हेतु ये वाक्य समूह अति समर्थ एवं परम सुखप्रद हैं। इस मनोहर अष्टपदीमें चतुर एवं प्रिय मीठी बातोंका ही संकलन है, पद्मावती अर्थात् श्रीराधा-श्रीकृष्णके ऊपर विजयिनी हों और विजयी हों। भारतीसे भूषित, पद्मावती-पति जयदेव, इसी अष्टपदीमें कवि जयदेवकी स्फूर्ति को श्रीकृष्णने जयदेवके वेशमें स्वयं लिपिबद्ध किया है—देहि पदपल्लवं मे उदारम्....। यह गीत गीतगोविन्दका उन्नीसवाँ प्रबन्ध है। इस प्रबन्धका नाम चतुर्भुजरागराजिचन्द्रोद्योत है। परिहर कृतातङ्के! शङ्कां त्वया सततं घन स्तनजघनया क्रान्ते स्वान्ते परानवकाशिनि। विशति वितनोरन्यो धन्यो न कोऽपि ममान्तरं प्रणयिनि! परिरम्भारम्भे विधेहि विधेयताम् ॥१॥ अन्वय—[अपरमपि कृत्यं विज्ञापयितुमाह]—अयि कृतातङ्के (कृतः आतङ्कः सन्देहः अन्यस्त्रीसम्भोगवितर्क इत्यर्थः यया तत्सम्बुद्धौ) शङ्कां परिहर (त्यज); सततं (निरन्तरं; नतु
३१८ श्रीगीतगोविन्दम्
क्षणमिति भावः) घनस्तनजघनया (घनं निविड़ं स्तनजघनं यस्याः तादृश्या) [त्वया] क्रान्ते (निरन्तरं व्याप्ते) [अतः] परानवकाशिनि (अन्यावकाश-शून्ये) स्वान्ते (मदीये मनसि) वितनोः (तनुशून्यात् कामात्) अन्यः कोऽपि धन्यः (तादृक् सौभाग्यवान्) अन्तरं (अभ्यन्तरं) न विशति [मनोद्वारेणैव एतदभ्यन्तरं प्रविश्यते; मनस्तु मे त्वया परिव्याप्तं तर्हि केन पथा प्रवेष्टव्यमन्येन शरीरिणा जनेन, कामस्तु मनोभवः अतस्तत्र तस्यैव प्रवेशेऽधिकारोऽस्तीत्यर्थः]; [शङ्कां त्यक्त्वा यत् कर्त्तव्यं तदाह]—हे प्रणयिनि परीरम्भारम्भे (परीरम्भस्य आश्लेषस्य आरम्भे उपक्रमे) विधेयतां (इतिकर्त्तव्यतां) विधेहि (व्यवस्थापय) ॥१॥ पद्यानुवाद— घन उर जघन सतत आक्रांते! स्वान्ते। मम मन सूना। तज शंका भुजमें भर जाओ, जो हुलास हिय दूना॥ अनुवाद—दूसरी नायिकाके प्रति मुझे आसक्त समझकर व्यर्थकी शंकाओंका परित्याग कर दो। परस्पर अविरल स्तन एवं जघन युगल शालिनी हे प्रणयिनी राधे! मेरे मनमें किसी दूसरी नायिकाके लिए अवकाश ही नहीं है। मदनके अतिरिक्त दूसरे किसीके प्रवेश करनेका सौभाग्य नहीं है। परिरम्भणके लिए अब मुझे आदेश दो। बालबोधिनी—अब श्रीकृष्ण श्रीराधासे कह रहे हैं—क्यों यह शंका अपने मनमें व्यर्थ ही पैदा कर ली है। अन्य वनिता-सङ्गका आरोप मुझपर मत लगाओ। मेरा तो अन्तःस्थल और हृदय तुम्हारे कुच-कलशों एवं जघनोंके भारसे इस तरह आक्रान्त है कि कहीं दूसरोंकी स्मृतिका अवकाश ही नहीं है। मेरे हृदयमें तुम्हारे प्यारने सम्पूर्ण रूपसे व्याप्त होकर आक्रमण कर लिया है, वहाँ दूसरेके लिए किञ्चिन्मात्र भी स्थान नहीं है। वहाँ कोई कैसे प्रवेश कर सकता है। तुम्हारे रहनेसे मेरे हृदयमें मदनके अतिरिक्त
