गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः २९३ हरिरभिसरति वहति मधुपवने किमपरमधिकसुखं सखि ! भवने ॥१ ॥ माधवे मा कुरु मानिनि ! मानमये ॥ध्रुवपदम् ॥ अन्वय—अये मानिनी (मानवति राधे) मृदुपवने (मलयमारुते) वहति [सति] हरिः (कृष्णः) अभिसरति (सङ्केतस्थानमायाति); [तस्मात्] माधवे मानं मा कुरु (मधुवंशोद्भवे श्रिया महासम्पत्तेः पत्यौ चेति मानानर्हत्वादिति भावः) [कथं वञ्चकेऽस्मिन् मानो न विधेय इत्याह]—सखि भवने (कृष्णविहीने गृहे) अपरम् (अन्यत्) अधिकसुखं किम् [अस्ति] [माधवाभि- सरणादन्यत् सुखं नास्त्येवेति भावः] ॥१॥ अनुवाद—हे मानिनि ! देखो, इस समय मन्द-मन्द वासन्ती समीर प्रवाहित हो रहा है, श्रीकृष्ण अभिसारके लिए तुम्हारे सङ्केत भवनमें आ रहे हैं। हे सखि ! इससे अधिक बढ़कर और सुख क्या हो सकता है ? पद्यानुवाद— मन्द-मन्द मधु वायु विहरती, लायी उसको यहाँ, सिहरती, बैठी जिसका ध्यान धरो। मानिनि! मत अब मान करो ॥ बालबोधिनी—हे सखी! अब तुम्हें लक्ष्मीपति माधवसे मान नहीं करना चाहिए, वे मधुवंशमें उत्पन्न हुए हैं, महासम्पत्तिके अधिकारी हैं, फिर भी तुम्हें मना रहे हैं, मनाते चले जा रहे हैं—तुम मान करना छोड़ दो। वासन्ती बयार प्रवाहित हो रही है, हरि स्वयं तुम्हारे अभिसारके लिए आ रहे हैं—तुम्हारे ही भवनमें अर्थात् घरमें। इससे बढ़कर सुख और क्या हो सकता है? उनका आगमन सुखकी परावधि है—राधे ! तुम उनका सम्मान करो।