गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमः सर्गः—चतुरचतुर्भुजः ३०५ नहीं हुआ, इतनेमें दिन भी ढलने लगा, विरह-तापसे दीर्घश्वास चल रहे हैं, मुख-कमल अतिशय मलिन हो रहा है, सखी उसके मान प्रशमन करनेके सारे उपाय कर शान्त हो चुकी है, स्वयंने भी अभी-अभी श्रीकृष्णकी उपेक्षा की है, फिर उनको पानेकी अभिलाषा कैसे करे। अतः बार-बार अत्यन्त लज्जाके साथ सखीकी ओर देख रही है। प्रेमकी उद्विग्नता है, उदासी छाई है। इसी प्रदोषकालमें श्रीकृष्णने विचार किया कि श्रीराधा हृदयमें पछता रही होंगी। चलो, उसने जो आरोप लगाया है, उसे स्वीकार कर उसीकी बात रखकर क्षमा याचना कर लूँ। अतः वे सुवन्दना श्रीराधाके समीप आकर आनन्दसे प्रफुल्लित होकर प्रणयसे गद्गद स्वरमें निवेदन करने लगे। ऊनविंश सन्दर्भः गीतम् ॥१९॥ देशवराडीरागाष्टातालीतालाभ्यां गीयते। अनुवाद—गीतगोविन्द काव्यका यह उन्नीसवाँ प्रबन्ध देशवराडी राग तथा अष्टताली तालमें गाया जाता है। वदसि यदि किञ्चिदपि दन्त-रुचि-कौमुदी हरति दर-तिमिरमति घोरम्। स्फुरदधर-शीधवे तव वदन-चन्द्रमा रचयतु लोचन चकोरम्॥१॥ प्रिये! चारुशीले! मुञ्च मयि मानमनिदानम्। सपदि मदाननलो दहति मम मानसं देहि मुखकमल-मधुपानम्॥ध्रुवपदम्॥ अन्वय—अयि चारुशीले (मनोज्ञस्वभावे) प्रिये (प्रेयसि) मयि अनिदानं (अकारणं) मानं (कोपं) मुञ्च (चारुशीलायास्ते