भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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२८८ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—[अथ वंशीरवश्रवणेन श्रीराधिकायाः अतिगाढ़ोऽपि मानः अपयास्यतीति कविः वंशीध्वनिं वर्णयन् आशिषमातनोति]— कुरङ्गी-दृशाम् (मृगलोचनानाम्) अन्तर्मोहन-मौलि-घूर्णन- चलन्मन्दार-विस्रंसन-स्तब्धाकर्षण-दृष्टि-हर्षण-महामन्त्रः (अन्तर्मोहने मनोमोहने मौलि-घूर्णने साधु साधु इति शिरःकम्पने चलतां मन्दाराणां देवतरु-कुसुमानां विस्रंसने तथा स्तब्धे स्तम्भे, आकर्षणे, तथा दृष्टिहर्षणे वशीकरणे महामन्त्रः) [तथा] दृप्यद्दानवदूयमान-दिविषद्-दुर्वार-दुःखापदां (दृप्यद्भिः दर्पपूर्णैः दानवैः दूयमानानां पीड्यमानानां दिविषदां देवानां दुर्वारणां दुःखापदाम् अनिवार्यदुःखपङ्क्तीनां) भ्रंशः (ध्वंसः नाशक इत्यर्थः) [वंशीरव-श्रवणमात्रेणैव देवाः दैत्यभयात् मुच्यन्ते इति भावः] कंसरिपोः (श्रीकृष्णस्य) वंशीरवः वः (युष्माकं) श्रेयांसि (शुभानि) व्यपोहयतु (विगतविघ्नानि करोतु) [अतएव विलक्षो गाढ़मानविलोकाद् विस्मयान्वितो लक्ष्मीपतिः श्रीराधापतिर्यत्र सः इति अष्टमः सर्गः] ॥२॥ अनुवाद—गोपियोंके अन्तःकरणको मोहनेवाली, मौलिस्थित मणिमय किरीटोंको घूर्णित करनेवाली, चञ्चल मनोहर पुष्पोंको विभ्रंशित करनेवाली, दृप्त दानवोंके द्वारा विदलित देवताओंके दुर्निवार दुःखको दूर करनेवाली, कुरङ्गीनयनाओंके लिए स्तम्भन, आकर्षण एवं नेत्रोंके हर्षकी अभिवृद्धि करनेवाली वंशीध्वनि आप सबके मङ्गलमय मार्गके विघ्नोंका नाश करे। बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोक द्वारा इस सर्गके अन्तमें श्रीजयदेव कवि अपने पाठकों एवं श्रोताओंके लिए मङ्गलाचरणरूप आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहते हैं—कंसारि श्रीकृष्णका वंशीरव कल्याणका विस्तार करे। वह वंशीध्वनि दर्पीले दानवोंके कारण देवताओंको होनेवाले असह्य कष्टको दूर करनेवाली है, कुरङ्गीनयनाओंके अन्तःकरणको इस प्रकार मोहित करती है कि वे आनन्दमें निमग्न हो शिरश्चालन करने लगती हैं और घूर्णित-मौलि (मस्तक) हो