दशमः सर्गः-चतुरचतुर्भुजः ३१९ अन्य किसीको प्रवेश करनेका सौभाग्य प्राप्त नहीं है। हे प्रणयिनि राधे! अब मानका परित्याग भी करो। अब तुम ऐसा करो कि मैं तुम्हारे स्तनमण्डलका आलिङ्गन कर सकूँ। अपना किंकर बनाकर मुझे तदर्थ अनुमति दो। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी नामक वृत्त तथा काव्यलिंग नामक अलंकार है। श्रीराधा प्रौढ़ नायिका हैं और श्रीकृष्ण प्रगल्भ नायक हैं। मुग्धे विधेहि मयि निर्दय-दन्तदंश दोर्वल्लि-बन्ध-निबिडस्तन-पीडनानि । चण्डि ! त्वमेव मुदमुञ्च न पञ्चबाण- चाण्डाल-काण्ड-दलनादसवः प्रयान्तु ॥२॥ अन्वय-[यदि मद्रचनात् न प्रत्येषि तर्हि स्वयमेव दण्डमाचरेत्याह]-अयि मुग्धे, मयि निर्दय-दन्तदंशः-दोर्वल्लि- बन्ध-निविड़-स्तनपीड़नानि (निर्दयं, निष्ठुरं यथा तथा दन्तदंशः दशनाघातः तथा दोर्वल्लिबन्धः भुजलताबन्धनं तथा निविड़ाभ्यां स्तनाभ्यां पीड़नञ्च तानि) विधेहि (घटय)। अयि चण्डि (कोपने) त्वमेव मूदम् (सुखं) अञ्च (प्राप्नुहि) [तव सुखोत्पादनाय ईदृग्विधेन दण्डेन यदि मे प्राणा यान्ति, यान्तु, परं] पञ्चबाण-चाण्डाल-काण्ड-दलनात् (पञ्चबाण एव चाण्डालः दुष्टचेष्टत्वादिति भावः तस्य काण्डदलनात् बाणप्रहारात्) मम असवः (प्राणाः) न प्रयान्तु (गच्छन्तु) ॥२॥ पद्यानुवाद- पञ्चबाण-चाण्डाल बाणसे, प्राण न जायें मेरे। निज अपराधीको रदसे, अब छेदो तुम्हीं सबेरे॥ और बाँध लो बाहुलताके, बन्धनमें अति मुझको। दृढ़ कुच-पीड़ा दे हँस बोलो, बन्दी मुक्ति न तुझको ॥ अनुवाद-हे विमुग्धे! यदि मैं अपराधी हूँ तो मुझे दण्ड देने में विलम्ब क्यों कर रही हो? दण्ड दो-अपने दाँतोके
३२० श्रीगीतगोविन्दम् दंशनसे निर्दय होकर आघात करो, भुज-लता द्वारा प्रगाढ़ रूपसे मुझे बाँध लो। कठिन स्तनोंसे प्रबल उत्पीड़न करो। हे कोपमयि! मुझको इस प्रकार कठोर दण्ड देकर तुम्हीं सुखी होओ। ऐसे कठोर दण्डसे यदि मेरे प्राण निकल जायें तो भले निकल जायें, परन्तु मदनरूप चाण्डालके बाण प्रहारसे मेरे प्राण न जायें॥२॥ बालबोधिनी— श्रीकृष्ण श्रीराधासे कहते हैं- हे मुग्धे ! यदि तुम्हें मेरे वचनोंपर विश्वास नहीं है, तो मुझे दण्ड दे सकती हो। क्रोधके आवेशमें तुम मुझे समझनेका प्रयास ही नहीं कर रही हो। अतः तुम यथेच्छ रूपसे मुझपर शासन करो। कन्दर्प-चाण्डाल अपने पञ्चबाणोंसे मुझे मारनेकी चेष्टा कर रहा है, पर इतनी कृपा करना कि मेरे प्राण न चले जायें। हे आत्महितानभिज्ञे ! चण्डित्वका परित्याग करो। तुम्हारे ही सम्बन्धसे इस चाण्डाल कामदेवके बाणोंसे विदीर्ण हो मेरे प्राण निकले जा रहे हैं। इससे मेरी रक्षा करो। मुझे दण्ड देकर तुम सुखी हो जाओ, निर्दयतासे दांतों द्वारा काट डालो, निविड़ स्तनोंसे मुझे पीस डालो, भुजलताओँसे कसकर बाँध लो। मुझसे हँसकर कह दो- अब तुम मेरे बन्दी हो, मेरे बन्धनसे अब कभी भी तुम मुक्त न हो सकोगे। शशिमुखि ! तव भाति भङ्गुर भ्रू, र्युवजनमोह-कराल कालसर्पी। तदुदित-भय-भञ्जनाय यूनां त्वदधर-सीधु-सुधैव सिद्धमंत्रः ॥३॥ अन्वय—[मम कोपो नास्त्येव चेत् तत्राह] — अयि शशिमुखि (चन्द्रानने), तव भङ्गुरभ्रूः (भङ्गुरा कुटिला भ्रूः) [यदि कोपिना नासि तत् कुतस्ते भ्रुवोर्भङ्गुरत्वम्?], युवजन-मोह-कराल- कालसर्पी (युवजनानां तरुणानाम् अस्माकं मोहाय मूर्च्छाविधानाय
दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३२१ कराला भीषणा कालसर्पा भाति विराजते), तदुदित-भय-भञ्जनाय तस्याः भ्रुवः उदितस्य भयस्य भञ्जनाय नाशाय) यूनां [अस्माकं] त्वदधर-सीधु-सुधैव (तव अधर-मधुरूपा सुधा एव; मादकत्वात् सीधु इति मधुरत्वाच्च सुधेत्युक्तम्) सिद्धमन्त्रः [नान्यत् किञ्चिदित्यर्थः] [अमृतपानेनैव विषभयं निवर्तते इति भावः] ॥३॥ पद्यानुवाद— बंकिम भौंहें नागिनि तेरी डस लेती जब जन को। अधर सुधा ही विष हरता है, विरुज बनाता तन को॥ अनुवाद—हे शशिमुखि ! तुम्हारी कुटिल भ्रूलता युवजन विह्वलकारी कराल कालजयी सर्पिणीके समान है। इससे उत्पन्न भयको भञ्जन हेतु तुम्हारे अधरसे विगलित मदिरा सुधा ही एकमात्र सिद्धमन्त्र स्वरूप है। बालबोधिनी—श्रीकृष्ण वात्स्यायन-न्यायका आश्रय लेकर कहते हैं—हे चन्द्रमुखि ! तुम्हारा मुखमण्डल तो चन्द्रमा सरीखा है, परन्तु तुम्हारे मुखपर विद्यमान भौंहें अति कुटिल हैं, जो मेरे जैसे युवजनोंके लिए महाभयंकर काल सर्पिणीके समान मोहित करनेवाली, अत्यन्त भयका उत्पादन कर रही हैं, अरे जो हिंस्रमुखी होती हैं, परन्तु तुम तो चन्द्रमुखी हो। तरुणोंके प्रति कोप प्रकाशित मत करो। इस काल नागिनीके काटनेपर कोई युवक बच नहीं सकता, न ही कोई ऐसी औषध है, जिससे गरलकी ज्वाला शान्त हो जाय। हाँ, तुम्हारी अधर-सुधा ही तुम्हारी भ्रू-रूपिणी सर्पिणीके डँसनेसे उत्पन्न विषको शान्त करनेके लिए सिद्धमन्त्र स्वरूप है। प्रस्तुत श्लोकमें पुष्पिताग्रा छंद है। कल्पितोपमा एवं रूपक अलंकार है।
