गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
पृष्ठ 334, कुल 448 में से
संदर्भ में पढ़ें३०२ श्रीगीतगोविन्दम् स्वच्छन्दतापूर्वक निःसृत हुई है, समस्त अशुभोंका निराकरण करनेवाले श्रीकृष्णके उन श्रीचरणकमलोंकी हम वन्दना करते हैं। बालबोधिनी- अब कवि जयदेव श्रीकृष्ण द्वारा श्रीराधाके प्रति कहे गये चाटु-वाक्योंका स्मरण कर श्रीराधाकी महिमा स्फूर्त्त होनेसे उनका सौभाग्य प्रतिपादित करनेके लिए श्रीकृष्णके ऐश्वर्यका वर्णन करने लगे हैं। उनका कहना है कि मैं अपने शिष्यों एवं प्रशिष्योंके साथ प्रेमाभक्तिके प्रतिबन्धक अशुभ समुदायकी शान्ति हेतु श्रीगोविन्दके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ। श्रीगोविन्दके चरणकमलोंका माहात्म्य बताते हुए कवि कहते हैं- भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंकी उपमा कमलसे दी गयी है-उनके श्रीचरण, कमलके समान अति मनोहर हैं। जिस प्रकार कमलमें पराग समाहित होता है, उसी प्रकार श्रीकृष्णके चरणोंमें समाहिता आकाशगङ्गा स्वच्छन्द रूपसे निःसृत हो परागवत् मनोहारिणी प्रतीत होती है। परागसे सराबोर कमल पर जैसे भ्रमर सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार अतिशय आनन्दसे ओतप्रोत हो अमन्द-आनन्दसन्दोहसे परिपूर्ण होकर इन्द्रादि देवसमूह श्रीकृष्णको साष्टाङ्ग प्रणाम करते हैं। उस समय प्रणाम करते हुए देवताओंके मस्तकपर स्थित किरीटोंकी इन्द्रनीलादि मणियोंकी कान्ति श्रीकृष्णके चरणोंमें पतित होनेसे श्रीकृष्णके चरणकमल कुवलय (नीलकमल) सदृश प्रतीत होते हैं। नीलकमलोंमें जैसे भ्रमर-समुदाय सदा मंडराता रहता है, उसी प्रकार भक्तजनोंका चित्त श्रीकृष्णके चरणोंमें सदैव मंडराता रहता है, नित्य-निरन्तर उन श्रीचरणोंकी महिमाका गान करता रहता है, योगीगण अपनी बाधाओंके निवारणके लिए उनके श्रीचरणकमलमें सदैव ध्यान लगाये रहते हैं-उन श्रीमुकुन्दके श्रीचरणकमलोंकी महिमाका वर्णन करनेकी सामर्थ्य किसमें है? कितने कौतूहलका विषय है