गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमः सर्गः—विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८९ जाती हैं, वे मुग्ध होकर अवलोकन किया करती हैं, स्वर्गलोककी अप्सराओंकी मन्दार पुष्पकी माला इस वंशीध्वनिसे भ्रंशित होने लगती है, टूटने लगती है—इस प्रकार श्रीकृष्णकी वंशीध्वनिका 'वशीकारत्व' बताया है। वशीकृत देवता साधु-साधु कहकर शिरोधूननके द्वारा प्रशंसा करते हैं। शिरोधूनन एवं मन्दारके विभ्रंशनसे वंशीका 'मारण' अभिलक्षित है। स्तम्भत्व एवं आकर्षणत्व तो सिद्ध ही है। वंशीध्वनिको सुनकर व्रज-कुरङ्गनाएँ हिरणियाँ आकर्षित हो स्तम्भित रह जाती हैं। उच्चाटन तो वंशीरवमें प्रमाणित ही है। अन्तःकरणोंका मोहित हो जाना मोहनत्व है। इस प्रकार मोहनत्व, वशीकरणत्व, स्तम्भत्व, आकर्षणत्व, उच्चाटनत्व एवं मारणत्वके गुणोंसे युक्त होनेके कारण वंशीध्वनि महामंत्र स्वरूप है। इस महामन्त्रत्वका जादू गोपियोंसे विशेष रूपसे सम्बन्धित है। श्रीकृष्ण श्रीराधाके प्रगाढ़ मानको दूर करनेके लिए षत्साधन सम्पन्न महामन्त्रस्वरूप वंशीध्वनि करने लगे। इति श्रीजयदेवकृतौ श्रीगीतगोविन्दे खण्डितावर्णने विलक्ष्यलक्ष्मीपतिर्नामाष्टमः सर्गः। इस प्रकार श्रीजयदेव कवि प्रणीत गीतगोविन्द काव्यके खण्डिता नायिका वर्णन प्रसङ्गमें विलक्ष्यलक्ष्मीपति नामक आठवें सर्गकी बालबोधिनी व्याख्या समाप्त।