३२२ श्रीगीतगोविन्दम् व्यथयति वृथा मौनं तन्वि! प्रपञ्चय पञ्चमं, तरुणि मधुरालापैस्तापं विनोदय दृष्टिभिः। सुमुखि! विमुखी भावं तावद्विमुञ्च न मुञ्च मां स्वयमतिशयस्निग्धो मुग्धे। प्रियोऽयमुपस्थितः ॥४ ॥ अन्वय—[एवमुक्तेऽपि अनुत्तरामाह]—अयि तन्वि (कृशाङ्गि! मामप्राप्य त्वमपि कृशासीति भावः), [यस्मात् तव] वृथा (अकारणं) मौनं (तूष्णीम्भावः) मां व्यथयति (सन्तापयति) [तस्मात्] पञ्चमं (स्वरं) प्रपञ्चय (विस्तारय); [मधुरमालप इति भावः]। हे तरुणि (किशोरि) मधुरालापैः (मधुरैः आलापैः भाषितैः) तापं (मन्मथसन्तापं) विनोदय (प्रशमय)। हे सुमुखि (सुवदने), दृष्टिभिः (कृपास्निग्धावलोकनैः) विमुखीभावं (वैमुख्यं प्रत्याख्यानकार्कश्यमिति यावत्) विमुञ्च (त्यज) मां न मुञ्च (मा त्याक्षीः) [सुमुख्यास्ते विमुखीभावो न युक्त इत्यर्थः]। [कथमेवं करोमीत्याह]—हे मुग्धे (विचारमूढे) प्रियः अयम् अतिशयस्निग्धः (अतिप्रेमवान्), [कथं स्निग्धज्ञानम् अत आह]—स्वयम् [अनाहूत एव] उपस्थितः (आगतः), [अतस्त्यागे मूढ़ता एवेत्यर्थः] ॥४॥ पद्यानुवाद— तन्वि! मौन हो मार रही क्यों? पंचम स्वरमें बोलो। तरल दीठसे देख हृदयके, सारे बन्धन खोलो॥ विमुख भाव यह सुमुखि! तुम्हारा अनुचित आज बड़ा है। स्वयं स्निग्ध अतिशय तव प्रिय, यह मुग्धे! सजल खड़ा है॥ अनुवाद—हे कृशाङ्गि! तुम्हारा यह व्यर्थ मौन-अवलम्बन मुझे व्यथित कर रहा है। हे तरुणि! पञ्चम स्वरका विस्तार करो। मधुर आलापों तथा कृपा अवलोकनके द्वारा मेरे संतापका विमोचन करो। हे सुमुखि! अपनी विमुखताके भावका परित्याग करो, मेरा त्याग नहीं। हे अविचारकारिणि! तुमसे अतिशय स्नेह करनेवाला तुम्हारा प्रिय यहाँ उपस्थित है।
दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३२३ बालबोधिनी—श्रीराधाने अब भी कोई उत्तर न दिया, तब श्रीकृष्ण अत्यन्त अनुनय भरे वचनोंसे उनसे कहने लगे—हे तन्वि ! कितनी कृशताको प्राप्त हो गयी हो ? तुम्हारी चुप्पी तुम्हें व्यर्थ ही अन्दर ही अन्दर कुतर रही है, मुझे इतना कष्ट दे रही है, पञ्चम राग छेड़ो, कोमलता धारण करो। इस वसन्त ऋतुमें तो कामिनियाँ अपने प्रियतमोंका अनुकरण किया करती हैं, तुम तो कोयलसे भी अधिक मधुर संलापिनी हो, मधुर आलाप करो, अपनी दृष्टिसे रस-वृष्टि करो। हे तरुणि ! कृपा-अवलोकन द्वारा मेरा संताप दूर करो। हे सुमुखि ! तुम्हारे लिए मेरे प्रति वैमुख्य उचित नहीं है। उदासीनताका अपरिग्रह करो, दम्भ छोड़ दो, मेरा परित्याग मत करो। हे मुग्धे ! हे विचाररहिते ! मैं तुम्हारा प्रिय हूँ। अतिशय स्निग्ध