गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ
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नवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः ३०३ कि वे ही मुकुन्द श्रीराधाजीका मान उपशमित करनेकी चिन्तामें स्वयं मुग्ध हो रहे हैं, उन श्रीराधाजीकी महिमाका क्या वर्णन किया जाय कि उनके श्रीचरणकमलको मस्तक पर धारण करनेकी प्रार्थना स्वयं मुकुन्द श्रीकृष्ण कर रहे हैं। प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित छन्द है एवं रूपक अलङ्कारका प्रयोग है। चरणोंमें कमलका, गङ्गाजीमें परागका, मुकुटमें जड़ित इन्द्रनीलादि मणियोंमें भ्रमरका आरोप किया गया है। इस प्रकार श्रीगीतगोविन्द महाकाव्यमें मुग्ध-मुकुन्द नामक नवम सर्गकी बालबोधिनी वृत्ति समाप्त।