गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
२५२ श्रीगीतगोविन्दम् यहाँ कामरूप राजाके गौरवर्णनीय उरुस्थल रूपी हेमसिंहासन पर आरूढ़ होनेके लिए उसे मणिमय मेखलारूपी वन्दनवारसे श्रीकृष्ण सजा रहे हैं। विकिरति—उरु-स्थलके स्पर्शसे कन्दर्पजनित कम्पन भाव उदित होता है, अतः मणिमय मेखलाको ठीक-ठीक रूपसे धारण करानेमें समर्थ नहीं हुए। फिर भी पहनानेकी कोशिश की गयी है—एक लीलाविशेषकी भावना बन गयी है। चरण-किसलये कमला-निलये नख-मणिगण-पूजिते। बहिरपवरणं यावक-भरणं जनयति हृदि योजिते॥ रमते यमुना-पुलिन वने.....॥६॥ अन्वय—हृदि (वक्षसि) योजिते (विनिहिते) कमला-निलये (कमलायाः सौन्दर्याधिदेवतायाः श्रियाः निलये आवासे) नखमणिगण-पूजिते (नखा एव मणिगणाः तैः पूजिते अर्चिते) चरणकिशलये (पादपल्लवे) यावक-भरणं (यावकं अलक्तकमेव भरणम् आभरणं) बहिरपवरणं (बहिरावरणं) जनयति (करोति) [श्रीनिवासस्य मणियुतस्य च बहिरावृतिर्युक्तैवेत्यर्थः] [यद्वा कमलानिलये हृदि इत्येवमन्वयः कार्यः]॥६॥ अनुवाद—उस नितम्बिनीके अरुण मनोहरश्रीसे सम्पन्न एवं नखरूपी मणियोंसे विभूषित पद-पल्लवोंको नखक्षत एवं मणियोंसे समलंकृत एवं लक्ष्मीके वासस्थल अपने हृदयपर स्थापित करते हुए बड़े यत्नसे आवरण-आच्छादन करते हुए जावक-रससे रञ्जित कर रहे हैं। पद्यानुवाद— कमलाके समान आवास-हृदय पर पग उसके हैं धरते। और हाथसे 'जावक' रचना फिर मातल हो करते॥ बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णकी नवीन रति-केलिका वर्णन करते हुए कहती हैं—उस बड़भागिनीके चरण-कमल लक्ष्मीके आश्रय-स्वरूप हैं, रक्तिम वर्णके नवीन कोमल
पल्लवोंके समान हैं। उसके पद-नख मणियोंकी कान्तिको धारण किये हुए हैं, उन चरण-युगलको वे अपने हृदयमें संश्लिष्ट करके बैठे हैं, उनके उस वक्षःस्थलमें लक्ष्मी सदा निवास करती है। उनका वह वक्षःस्थल उस रति-निष्णाता रमणी द्वारा अर्पित नखक्षतों एवं मणिसमूहोंसे समलंकृत है। उसके उन स्वाभाविक अरुण वर्ण पदोंमें श्रीकृष्ण अपने करकमलोंसे महावर (आलक्तक रस) लगाकर बाह्य-आच्छादन- अलंकरण प्रदानकर बड़े यत्नसे उन्हें संरक्षण प्रदान कर रहे हैं। नखमणिपूजित विशेषण रमणी एवं श्रीकृष्ण दोनोंमें अन्वित होता है। रमयति सुभृशं कामपि सुदृशं खलहलधरसोदरे। किमफलमवसं चिरमिह विरसं वद सखि! विटपोदरे॥ रमते यमुना-पुलिन वने..... ॥७॥ अन्वय—सखि, खल-हलधर-सोदरे (खलः धूर्त्तः हलधरस्य बलदेवस्य सोदरः तस्मिन्; हलधरस्य इति सोल्लुण्ठनोक्तिः- लाङ्गलभृतः-सूतरामविदग्धस्य इत्यर्थः) कृष्णे कामपि सुदृशं (सुलोचनां कामिनीं) सुभृशं (प्रगाढं) रमयति [सति] इह विटपोदरे (वनमध्ये) अफलं (विफलं) विरसं (रसहीनं यथा तथा) किं (कथं) [अहम्] अवसम् (अवस्थितास्मि) [इत्येतत्] वद (कथय) [मामभिसार्य अन्या सह रमणात् हरेः खलत्वम्] ॥७॥ अनुवाद—हलधरके सहोदर, अविवेकी, गँवार, खल वे श्रीकृष्ण निश्चित रूपसे किसी सुनयनाका प्रगाढ़ आलिङ्गन कर उसके साथ रमण कर रहे हैं, तब सखि! तुम्हीं बताओ, मैं इस लतानिकुंजमें कब तक विरस भावसे बैठी-बैठी प्रतीक्षा करती रहूँ?