स्नेहपरायण हूँ। अनाहूत ही यहाँ उपस्थित हुआ हूँ। यह देखो साश्रु होकर खड़ा हूँ। अपनी स्नेह दृष्टिसे मुझे बाँध लो। प्रस्तुत श्लोकमें हरिणी वृत्त, यथासंरत्न अलङ्कार, अनुकूल नायक, प्रसाद गुण, कैशिकी वृत्ति, वैदर्भी रीति तथा मागधी गीति है। बन्धूकद्युति-बान्धवोऽयमधरः स्निग्धो मधूकच्छवि - चकास्ति नील-नलिन श्रीमोचने लोचनम्। गण्डश्चण्डि ! नासाभ्येति तिल-प्रसून-पदवीं कुन्दाभदन्ति ! प्रिये ! प्रायस्त्वन्मुख-सेवया विजयते विश्वं स पुष्पायुधः ॥५॥ अन्वय—[अतः पञ्चपुष्पाञ्चितमास्यं ते पुष्पायुधविलासेन मां दुनोतीति भङ्ग्यास्तदङ्गानि स्तौति]—अयि चण्डि (कोपने) अयि प्रिये, अयं स्निग्धः (लावण्यमयः) तव अधरः बन्धुकद्युतिवान्धवः (बन्धुकस्य पुष्पविशेषस्य बाँधुलि फुल इति भाषा या द्युतिः कान्तिः तस्या वान्धवः बन्धुककुसुम
३२४ श्रीगीतगोविन्दम्
सदृश इत्यर्थः, लोहितत्वात् साम्यम्) गण्डे (कपोले) मधुच्छविः (मधुकपुष्पस्य महुयाफुल इति भाषा छविर्दीप्तिः) चकास्ति [पाण्डुत्वात् अत्रापि साम्यम्] [तथा] नील-नलिन-श्रीमोचने (नीलनलिनयोः नीलोत्पलयोः श्रीमोचने शोभा-तिरस्कारके) लोचने [चकास्तः] [कार्ष्ण्यादत्र साम्यम्] अयि कुन्दाभ-दन्ति (कुन्दकुसुमदशने)। अत्रापि शौक्लात् साम्यम्] [तव] नासा (नासिका) तिलप्रसूनपदवीं (तिलप्रसूनस्य तिलपुष्पस्य पदवीं) अभ्येति (तिल-कुसुम-सदृशी भातीत्यर्थः) [अत्र आकृत्या साम्यम्]; [अतएव] सः (प्रसिद्धः) पुष्पायुध (कामः) प्रायः (बाहुल्येन) त्वन्मुखसेवया (तव मुखाराधनेन) [त्वन्मुखस्थितानि एतानि कुसुमानि लब्ध्वा तैरेवायुधैः] विश्वं विजयते (अभिभवति) ॥५॥ पद्यानुवाद— अधर सुमन बन्धूक सरस सम, कल कपोल रस भीने। फूल मधूक बन्धुसे दर्शित, नेत्र नलिन-छवि लीने॥ तिल-प्रसून-पदवी सी नासा दन्त कुन्द सम भासे। मुख आश्रित पुष्पायुध तेरे, जग विजयी हो हासे॥ अनुवाद—हे प्रिये! चण्डि! तुम्हारा अधर बन्धूक- पुष्पकी भाँति मनोहर अरुण वर्णके हैं, तुम्हारे सुशीतल कपोल मधूक पुष्पकी छविको धारण किये हुए हैं, तुम्हारे लोचन इन्दीवरकी शोभाको तिरस्कृत कर रहे हैं, तुम्हारी नासिका तिलके फूलके समान है, तुम्हारे दशन कुन्द पुष्पकी भाँति शुभ्रवर्णीय हैं। हे प्रिये! पुष्पायुधने अपने पाँच पुष्प रूपी बाणोंके द्वारा तुम्हारे मुखकी सेवा करके सारे संसारको जीत लिया है। बालबोधिनी—हे प्रिये! तुम्हारे मुखकमल पर पुष्पधन्वा कामदेवके समान पञ्च आयुध विलसित हो रहे हैं—हे चण्डि! यह सुविख्यात विश्व विजेता कामदेव तुम्हारे इन पुष्प आयुधोंको लेकर ही समस्त विश्वको विजय कर रहा
दशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३२५ है। विश्व-विजय करनेके बाद ये आयुध तुम्हारे मुखमण्डल पर शोभा प्राप्त कर रहे हैं। 'चण्डि'—इस संबुद्धि पदसे तात्पर्य है कि अब तक क्रोधका परित्याग नहीं किया है। चण्डि अर्थात् कोपने! पञ्चबाणोंका सवैशिष्ट्य वर्णन इस प्रकार है— (१) तुम्हारे अधर बन्धूक अर्थात् दुपहरियाके फूलके समान लाल वर्णके हैं। ये कामदेवके रक्तवर्णके आकर्षण बाण हैं। (२) तुम्हारे सुशीतल कपोल मधूक अर्थात् महुयेके समान सरस सुनहली पाण्डुवर्ण कान्तिमय हैं। मानो अभी-अभी उसमेंसे रस चू पड़ेगा। ये कामदेवके पीतवर्णके वशीकरण बाण हैं। (३) तुम्हारी नीली आँखें समस्त सौन्दर्यका सार अपने साथ ही सन्निहित किये हुए हैं। इन्होंने नील कमलोंकी सुन्दरताका तिरस्कार कर दिया है। ये कामदेव के कृष्ण-वर्णीय उन्मादन बाण हैं। (४) तुम्हारी नासिका तिलके फूलके सदृश है। ये कामदेवके पीतवर्णीय द्रावण बाण हैं। (५) तुम्हारे दाँत कुन्द पुष्पके समान हैं। ये कामदेवके श्वेतवर्णीय शोषण बाण हैं। इस प्रकार अपने सम्पूर्ण पञ्च आयुधोंद्वारा कामदेव तुम्हारे मुखकी सेवाके प्रसादसे विश्व विजय कर रहा है। प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित छन्द एवं उत्प्रेक्षा अलंकार है। दृशौ तव मदालसे वदनमिन्दु-सन्दीपनं गतिर्जन-मनोरमा विजितरम्भमूरुद्वयम्। रतिस्तव कलावती रुचिरचित्रलेखे भ्रुवा- वहो विबुध-यौवतं वहसि तन्वि! पृथ्वीगता ॥६॥
३२६ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय-अयि तन्वि (कृशाङ्गि), तव दृशौ (नयने) मदालसे (मदजन्यहर्षेण अलसे मन्थरे) [स्वर्गे तु एकैव मदालसानाम्नी अङ्गना; ममाङ्गना त्वं तु दृग्रूपे द्वे मदालसे धारयसि]; वदनम् इन्दुसन्दीपनं (इन्दुः चन्द्रः तस्य सन्दीपनं शोभावृद्धिकरं चन्द्रादपि समधिक-शोभासम्पन्नमित्यर्थः) [स्वर्गेऽपि इन्दुसन्दीपनी-नाम्नी काचिदस्ति]; (तव) गतिः (गमनं) जनमनोरमा (जनस्य मम मनोहारिणी) [स्वर्गेऽपि जनमनोरमा इति काचित्] ऊरुद्वयं (जघन-युगलं) विजितरम्भम् (विजिता तिरस्कृता रम्भा कदली येन तत् कदल्या अपि समधिकशोभामयम्) [स्वर्गेऽपि रम्भानाम्नी काचित्]; तव रतिः (सुरतविहारः) कलावती (सुकौशलवती) [स्वर्गेऽपि कलावतीनाम्नी काचित् विद्यते]; भ्रुवौ च रुचिरचित्रलेखे (रुचिरा मनोज्ञा चित्रा चमत्कारिणी लेखा ययोस्तादृशौ) [स्वर्गेतु एका एव चित्र-लेखा]; अहो त्वं [क्षीणापि] पृथ्वीगता (भूतलस्था) [अपि] विबुध-यौवतं (देवयुवतीसमूहम्) वहसि (धारयसि) ॥