गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९६ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— सिसक सिसक रोती हो विकले, तरुण सखी हँसती है, तरले। क्यों झूठा अभिमान करो? मानिनि! मत अब मान करो ॥ बालबोधिनी—सखीकी बातोंको सुनकर श्रीराधा सिसक-सिसक कर रोती हैं, बिलखती हैं। तब सखी कहती है—हे राधे! इस समय तुम विषाद क्यों कर रही हो, क्यों बिलख रही हो? तुम्हारी प्रतिपक्षी युवतियाँ तुम्हारे इन हाव-भावोंको देखकर तुम्हारा उपहास कर रही हैं। कितनी नादान हो तुम, साक्षात् श्रीहरि तुम्हारे चरणोंमें लुण्ठन कर रहे हैं और तुम रोती ही जा रही हो। सजल-नलिनीदल-शीलितशयने। हरिमवलोकय सफलय नयने ॥ माधवे... ॥५ ॥ अन्वय—[यथेयं युवतिसभा न विहसति तथोपदिश इत्याह]—सजल-नलिनी-दल-शीलित-शयने (सजलैः नलिनीदलैः शीलित रचिते शयने शय्यायां) हरिम् अवलोकय; नयने (नेत्रे) सफलय (सफलीकुरु); [त्रिभुवननयनमहोत्सवावलोकनात् अन्यत् फलं नास्तीति भावः] ॥५ ॥ अनुवाद—तुम सजल कमलके दलसे रचित शीतल शय्या पर श्रीकृष्णको प्रेमभरी दृष्टिसे अवलोकन कर नयन-युगलको सफल बनाओ। पद्यानुवाद— सजल कमल जल शीतल शयने— प्रिय राजित हैं, कल चलनयने! पूरे सब अरमान करो। मानिनि! मत अब मान करो ॥