गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९४ श्रीगीतगोविन्दम् ताल-फलादपि गुरुमतिसरसम् किं विफली कुरुषे कुच-कलशम् ? माधवे..... ॥२॥ अन्वय-[सुखमस्तु तेन मम किम्? इति चेत् स्तनाभ्यां किमपराद्धमिति सोत्प्रासमाह]-तालफलात् अपि गुरुं (स्थौल्येन काठिन्येन वर्त्तुलत्वेन च तालफलादपि श्रेष्ठं) अतिसरसं (रसभरपूर्णं) कुचकलसं (स्तनकुम्भं) किमु (किमर्थं) विफलीकुरुषे (व्यर्थयसि) [तदनुभवं बिना अस्य विफलीकरणं न युक्तमित्यर्थ:] ॥२॥ अनुवाद-सुपक्व ताल-फलसे भी गुरुतर (भारी) एवं अति रसपूर्ण इन कुच-कलशोंको विफल क्यों कर रही हो? पद्यानुवाद- लज्जित ताल-फलोंकी गुरुता, कुच-कलशोंकी अनुपम रसता, रसमयि! रसका दान करो। मानिनि! मत अब मान करो ॥ बालबोधिनी-सखी कहती हैं कि हे राधे! तुम्हारे कुच-कलश ताल फलसे भी श्रेष्ठ हैं। रस-शास्त्रोंमें ताल-फलको अति गुरु एवं रसमय फल बताया गया है। अतः जिन कुच-कलशोंकी रसता एवं गुरुताके सम्मुख ताल फलका गुरुत्व एवं रसत्व भी निकृष्ट हो जाता है, उनकी सार्थकता तो हरिमें है, हरिके स्पर्शमें है, इन कलशोंका गुरुत्व उन्हींके लिए है और तुम उनका उद्देश्य ही नष्ट कर रही हो। स्तनोंकी विस्तृति अभिव्यक्त करनेके लिए ही उनकी तुलना कलशोंसे की गयी है। मान छोड़ दो एवं श्रीहरिको इस रस-विलासका अनुभव करने दो। कति न कथितमिदमनुपदमचिरम्। मा परिहर हरिमतिशय-रुचिरम् ॥ माधवे... ॥३॥