गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमः सर्गः—मुग्ध-मुकुन्दः २९१ सन्तप्त होती हैं, उद्विग्न होती हैं, केवल हरिकी ही चिन्ता करती हैं—इस प्रकार श्रीराधाकी कलहान्तरितावस्थाकी पाँच विशेषताओंका वर्णन किया गया है— मन्मथखिन्ना—कामकी उद्विग्नतासे श्रीराधाको अत्यधिक कष्टकी अनुभूति हो रही है। रतिरसभिन्ना—काम-केलि रससे वञ्चित होनेके कारण विषादशालिनी हो रही हैं। विषादसम्पन्नाम्—सम्भोगके प्रति अनुरक्ति होनेके कारण वे भावशबलताकी स्थिति तक पहुँच चुकी हैं। अनुचिन्तितहरिचरितां—वे बार-बार श्रीकृष्णके चरित्रका ही चिन्तन कर रही थीं। कलहान्तरिता—सखियोंके सामने अपने पैरों पर पड़ते हुए प्राणबल्लभको देखकर भी जो नायिका उन्हें बुरा-भला कहती है तथा निषेध करती है, उसे कलहान्तरिता नायिका कहते हैं। उसमें प्रलाप, सन्ताप, ग्लानि, दीर्घनिःश्वास आदि चेष्टाएँ लक्षित होनेके कारण उसे कलहान्तरिता कहा जाता है। कलहान्तरिता नायिकाका लक्षण यह है— प्राणेश्वरं प्रणयकोपविशेष-भीतं या चाटुकारमवधीर्य विशेषवाग्भिः। सन्तप्यते मदनवह्निशिखासमूहैर्बाष्पाकुलेह कलहान्तरिता हिसा स्यात्॥ अथ अष्टादशः सन्दर्भः। गीतम् ॥१८॥ गुर्जरीराग-यतितालाभ्यां गीयते। गीतगोविन्द काव्यका प्रस्तुत अठारहवाँ प्रबन्ध गुर्जरी राग तथा यति तालके द्वारा गाया जाता है।