२५४ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— ‘पापी’ के पर-तिय-विलासको देखूँ आँखें मींचे। कब तक विरस प्रतीक्षा सखि ! मैं करूँ विटपके नीचे ? यमुन-पुलिनके सघन कुंजमें रमते आज मुरारी। प्रियकी अमर सुहागिनि होकर जीती बाजी हारी ॥ बालबोधिनी—श्रीराधा प्रतीक्षा करती-करती नैराश्यको प्राप्त होकर अपनी सखीसे कहती हैं—सखि ! कुछ तो बोलो, मौनका त्याग करो, अब इस वनके लतानिकुंजमें व्यर्थ ही बहुत देर तक रुकनेसे क्या लाभ है ? 'खल हलधरसहोदरे'—हलधर बलरामजीका नाम है, उनका छोटा भाई कृष्ण, जो अतिशय खल है। हलधरका अर्थ होता है, हलवाहा। श्रीकृष्ण हलवाहेके समान ही खल, गँवार और अविदग्ध हैं। मेरी उपेक्षा कर, मुझे ठग कर उस सुलोचनाके साथ रमण कर रहे हैं। अरे, वह सुलोचना कैसी ? वे तो अपने जैसी किसी गँवार रमणीके साथ ही रमण कर रहे हैं, मेरा उनसे क्या लेना-देना ? मैं उन पर विश्वास स्थापनकर इस बीहड़ वनमें सारी रात बैठी रही, मेरी कितनी उपेक्षा की है। मैं इस कुंजमें दहकती रहूँ, क्या मैं उन्हें ढूँढती ही रहूँ? मेरे पास चारा क्या है? पर सखि ! कैसे सहन करूँ? उन्होंने यहाँ आनेकी बात कही थी, परन्तु वे तो अन्य प्रेयसीके साथ विलासपरायण हो रहे हैं। इस पन्द्रहवें प्रबन्धकी नायिका स्वाधीनभर्तृका है, जिसके गुणोंसे आकृष्ट होकर श्रीकृष्ण उसके सान्निध्यका त्याग न कर श्रीराधाकी उपेक्षा कर रहे हैं। इह रस-भणने कृत-हरि-गुणने मधुरिपु-पद-सेवके। कलि-युग-रचितं न वसतु दुरितं कविनृप जयदेवके ॥ रमते यमुना-पुलिन वने..... ॥८ ॥ अन्वय—रसभणने (रसस्य शृङ्गाररसस्य भणनं कथनं यत्र तस्मिन्) कृतहरिगुणने (कृतं हरेः गुणनं गुणकीर्त्तनं येन
सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २५५ तादृशे) मधु-रिपु-पद-सेवके (श्रीकृष्णपदसेवके) इह (अस्मिन्) कविनृप-जयदेवके (कविश्रेष्ठ-जयदेवे) कलियुग-चरितं (कलि- युगधर्म-वशादाचरितं) दुरितं (पापं) न वसतु ॥८॥ अनुवाद—शृङ्गार-रससे परिपूर्ण श्रीकृष्णकी लीला-कथाओंका कीर्तन करनेवाले, मधुसूदनके सेवक मुझ कविराज जयदेवमें कलियुग आचरित दुरित दोष प्रविष्ट न हों। बालबोधिनी—श्रीजयदेव इस अष्टपदीकी संरचनामें स्वयंको मधुरिपुके सेवकोंमें सर्वश्रेष्ठ मानकर यह प्रार्थना करते हैं कि इस गीतिको सुननेवालोंमें कलियुगके दूषणीय चरित्र प्रविष्ट न हों। 'रसभणने' से तात्पर्य है—रसपूर्ण शृङ्गारिक उक्तियाँ कहनेवाला। 'हरिगुणने' से तात्पर्य है—श्रीहरिकी कथाओंका अभ्यास करनेवाले कविराज जयदेव। इस प्रबन्धमें आयी कविकी सभी उक्तियाँ रसकी उद्दीपना करानेवाली हैं। इस रसकी अभिव्यक्तिसे कलियुगके प्रभावसे तामसी चित्तवृत्तियाँ हृदयमें प्रविष्ट नहीं हो पाती हैं। इस प्रबन्धका नाम हरिरसमन्मथतिलक है, जिसे प्रबन्धराज कहा गया है। यह द्रुत ताल एवं द्रुत लयसे गाया जाता है। इसकी राग मल्हार है। नायातः सखि ! निर्दयो यदि शठस्त्वं दूति ! किं दूयसे ? स्वच्छन्दं बहुवल्लभः स रमते, किं तत्र ते दूषणम् ? पश्याद्य प्रिय-सङ्गमाय दयितस्याकृष्यमाणं गुणै रुत्कण्ठार्तिभरादिव स्फुटदिदं चेतः स्वयं यास्यति ॥१॥ इति पञ्चदशः सन्दर्भः। अन्वय—[इदानीं विषण्णवदनां सखीं सनिवेदमाह]—सखि, निर्दयः (दयाहीनः) शठः (धूर्त्तः अन्तरन्यत् बहिरन्यत्कारीत्यर्थः) यदि न आयातः हे दूति, त्वं किं (कथं) दूयसे (दुःखितासि) ? बहुवल्लभः (बह्व्यः वल्लभ्यः प्रेयस्यः यस्य सः कृष्ण)
२५६ श्रीगीतगोविन्दम् स्वच्छन्दं (निःशङ्कं) रमते; तत्र ते (तव) दूषणं किं (को दोषः); [इत्थं सखीमनूद्य निर्वेदभङ्ग्या आत्मनो दशमीदशामाह]— पश्य अद्य (इदानीं) दयितस्य (कृष्णस्य) गुणैः (सौन्दर्यादिभिः) [रज्जुभिश्चेति ध्वनिः; यथा कश्चित् रज्वाकृष्टः सन् याति तद्वत्] आकृष्यमाणम् इदं (तदप्राप्तितापोद्धनितधैर्यं) [मम] चेतः (चित्तम्) उत्कण्ठार्त्तिभरादिव (उत्कण्ठा औत्सुक्यम् आर्त्तिः पीड़ा च तयोः भरात् आधिक्यात् हेतोः) स्फुटत् इव (विदलदिव) स्वयं यास्यति ॥१॥ अनुवाद— सखी—हे सखि राधे! वे नहीं आये। श्रीराधा—वे निर्दय, निष्ठुर, शठ यदि नहीं आये तो तुम दुःखी क्यों हो रही हो? सखी—वे बहुवल्लभा हैं, स्वच्छन्दतापूर्वक रमण करते हैं। श्रीराधा—इसमें तुम्हारा क्या दोष है? देखो, आज मेरा मन उस प्राणकान्त प्रियतम श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर तथा उत्कण्ठाके भारसे विदीर्ण होकर उनसे मिलनेके लिए स्वयं ही जायेगा। बालबोधिनी—श्रीकृष्णके न आने पर इस विषण्णवदना दूतीको ही हेतु मानकर अत्यन्त विरह-व्यथाके साथ अपनी उत्कण्ठा प्रकट करती हुई रहती है। सखीने श्रीराधासे कहा—हे सखि राधे! उन अनेक प्रेयसियोंवालेको मैंने बहुत बुलाया, पर वे निर्दय आये ही नहीं। श्रीराधाने प्रत्युत्तरमें कहा—हे दूति! यदि वे शठ और धूर्त आये ही नहीं, तो इसमें तुम्हारा क्या दोष है? तुम दुःखी क्यों हो रही हो? तुमने अपना दौत्य-कर्म बहुत अच्छी प्रकारसे कर दिया। दूतीने कहा—मैं इसलिए दुःखी हो रही हूँ कि मैं उन्हें ला नहीं सकी। वे बहुबल्लभा हैं, उनकी अनेक प्रेयसियाँ हैं, वे स्वच्छन्द हैं, जहाँ मन चाहे, वहीं रमण करते हैं। पुनः श्रीराधाने कहा—तब तुम्हारा क्या दोष है? अब तुम देखना,
सप्तमः सर्गः - नागर-नारायणः २५७ मेरा चित्त उनके गुणोंसे आकर्षित होकर उनसे मिलनेके लिए असहनीय वेदनासे फट रहा है और इस पीड़ाका प्राण बनकर उन तक पहुँच जायेगा। कैसा चित्त है— स्वतः सिद्ध रूपसे श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट। 'उत्कण्ठार्तिभराद्' से तात्पर्य है, प्रियमिलनकी इच्छा-पीड़ाके भारसे विदीर्ण चित्त। मेरे द्वारा रोके जाने पर भी रुकेगा नहीं। उनके पास पहुँचेगा ही। अथवा देखो, सखि ! इस समय दयितके साथ दूसरी रमणीके मिलन होनेसे उनकी प्राप्ति सम्भव नहीं है, फिर भी मेरी उत्कण्ठा प्रतिक्षण बढ़ती जा रही है। अथवा हरिके संगमसे पूर्वानुभूत स्मर-सुखको प्राप्त करनेवाला यह चित्त वहाँ जायेगा ही, इसमें न तुम्हारा दोष है और न मेरा। वह रमणी भी उपालम्भके योग्य नहीं है, विधाता ही विमुख हो गया है। अथवा इस प्रकार यह चित्त वहाँ जायेगा ही और निवृत्तिको प्राप्तकर उपरमित हो जायेगा। इस प्रकार श्रीराधा शान्त निर्वेदकी स्थितिमें श्रीकृष्णका गुणगान करती हुई दशमी दशाको प्राप्त हो गयीं। अपने गुणोंके द्वारा श्रीकृष्ण जिस रमणीका सुख-विधान करते हैं, उसे किसी प्रकारका कष्ट नहीं होता, श्रीराधा श्रीकृष्णकी प्राप्तिके अभावमें अति विपन्ना, विषण्णा अवस्थाको प्राप्त हो गयीं। प्रस्तुत श्लोकके पूर्वार्द्धमें श्रीराधाका सखीके साथ वचन-प्रतिवचन है। श्रीराधाके मनमें भाव यह है कि स्वयं यह दूती ही श्रीकृष्णको बुलाने गयी और उनके साथ रमण कर लौट आयी है। अतः वह कृष्णको शठ, निर्दय इत्यादि कहती है। कैसे गँवार हैं वे, नायिका और दूतीमें भी अन्तर नहीं जानते। प्रस्तुत श्लोकमें विक्रीड़ित छन्द है और काव्यलिङ्ग नामक अलङ्कार है।
२५८ श्रीगीतगोविन्दम् अथ षोडषः सन्दर्भः। गीतम् ॥१६॥ देशवराडीरागेण रूपकतालेन गीयते। अनुवाद—गीतगोविन्द काव्यका यह सोलहवाँ प्रबन्ध देशवराड़ी राग तथा रूपक तालमें गाया जाता है। अनिल-तरल-कुवलय-नयनेन । तपसि न सा किसलय-शयनेन ॥ सखि ! या रमिता वनमालिना ॥ध्रुवपदम् ॥१॥ अन्वय—[तद्गुणैरन्यस्याः सुखं वर्णयन्ती स्वस्यास्तदलाभात् निर्वेदेन श्लोकार्थमेव निश्चिनोति]—सखि, या, अतिल-तरल- कुवलय-नयनेन (अनिलेन वायुना तरले चञ्चले ये कुवलये नीलोत्पले तद्वत् नयने यस्य तेन) [उत्पलवत् शैत्यगुणेन तापोपशमनादिति भावः] वनमालिना रमिता (विविध- सम्भोग-केलिभिर्नन्दिता) सा किशलयशयनेन (पल्लवशयनैन) न तपति (सन्तापं न गच्छति सुखयत्येवेत्यर्थः)। [एवं सर्वत्र योजनीयम्] पक्षे या अरमिता सा किशलयशयने (पल्लवशय्यायां) न तपति इति न अपि तु तपत्येव [अतीवोद्दीपकत्वात् तस्य] ॥१॥ अनुवाद—पवनके द्वारा सञ्चालित इन्दीवर (कमल) के समान चञ्चल नयनवाले श्रीकृष्णके द्वारा जो वरयुवती रमिता हुई है, उसे किसलय शय्या पर शयन करनेसे किसी तापका अनुभव नहीं हुआ होगा। बालबोधिनी—इस अष्टपदीमें श्रीराधाकी ईर्षा और भी ज्वलित हो उठी है। वह सखीसे कहती है—हे सखि ! श्रीकृष्णके नयनयुगल इन्दीवर (नीलकमल) के समान चंचल हैं, मानो दक्षिण पवनसे संचालित हो रहे हों। वे श्रीकृष्ण जिसे रमण-सुख दे रहे हैं और स्वयं रमित हो रहे हैं, वह
सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २५९ मेरी तरह किसलयके सेज पर भी क्यों झुलसेगी ? कैसे हृदय टूट जाता है, तार-तार हो जाता है, यह तो मैं जानती हूँ। इस तरह प्रस्तुत श्लोकमें श्रीराधा श्रीकृष्णके सुरत-सौशील्यका वर्णन कर उनकी स्तुति करती है। निन्दापरक अर्थ यह हो सकता है कि वन-लक्ष्मीकी शोभाका आनन्द लेनेमें लीन, संभोगपराङ्मुख वनमाली श्रीकृष्ण उस गोपीके साथ रमण नहीं कर सके। उनके नेत्र वायुके द्वारा नीलकमलके समान चञ्चल हो रहे थे। इन नेत्रोंके द्वारा उपभुक्त होनेसे वह गोपिका किसलय-रचित शय्या पर शयन करने मात्रसे ही सन्तप्त नहीं की गयी क्या? अवश्य ही की गयी। अथवा नील कमलके समान जिसके नेत्र हैं, ऐसी गोपी उन अन्यमनस्क, इधर-उधर दूसरी प्रियाको देखनेवाले श्रीकृष्णके द्वारा अवश्य ही सन्तप्ता हुई है। विकसित-सरसिज-ललित-मुखेन । स्फुटति न सा मनसिज-विशिखेन— सखि ! या रमिता... ॥२॥ अन्वय—विकसित-सरसिज-ललित-मुखेन (विकसितं यत् सरसिजं पद्मं तद्वत् ललितं मनोहरं मुखं यस्य तादृशेन) वनमालिना या रमिता, सा मनसिज-विशिखेन (मन्मथशरेण) न स्फुटति (न विदीर्यते)। [पक्षान्तरे या अरमिता सा (तादृशी भाग्यहीना नारी) मनसिज-विशिखे न स्फुटति इति न, अपि तु स्फुटत्येव] ॥२॥ अनुवाद—प्रफुल्लित कमलके समान सुललित मुखवाले वनमाली श्रीकृष्णके द्वारा जो सुन्दरी संभुक्ता हुई है, उसे कन्दर्पके विषम बाण कभी भेद नहीं सकते। अथवा विलासकला-पराङ्मुख केवल हास्य-परायण श्रीकृष्णके साथ रमण न कर सकनेवाली वह गोपीका कामके विषमबाणोंसे क्या बिद्ध नहीं होती? अपितु होती ही है।
२६० श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— अनिल तरुण मृदु जलज नयनके, विकसित सरसिज ललित वदनके, अमिय मधुर अति मंजु वचनके, थल जलरुहसे रुचिर चरणके। मिले, जिसे हैं सरस भावसे, उसे, कभी वनमाली, पल्लव 'स्मर शर' 'मलय' चन्द—सब जला न पाते आली। बालबोधिनी—श्रीराधा सखीसे कहती है—प्रफुल्लित अरविन्दवत् विलसित मुखकमलवाले वनमाली श्रीकृष्ण जिस रमणीको आनन्द दे रहे हैं, वह क्यों जानेगी कि मदनके बाणोंकी व्यथा कैसी होती है? किस प्रकार मैं विरहसे पीड़ित हो रही हूँ, उस रमिताका कामके बाणोंसे सन्तप्त होनेका प्रश्न ही नहीं उठता। कैसा हृदय विदीर्ण कर दिया है मेरा—यह स्तुतिपरक व्याख्या है। निन्दापरक अर्थमें वे श्रीकृष्ण तो विलासपराङ्मुख हैं, हास्यपरायण हैं, अपने मनोहर मुखसे बस हास-परिहास करते रहते हैं, उनके साथ रमण न कर पानेसे वह गोपिका क्या मदन-शरोंसे सन्तप्त नहीं होती क्या? अवश्य ही होती है। अमृत-मधुर-मृदुतर-वचनेन । ज्वलति न सा मलयज-पवनेन ॥ सखि! या रमिता.... ॥३॥ अन्वय—अमृत-मधुर-मृदुतर-वचनेन (अमृतादपि मधुरं मृदुतरं कोमलतरञ्च वचनं यस्य तेन) वनमालिना या रमिता सा मलयज-पवनेन (मलयानिलेन) न ज्वलति। [अमृतसिक्तया ज्वालातिशयानुपपत्तेः]। [पक्षान्तरे—या अरमिता सा मलयजपवने न ज्वलति इति न, अपि तु ज्वलत्येव] ॥३॥ अनुवाद—अति सुमधुर तथा कोमलतर वचन बोलनेवाले श्रीकृष्णसे जो वनिता रमिता हुई है, उसे मलय-पवनके संपर्कसे कभी ज्वालाका अनुभव नहीं हो सकता है।
सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २६१ बालबोधिनी—सखि ! वे अपनी अमृतमयी कोमल और मधुर वाणीसे उस रमणीयाको लुभा रहे हैं। वह कैसे जानेगी कि मलयाचलसे चलनेवाली दक्षिणी बयारसे कैसी ज्वालाएँ उद्भूत होती हैं? कैसी दाहक ज्वलनशील पीड़ा होती है? जो विरहिणियोंको सन्तप्त करती है। अथवा निन्दापरक अर्थमें श्रीकृष्णने जिस गोपिकाके साथ रमण नहीं किया, अपितु अमृतमयी मृदु मधुर वाणीसे लुभाते रहे, वह रमणी क्या मलयानिलसे सन्तप्त नहीं हुई होगी? अवश्य ही हुई होगी। स्थल-जलरुह-रुचि-कर-चरणेन। लुठति न सा हिमकरकिरणेन॥ सखि! या रमिता.... ॥५॥ अन्वय—स्थल-जलरुह-रुचि-कर-चरणेन (स्थल जलरुहस्य स्थलपद्मस्य रुचिरिव रुचिः कान्तिः यस्य तादृशं कर-चरणं पाणिपादं यस्य तादृशेन) वनमालिना या रमिता सा हिमकरकिरणेन (चन्द्रकिरणेन) न लुठति (मूर्च्छिता भूतले न परिवर्त्तते) [इन्दुकिरणानाम् उज्ज्वलतया तापकत्वावगमेऽपि स्थलकमलवत् शीतल-करचरणस्पर्शसुखेनेति भावः]; पक्षान्तरे या अरमिता सा हिमकरकिरणे [किरणं विकिरति सति] न लुठति इति न, अपि तु लुठत्येव] [तादृश-करचरणस्पर्शाभावादिति भावः] ॥४॥ अनुवाद—वनमाली श्रीकृष्णके कर एवं चरण स्थल-कमलके समान कान्तिमय एवं सुशीतल हैं, उनसे जो रमणी संभुक्ता हुई है, उसे चन्द्र-किरणोंसे सन्तापित होकर पृथ्वी पर लुण्ठन नहीं करना पड़ता। बालबोधिनी—श्रीराधा सखिसे कहती है—हे सखि, श्रीकृष्णके कर-तल एवं पद-तल स्थलकमलके समान कान्तिमय एवं सुशीतल हैं। उनके साथ रमण करनेवाली रमणी कैसे जानेगी कि चन्द्रमाकी शीतल किरणें कैसे दहकती हैं, वह उस विधु-कौमुदीसे संतप्त होकर रातभर शय्या पर करवटें
२६२ श्रीगीतगोविन्दम् क्यों बदलती होगी ? निन्दापरकके अर्थमें, स्थल-कमलके समान अंगोंवाले श्रीकृष्णकी आलिङ्गन प्राप्तिके लिए वह रातभर करवटें बदलती रहती होगी। सजल-जलद-समुदय-रुचिरेण । दहति न सा हृदि विरह-दवेन ॥ सखि ! या रमिता.... ॥५॥ अन्वय—सजल-जलद-समुदय-रुचिरेण (सजल-जलदानां समुदायात् समूहादपि रुचिरेण सुन्दरेण) वनमालिना या रमिता सा विरह-दवेन हृदि न दहति (भस्मीभवति) [जलदवदार्द्रतया दाहासम्भवात्]; पक्षान्तरे—या अरमिता सा विरहदवे (विरहानले) [ज्वलति सति] हृदि न दहति इति न; [अपि तु दहत्येव इत्यर्थः]। नवमेघस्य विरहोद्दीपकत्वात्]॥५॥ अनुवाद—वनमाली श्रीकृष्ण सजल-जलद-मण्डलसे भी मनोहर कान्तिमय एवं सुकुमार हैं। उन श्रीकृष्णके साथ जिस वराङ्गनाने रमण किया, उसे दीर्घकालिक विरहके विषभारसे कभी भी संदलित नहीं होना पड़ता। बालबोधिनी—सखि, जिनका स्वरूप नवीन बादलके समान अतिशय मनोहर है, अति सुकुमार है, उनसे जो रमणी संभुक्ता हुई, उसे विरहरूपी विषसे कदापि भय नहीं रहता। वे तो जलवर्षी मेघके समान उस पर बरस रहे हैं, वह क्या जानेगी कि यह दीर्घकालिक विरह कितना विदलित करता है, कितना विदीर्ण करता है। निन्दापरक अर्थमें—जो गोपी नवजलधर सदृश कान्तिवान श्रीकृष्णके साथ रमण नहीं कर सकी, वह इस दीर्घकालिक विरहके तीव्र-विषसे दुःखी नहीं होगी क्या ? अवश्य ही दुःखी होगी। कनक-निकष-रुचि-शुचि-वसनेन । श्वसिति न सा परिजन-हसनेन ॥ सखि ! या रमिता.... ॥६॥
सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २६३ अन्वय—कनक-निकष-रुचि-शुचि-वसनेन (कनकस्य सुवर्णस्य निकषेषु निकष-पाषाणेषु या रुचिः तद्वत् शुचि उज्ज्वलं वसनं यस्य तेन) वनमालिना या रमिता सा परिजन-हसनेन (परिजनानामुपहासेन) न श्वसिति (दीर्घश्वासं न मूर्च्छति) [सौभाग्यगर्वेण काश्चिदपि न गणयतीति भावः]; पक्षान्तरे या अरमिता सा परिजन-हसने [सति] न श्वसिति इति न, [अपि तु श्वसित्येव इत्यर्थः] ॥६॥ अनुवाद—स्वर्ण-निकष (कसौटी) सदृश श्याम वर्णवाले, पवित्र पीतवस्त्र धारण करनेवाले श्रीकृष्णके द्वारा जो सौभाग्यवती रमणी संभुक्ता हुई है, उसे कभी भी परिजनों द्वारा उपहासका कारण बनकर दीर्घनिःश्वास नहीं लेने पड़ते। बालबोधिनी—सखि ! जिन श्रीकृष्णके वसन (वस्त्र) कसौटी पर घिसी हुई स्वर्ण रेखाओंके समान उज्ज्वल, पीत एवं निर्मल हैं (शरीर कसौटी है, वस्त्र सोना है), ऐसे श्रीकृष्ण द्वारा जो कुलबाला रमिता हुई है, वे पीताम्बरी जिस बड़भागिनीको बाहुपाशमें आबद्ध करते हों, तो वह क्या जानेगी कि जब अपने ही परिजन उपहास करते हैं, तब कैसा दुःख होता है? कैसे साँसें घुटती हैं? कैसी म्लानता होती है? निन्दापरक अर्थमें सुवर्णकी कान्तिके समान श्याम कान्तिवाले तथा पीतवस्त्र धारण करनेवाले श्यामसुन्दरके साथ रमण-सुख प्राप्त करनेके लिए जो गोपी कषाय वस्त्र आदिको धारण करती है, उसे अपने परिजनोंके उपहासका पात्र बनकर दुःखी होना ही पड़ता है। सकल-भुवन-जन-वर-तरुणेन। वहति न सा रुजमति-करुणेन ॥ सखि ! या रमिता.... ॥७॥
