भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 322

नवमः सर्गः (मुग्ध-मुकुन्दः) तामथ मन्मथ-खिन्नां रति-रस-भिन्नां विषाद-सम्पन्नाम्। अनुचिन्तित-हरि-चरितां कलहान्तरितामुवाच रहसि सखी ॥१॥ अन्वय—अथ अनन्तरम्; (प्रणत्यापि मानानपगमात् श्रीकृष्णे अन्तर्हिते सति) सखी रहः (एकान्ते) कलहान्तरितां (कलहान्तरितावस्थां प्राप्तां) [अतएव] मन्मथखिन्नां (मन्मथेन मदनेन खिन्ना सन्तप्ता तां) रतिरसभिन्नां (रतिरसेन सुरतानन्देन भिन्ना खण्डिता ताम्) विषादसम्पन्नां (विषादेन चित्तक्लेशेन सम्पन्ना युक्ता ताम्) अनुचिन्तित-हरि-चरिताम् (अनुचिन्तितं पुनःपुनश्चिन्तितं हरेः चरितं चातूक्ति-पाद-पतनादि यया तादृशीं) [अन्तरुत्सुकामपि बहिर्मानावगुण्ठितां] तां [श्रीराधाम्] उवाच॥ [कलहान्तरितालक्षणम्—चाटुकारमपि प्राणनाथं रोषादपास्य या। पश्चात्तापमवाप्नोति कलहान्तरिता तु सा॥ इति साहित्यदर्पणे ॥१॥ अनुवाद—मदनबाणसे प्रपीड़िता, रतिवञ्चिता, विषादयुक्ता, कलहान्तरिता, शृङ्गार रससे युक्त श्रीहरिके चरित्रके विषयमें सतत चिन्तन करने वाली श्रीराधासे सखीने एकान्तमें कहा— पद्यानुवाद— मन्मथखिन्ने! रतिरसभिन्ने! शोक-विपन्ने राधे!॥ हरि चिन्तन रत! सलिल नयनगत! बैठी हो चुप साधे॥ मानिनि! मत अब मान करो। बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णोक्त सभी वाक्योंका तिरस्कार करती हैं, उनके युक्तियुक्त वचनों एवं प्रणत-भाव-समुदायको छल चातुरी समझकर मन-ही-मन उनके व्यवहारकी समालोचना करती हैं। प्रणयकोपसे अनेक प्रकारके आक्षेप लगाती हैं। वे जितना भी प्रणत होते जाते हैं, उनका मान उतना ही बढ़ता जाता है, पुनः स्वकृत कलहको सोच-सोच कर