६॥ पद्यानुवाद- अवनी-अप्सरी! अलस नेत्रमयि! वदन इन्दु तव शोभे। गति मनहर, रति पटु, रम्भा-उरु, चित्रलिखित भौं लोभे ॥ अनुवाद-हे तन्वि ! आश्चर्य है, धरणि तलमें अवस्थिता होकर भी तुम स्वर्गस्था विद्याधरियोंके समान प्रतीत हो रही हो, तुम्हारे नयन सिन्धु मदालसाके मदसे अलस हो रहे हैं। तुम्हारा वदन विबुध-रमणी इन्दु सन्दीपनीके समान है। तुम्हारा गमन देववनिता मनोरमाके समान मनोहर है, तुम्हारे उरुद्वयने सुरयोषिता रम्भाको भी पराजित कर दिया है। तुम्हारा रति-कौशल स्वर्गस्था कलावतीके समान विविध कौशलयुक्ता है और तुम्हारे भ्रूयुगल चित्रलेखाके समान मनोहारी एवं विचित्र हैं। बालबोधिनी-हे तन्वि राधिके ! यद्यपि तुम इस पृथ्वी पर अवस्थित हो, फिर भी ऐसा लगता है जैसा समस्त
दशमः सर्गः - चतुरचतुर्भुजः ३२७ देवस्त्रियोंका समूह तुम्हारे भीतर निवास कर रहा है। तुम्हारी आँखें सौभाग्यमदसे अलसायी हुई हैं कि अब तो प्रिय तुम्हारे चरणोंमें हैं। इस प्रकार मदजनित हर्षके कारण मेरी अङ्गना होकर भी तुमने स्वर्गकी अप्सरा मदालसाको अपने नेत्रोंमें धारण किया है। तुम्हारा मुखमण्डल विबुधरमणी इन्दुमतीका आवास है, जहाँ चन्द्रमासे भी अधिक आवश्यकता है। तुम्हें देखकर चन्द्रमाके मनमें ईर्ष्या उत्पन्न होती है, क्योंकि उसमें इतनी शक्ति कहाँ है ? तुम्हारी गति जन-जनके मनको आह्लादित करनेवाली है। अतएव तुममें मनोरमा नामक अप्सराका निवास है। तुम्हारी जाँघ कदली वृक्षको भी अनादृत कर रही है, जहाँ मानों रम्भाका निवास है। तुम्हारी गति हाव, भाव, विलास किलकिञ्चित् आदि कलाओंसे युक्त है। अतएव तुममें कलावती नामक अप्सराका निवास है। तुम्हारे भ्रूयुगल मनोहर चित्ररचनाके समान हैं। वहाँ लगता है कि तुम पृथ्वी पर रहती हुई भी इस पृथ्वी छन्दमें उतरकर देवताओंके यौवनका वितान बनी हुई हो, तुम्हारा यौवन दिव्य हो। प्रस्तुत श्लोकमें पृथ्वी छन्द तथा कल्पितोपमालंकार है। प्रीतिं वस्तनुतां हरिः कुवलयापीडेन सार्धं रणे राधा-पीन-पयोधर-स्मरण कृत्कुम्भेन सम्भेदवान्। यत्र स्विद्यति मीलति क्षण क्षिप्ते द्विपे तत्क्षणात् कंसस्यालमभूत् जितं जितमिति व्यामोह-कोलाहलः ॥७ ॥ इति एकोनविंशः सन्दर्भः। इति श्रीगीतगोविन्दे महाकाव्ये मानिनी वर्णने मुग्ध माधवो नाम दशमः सर्गः। अन्वय- [एवं स्वप्रिया-गुण कीर्त्तनावेशान्महासङ्कट-स्थानानुभूत- तत्स्पर्श-सुख-स्मरण-परवशं श्रीकृष्णं वर्णयन् भक्तानाशास्ते]- [यः