गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः २९५ अन्वय—[तदुपदेशं बिना इत्थं क्रियते इत्याह]—इदम् अनुपदम् (पदे पदे) अचिरम् (अधुनैव) कति (कतवारं) [मया] न कथितम्; [यत्] अतिशय-रुचिरं (अतिसुन्दरं) हरिं (मनोहरणशीलं) मा परिहर (मा त्याक्षीः) ॥३॥ अनुवाद—मैं तुम्हें कितनी बार कह रही हूँ कि तुम निरतिशय सुन्दर मनोहर श्रीहरिका परित्याग मत करो। पद्यानुवाद— हरि-तन कलित ललित हियहारी, भूलो मान, बनो बलिहारी, विनती इतनी कान धरो। मानिनि! मत अब मान करो ॥ बालबोधिनी—सखी कहती है—हे राधे! मैं तुम्हें पुनः पुनः समझा रही हूँ कि तुम मान मत करो। श्रीहरि रूप-लावण्यमें सबसे सुन्दर हैं—तुम अपना मान छोड़कर उनका अभिसरण करो, अपना मनोभाव बदलो, श्रीहरि अतिशय रुचिर हैं, सबके मनको हर लेनेवाले हैं, उनका त्याग कभी भी उचित नहीं है। किमिति विषीदसि रोदिषि विकला ? विहसति युवतिसभा तव सकला ॥ माधवे... ॥४॥ अन्वय—[एतदाकर्ण्य साश्रुनेत्रां प्रत्याह]—विकला (व्याकुला) [सती] किमिति (किमर्थं) विषीदसि (विषण्णा भवसि) रोदिषि च [माविषीद मारोद इत्यर्थः]; [तव एवं व्याकुलतामवलोक्य] सकला (समग्रा) युवति सभा (प्रतिपक्ष-युवति-समूहः) विहसति (विशेषेण हसति) ॥४॥ अनुवाद—तुम इतनी शोकविह्वल होकर क्यों रो रही हो? तुम्हारे विकलता-प्रदर्शक इन हाव भावोंको देखकर तुम्हारी प्रतिपक्षी युवतियाँ प्रमुदित हो रही हैं।