गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः ३०१ प्रतीत हो रही हैं, हिम कृशानु सरीखा दग्ध कर रहा है, रतिजनित आनन्द तुम्हारे लिए कष्टप्रद अनुभूत हो रही है, यह कैसी प्रतिकूलता तुम्हारे अन्तर्मनमें समा गयी है—इस विपरीत व्यवहारका शीघ्र परित्याग करो। सान्द्रानन्द-पुरन्दरादि- दिविषद्वृन्दैरमन्दादरा- दानम्र मुकुटेन्द्र नीलमणिभिः सन्दंशितेन्दिन्दिरम्। स्वच्छन्दं मकरन्द-सुन्दर-गलन्मन्दाकिनी-मेदुरं श्रीगोविन्दपदारविन्दमशुभस्कन्दाय वन्दामहे ॥२॥ इति अष्टादश सन्दर्भः। इति श्रीगीतगोविन्दे महाकाव्ये कलहान्तरिता वर्णने मुग्ध-मुकुन्दो नाम नवमः सर्गः। अन्वय—[सम्प्रति श्रीकृष्णस्य ऐश्वर्यं वर्णायन्नाशिषा सर्गं समापयति]—सान्द्रानन्द-पुरन्दरादि-दिविषद्वृन्दैः (बलेर्नियमनात् सान्द्रः निविड़ः आनन्दो येषां तेषां पुरन्दरादीनां दिविषदां देवानां वृन्दैः) अमन्दादरात् (अधिकादरात्) आनम्रैः (सम्यक् प्रणतैः) [सद्भिः] मुकुटेन्द्रनीलमणिभिः (मुकुटस्थैः इन्द्रनीलमणिभिः) सन्दंशितेन्दिन्दिरं (सन्दर्शितः इन्दिन्दिरः भ्रमरो यत्र तादृशं) [तथा] स्वच्छन्दं [यथा तथा] मकरन्द-सुन्दर-गलन्मन्दाकिनीमेदुरं (मकरन्दवत् सुन्दरं यथा तथा गलन्त्या क्षरन्त्या मन्दाकिन्या आकाशगङ्गया मेदुरं स्निग्धं) श्रीगोविन्दपदारविन्दम् अशुभस्कन्दाय (अशुभानां भक्तिप्रतिबन्धकानां विनाशाय) वन्दामहे (प्रणमामः) [अतएव श्रीराधिकामानोपशमनचिन्तया मुग्धो मुकुन्दो यत्र सोऽयं सर्गो नवमः] ॥२॥ अनुवाद—बलिराजाका गर्व खर्व होनेसे महान आनन्दमें निमग्न देवतागण बड़े आदरके साथ जिन चरणोंमें प्रणत हुए, इन्द्रनीलमणिमय मुकुटकी शोभा निज चरणोंमें प्रतिबिम्बित होनेसे जो चरण नीलकुवलय सदृश प्रतीत हुए, मकरन्दके समान मनोहारिणी मन्दाकिनी जिन चरणोंसे अनायास ही