गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः २९७ बालबोधिनी—सखी श्रीराधासे कह रही है—हे राधे ! देखो, इस अभिसरण-स्थल पर हीरक-हारोंसे युक्त शीतल कमल-पल्लवोंसे रची सेज पर श्रीहरि लेट गये हैं, तुम उनका अवलोकन करो जिनके लिए तरस रही हो, उनके साथ कैसा कलह ? वे तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं, तुम मान ही नहीं छोड़ रही हो। जनयसि मनसि किमिति गुरुखेदम् ? शृणु मम वचनमनीहित भेदम् ॥ माधवे... ॥६॥ अन्वय—[एतदाकर्ण्य खिद्यन्तीं प्राह]—किमिति (कथं) मनसि (चित्ते) गुरुखेदं (महत् कष्टं) जनयसि (सहसे इत्यर्थः) [नैव विधेयम्]; अनीहितभेदं (अनीहितम् अचेष्टित- मनभिलषितमिति यावत् विरहदुःखं तस्य भेदो यस्मात् तादृशं; यथा युवयोः पुनरपि विरहो न भवेदेवम्भूवमित्यर्थः) मम वचनं शृणु [तथा सति पुनस्ते विरहदुःखं मा भवितेत्यर्थः] ॥६ ॥ अनुवाद—तुम मन-ही-मन इतनी क्षुब्ध क्यों हो रही हो ? मेरी बात सुनो, मैं बिना किसी भेदके तुमसे हितकी बात कहती हूँ। पद्यानुवाद— खेद-भारसे बोझिल मन क्यों? काँप रहा है मृदु तन क्यों यों? बालबोधिनी—सखीकी ये सब बात सुनकर भी श्रीराधा दुःखी हो रही थीं, तब सखीने पुनः कहा—हे प्रिय सखि ! मनमें इतना द्वेष क्यों भरा हुआ है, क्यों व्यर्थकी आशंकाएँ तुम्हारे मनमें उठ रही हैं? इतना भारी दुःख क्यों कर रही हो—इस विदारक विरहसे तुम इच्छारहित चेष्टारहित अभिलाषारहित हो गई हो। देखो, मेरी बात सुनो, मैं तुम्हारा अहित नहीं चाहती हूँ—यह समझ लो। तुममें और श्रीकृष्णमें किसी भी प्रकारका भेद नहीं है।