२६४ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—सकल-भुवन-जन-वर-तरुणेन (सकलभुवनेषु ये जनाः युवानस्तेभ्यो वरः श्रेष्ठो यः तरुणः किशोरः तेन) वनमालिना या रमिता सा अतिकरुणेन (अतिशोकेन) रुजं (पीडां) न बहति (प्राप्नोति) [जगद्वल्लभतरुण-प्राप्त्या करुणानुपपत्तेः]; पक्षान्तरे या अरमिता, सा अतिकरुणे रुजं न बहति इति न; [अपितु बहत्येव इत्यर्थः] ॥७॥ अनुवाद—अखिल जगतके तरुण-श्रेष्ठ, सुकुमार मनोहर रूप लावण्य-विशिष्ट श्रीकृष्णके साथ रमण करनेवाली नायिका अपने अन्तःकरणमें दारुण विरह-वेदनाका अनुभव नहीं करती है क्योंकि वे अति करुण हैं। बालबोधिनी—समस्त लोकोंमें जितने भी तरुण युवा पुरुष हैं, उनमें श्रीकृष्ण सर्वातिशय युवतर हैं, सुन्दरतम हैं, वे नवकिशोर नटवर हैं। करुणावरुणालय वे जिस रमणीको भी रमायेंगे, वह अति करुण भावसे मेरी तरह निढाल नहीं पड़ेगी। निन्दापरक अर्थमें जगतमें श्रेष्ठ तरुण पुरुषोंके साथ रमण करनेवाली रमणी, उनमेंसे किसी एकका भी विरह होने पर करुणातिशयताके कारण कष्टका अनुभव करेगी ही। श्रीजयदेव-भणित-वचनेन । प्रविशतु हरिरपि हृदयमनेन ॥ सखि ! या रमिता.... ॥८ ॥ अन्वय—अनेन श्रीजयदेव-भणित-वचनेन (श्रीजयदेवोक्त- श्रीराधायाः माधवमुद्दिश्य वचनेत्यर्थः) हरिरपि [तदेकचित्तानां भक्तानां] हृदयं (चित्तनिकेतनं) प्रविशतु [प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेण स्वानां भावसरोरुहमित्युक्तेः] ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेवकवि विरचित श्रीराधाके विलाप-वचनोंके साथ श्रीहरि भी भक्तोंके हृदयमें प्रवेश करें।
सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २६५ पद्यानुवाद- सजल जलद सम फुल्ल वदनके। कनक-निकष सम पीत वसनके ॥ सकल युव जन श्रेष्ठ तरुणके। प्रेरक कवि 'जय' काव्य करुणके ॥ मिले, जिसे हैं सरस भावसे, उसे, कभी वनमाली। विरह, स्वजन-स्वर-व्यङ्ग-दरद-सब जला न पाते आली ॥ बालबोधिनी—जयदेव कविके द्वारा माधवके उद्देश्यसे गाये गये इस प्रबन्धसे प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण हृदयमें प्रवेश करें। किसके हृदयमें? श्रीराधाके हृदयमें। साथ ही कर्ण-रन्ध्र द्वारा मेरे-कवि जयदेवके, इस प्रबन्धके पाठकोंके तथा श्रोताओंके भावरूपी हृदय-कमलमें भी प्रवेश करें। नागर नारायण हरि हृदयमें अवस्थित हों। इस प्रकार नारायणमदनायास नामका सोलहवाँ प्रबन्ध समाप्त हुआ। मनोभवानन्दन चन्दनानिल ! प्रसीद रे दक्षिण ! मुञ्च वामताम्। क्षणं जगत्प्राण ! विधाय माधवं। पुरो मम प्राणहरो भविष्यसि ॥१॥ अन्वय—[अत्यावेशेन मनोवाष्पमुद्गिरति दैन्येनाधुना मलयानिलं सविनयं प्रार्थयते]—हे मनोभवानन्दन (आनन्दयतीति आनन्दनः; मनोभवस्य आनन्दनः तत्सम्बुद्धौ हे मदनानन्दकर) हे चन्दनानिल (मलयवायो) प्रसीद (प्रसन्नो भव); [पुनरीर्याद्यादाह]—रे दक्षिण (सरल-स्वभाव, सर्वानुकूल इति यावत्) वामतां (प्रतिकूलतां) मुञ्च (त्यज) [दक्षिणपथप्रवृत्तस्य वाम-पथ प्रवृत्तेरयुक्तत्वात् वामता त्याज्य इति भावः]; [तर्हि किं विधेयं तत्राह]-[जगद्धितोऽपि मनोभवानन्दनाय चन्दनतरु- सम्पर्कात् विषमश्चेत् मां मारयसि तर्हि] हे जगत्प्राण ! क्षणं
२६६ श्रीगीतगोविन्दम् मम पुरः (अग्रतः) माधवं विधाय (संस्थाप्य) [पश्चात्] मम प्राणहरो भविष्यसि ॥१॥ अनुवाद—हे कन्दर्पको आनन्द देनेवाले मलयाचलके समीर! दक्षिण ही बने रहो! वामताका त्याग कर दो! हे जगतके प्राणस्वरूप! माधवको मेरे सामने कर तुम मेरे प्राण हर लेना। बालबोधिनी—कामदेवके बाणोंके प्रहारको न सह सकनेके कारण श्रीराधा मलयानलको सम्बोधित करती हुई कहती है—कामके बाणोंको उनके लक्ष्य तक पहुँचानेवाली मलयाचलकी वायु मेरे लिए प्रतिकूल बन गयी है, मुझे जलाकर अपने मित्र कामदेवको तो आह्लादित कर दिया और मुझे कामकी पीड़ासे इतना दग्ध कर दिया। दक्षिणानिल कहलाते हो, सम्पूर्ण जगतको आनन्द प्रदान करते हो, फिर मेरे लिए तुम्हारा आचरण प्रतिकूल क्यों है? क्यों वाम भाव धारण किया है? मैं जानती हूँ—तुम मदनके सहचर हो, मलयाचल पर्वत पर सर्पोंसे घिरे हुए चन्दन वृक्षोंके संसर्गसे तुम्हारा स्वभाव अवश्य ही दूषित हो गया है, कितना सन्तप्त कर रहे हो मुझे? हे जगत्प्राण! क्षणभरके लिए प्रसन्न हो जाओ, क्षमा करो मुझे। अपनी प्रतिकूलताका त्याग कर दो, मेरे प्राणोंको हर लेना, पर पहले एक क्षणके लिए प्राणनाथ माधवका दर्शन करा दो, फिर प्राणापहारक बन जाओ। वंशस्थ छन्द है, अतिशयोक्ति अलंकार है। रिपुरिव सखी-संवासोऽयं शिखीव हिमानिलो विषमिव सुधारश्मिर्यस्मिन् दुनोति मनोगते। हृदयमदये तस्मिन्नेवं पुनर्वलते बलात्— कुवलय-दृशां वामः कामो निकामनिरंकुशः ॥२॥ अन्वय—[अथ अनुरागहीने दयिते सानुरागं चित्तं निन्दति]— तस्मिन् (श्रीहरौ) मनोगते (चित्तारूढ़े) [सति] अयं सखीसंवासः
सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २६७ (सखीभिः संवासः सहवासः) रिपुरिव (शत्रुरिव) [स्वच्छन्दगमन- प्रतिरोधकत्वात्] दुनोति (क्लिश्नाति); हिमानिलः (शीतलवायुः) [तापकत्वात्] शिखीव (अग्निरिव) [दुनोति]; सुधारश्मिः (चन्द्रः) [दाहकत्वात्] विषमिव [मम मनः] [दुनोति]; [यदि] अदये (दयाहीने) तस्मिन् [कान्ते] एवं पुनः [नानारूपेण कार्यमाणमपि] हृदयं बलात् वलते (संभक्तं स्यात्), [तर्हि] कुवलयदृशां (नीलोत्पलाक्षीणां कामिनीनां) कामः (अभिलाषः) निकाम-निरङ्कुशः (अत्यर्थमयन्त्रितः; हिताहितविचारापगमात् दुर्निवार इत्यर्थः) [अतएव] वामः (प्रतिकूलएव) ॥२॥ अनुवाद—हे सखि! सखियोंका सुखमय साथ, शत्रुके समान मेरे मनको शत्रु की भाँति अनुभूत हो रहा है, सुशीतल सुमन्द समीरण हुताशनके समान प्रतीत हो रहा है और सुधा-रश्मियाँ विषके समान मुझे कष्ट दे रही हैं, फिर भी मेरा हृदय बलात् उसीमें लगा हुआ है, सत्य है, कुवलय सदृश कामिनियोंके प्रति काम सर्वथा ही निरंकुश हुआ करता है। बालबोधिनी—प्रस्तुत श्लोकमें श्रीराधा विरहके उन्मादमें अपने चित्रको ही उपालम्भ देती हुई अपनी सखीसे कहती है—हाय! मैं किसे दोष प्रदान करूँ? उस श्रीकृष्णके स्मरणसे जो मेरी प्रियसखियाँ मुझे श्रीकृष्णके समीप जानेसे मना किया करती थीं, आज उनका सुखमय संग भी मुझे वर्षोंकी शत्रुता जैसा प्रतीत होता है, शीत वायु मुझे ज्वालाके समान दग्ध करती है, चन्द्रमा हलाहल विष जैसा लगता है। फिर भी सखि! मेरा मन उस निर्दय निष्ठुर श्रीकृष्णके प्रति अबाध गतिसे दौड़ता हुआ चला जा रहा है, मेरा अविवेकी मन ही मेरे दुःखका कारण बन गया है। अहो! हिताहित विवेकरहिता कमलनयनाओंके लिए 'काम' ही नितान्त दुर्निवार होकर उनके अशेष दुःखका कारण बन जाता है। यह कामदेव अति निरंकुश है, सुन्दरियोंके प्रति
२६८ श्रीगीतगोविन्दम्
तो अति ही कठोर है एवं प्रतिकूल है, विरहियोंके प्रति अति निरंकुश आचरण करता है। इस श्लोकमें हरिणी-वृत्त तथा विरोधालङ्कार है। बाधां विधेहि मलयानिल! पञ्चबाण! प्राणान्गृहाण न गृहं पुनराश्रयिष्ये। किं ते कृतान्तभगिनि! क्षमया तरङ्गे- रङ्गानि सिञ्च मम शाम्यतु देहदाहः ॥३॥ अन्वय—[अधुना विरहोत्तप्तया प्राणोत्सर्गः कृत एवाह]—हे मलयानिल, त्वं बाधां (मनःपीडां) विधेहि (जनय) [वामत्वेन बाधाविधान-सामर्थ्यादित्यर्थः]; हे पञ्चबाण, (काम) प्राणान् गृहाण [पञ्चबाण-धारित्वे पञ्चबाणग्रहणयोग्यत्वादित्यर्थः]; हे कृतान्त-भगिनि (यम-सहोदरे यमुने) ते (तव) क्षमया किं? (क्षमां मा कुरु) [यमानुजायाः क्षमा न युक्ता]; [तर्हि किं कर्त्तव्यम्? तरङ्गैः मम अङ्गानि सिञ्च; देहदाहं (शरीरसन्तापः); शाम्यतु (चिरं निवृत्तो भवतु); [एतेन दशमीं दशां विधेहीति ध्वन्यते]; [अहं] पुनः गृहं न आश्रयिष्ये [तेन बिना गृहमपि सन्तापकमेव; ततो मरणमेव युक्तमित्यर्थः] ॥३॥ अनुवाद—हे मलयानिल! तुम बाधाओंका विधान करो! हे पञ्चबाण! तुम मेरे प्राणोंका हरण करो! हे यमुने! तुम यमकी बहन हो, तुम क्यों मुझे क्षमा करोगी? तुम तरङ्गोंके द्वारा मुझे अभिषिक्त कर देना, जिससे मेरे देहका सन्ताप सदाके लिए शान्त हो जाय। बालबोधिनी—संप्रति विरह-ताप-तापिता श्रीराधा अपने प्राणोंको त्यागनेका संकल्प लेकर कहती हैं—हे मलयपवन! हे शीत समीरण! क्यों प्रतीक्षा कर रहे हो? मुझे खूब जमकर पीड़ा देना! हे पञ्चबाण! मेरे प्राणोंका हरण कर लेना, अपने पाँच बाणोंसे तुम मेरे पाँचों प्राणोंका अपहरण
४. सर्ग ८-९: खण्डिता व कलहान्तरिता
सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २६९ कर लेना—इसीलिए तुम्हें पञ्चबाणोंसे उपहित किया जाता है। प्राणोंका हरण करना ही तुम्हारा प्रयोजन है। ठीक ही तो है—कामदेव सन्तप्त जनोंको उत्तप्त करके गृहकी ओर उन्मुख करा देता है। पर तुम मुझे कितना भी विवश कर लो, मेरे प्राण भले ही चले जायें, पर मैं घर कभी नहीं जाऊँगी, श्रीकृष्णके चरणोंका आश्रय लूँगी। दोनोंका उपालम्भ देकर कामसे विदीर्ण होकर यमुनासे कहती हैं—हे यमुने ! तुम यमराजकी बहन हो ! मलयानल एवं पञ्चबाण मुझे पीड़ित कर ही रहे हैं, कामदेव सम्भोगकारक हैं, पर वह तो विपरीत आचरणमय हो गया है, मल्यानिल सुखकारक होकर मुझे विकल बना रहा है, उन दोनोंके द्वारा प्राणोंके ग्रहण कर लिये जानेपर तुम भाई यमको क्या उत्तर दोगी ? इसलिए तुम मुझे क्षमा मत करो, तुम अपनी तरङ्गोंसे मेरे अङ्गोंका सिंचन कर दो, मृत देहको अपने सलिलमें समा लो, जिससे गतप्राण मेरे देहका दाह शान्त हो जाय। इस प्रकार श्रीराधा श्रीकृष्ण विरहमें दसवीं दशाको प्राप्त होने लगीं। प्रस्तुत श्लोकमें वसन्ततिलका छन्द तथा अप्रस्तुत प्रशंसा अलङ्कार है। प्रातर्नील-निचोलमच्युतमुर संवीत पीतांशुकं राधायाश्चकितं विलोक्य हसति स्वैरं सखीमण्डले। व्रीडाचञ्चलमञ्चलं नयनयोराधाय राधानने स्मेरस्मेरमुखोऽयमस्तु जगदानन्दाय नन्दात्मजः॥४॥ इति षोडश सन्दर्भः। इति श्रीगीतगोविन्द महाकाव्ये विप्रलब्धा वर्णने नागर-नारायणो नाम सप्तमः सर्गः। अन्वय—[अथैतद्दुःखवर्णनमंसहिष्णुः कविः सिंहावलोकन्यायेन साधारण-केलिरात्रैः प्रातश्चरितवर्णनेन श्रीराधायाः खण्डितावस्थां
२७० श्रीगीतगोविन्दम् वर्णयिष्यन् श्रीराधामाधवयोः प्राक्तन-केल्यनन्तरावरस्थितिवर्णनेन मङ्गलमातनोति]—[कदाचित्] प्रातः (प्रभाते) नीलनीचोलं (नीलं निचोलं वस्त्रं यस्य तादृशं परिहित-राधावसनमित्यर्थः) अच्युतं (हरिं) [तथा] संवीतपीतांशुकं (संवीतम् उत्तरीकृतं श्रीकृष्णस्य पीतम् अंशुकं वस्त्रं यत्र तादृशं) राधाया उरः (वक्षःस्थलं) विलोक्य सखीमण्डले स्वैरं (स्वच्छन्दम् उच्चैरित्यर्थः) [तथा] चकितं (चमत्कृतं यथा तथा) हसति [सति] राधानने (श्रीराधावदने) व्रीड़ाचञ्चलं (व्रीड़या लज्जया चञ्चलं यथा तथा) नयनयोः अञ्चलं (नेत्रप्रान्तं कटाक्षमित्यर्थः) आधाय (विन्यस्य) स्मेर-स्मेर-मुखः (मृदुमन्दसहास्यवदनः) अयं नन्दात्मजः (नन्दनन्दनः) जगदानन्दाय अस्तु (जगतामानन्दं विदधातु) [अतः सर्गोऽयं नागरा एव नरा नरसमूहास्तेषामयनं मूलभूतः श्रीकृष्णो यत्र स इति सप्तमः सर्गः] ॥४॥ अनुवाद—प्रातःकाल विभ्रमवश श्रीकृष्णने श्रीराधाजीका नील उत्तरीय वस्त्र (कञ्चुक) तथा श्रीराधाने अपने वक्षःस्थल पर श्रीकृष्णका पीत उत्तरीय वस्त्र धारण कर लिया, जिसे देख सखीमण्डल स्वच्छन्दतापूर्वक हँसने लगा। उन्हें हँसता हुआ देखकर श्रीकृष्णने मन्दमुस्कानके साथ सलज्ज होकर अपाङ्ग- भङ्गिमासे श्रीराधाके मुखारविन्दके प्रति कटाक्षपात किया। ऐसे नन्दनन्दन श्रीकृष्ण जगतके लिए आनन्दका विधान करें। बालबोधिनी—प्रस्तुत सर्गके अन्तिम श्लोकोंमें वैष्णवोंको कवि जयदेवके द्वारा आशीर्वाद दिया गया है—यह नन्दनन्दन श्रीकृष्ण जगतको आनन्ददायी हों। निकुञ्ज-वनके निकट जयदेवजीके द्वारा श्रीराधा-माधवकी पूर्व-केलिका स्मरण कर प्रातःकालकी स्थितिका निरूपण किया है। कवि जयदेव श्रीराधाका विरह वर्णन करनेमें असमर्थ हो गये, तब सिंहावलोकन न्यायसे रात्रिकालीन साधारण केलिका चित्राङ्कन कर प्रातःकालीन श्रीराधाकी खण्डितावस्थाका दिग्दर्शन कराया
सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २७१ है। श्रीश्रीराधा-माधव दोनोंने एक साथ रति-केलिके द्वारा पिछली रात बितायी है एवं विभ्रमसे एक-दूसरेके वस्त्र पहन लिये हैं। इस वैचित्र्य परिवर्त्तनसे सखियाँ हँस पड़ीं, उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। अच्युत श्रीकृष्णने अपने तनपर नील-वसन कञ्चुकको धारण किया है और श्रीराधाका उर पीताम्बरसे ढका हुआ है। यह वस्त्र-विनिमय ही सखियोंके स्वच्छन्द हास्यका कारण है। लज्जासे चञ्चल नेत्रोंको श्रीराधाके मुख पर रखते हुए कटाक्षपात कर श्रीकृष्ण मन्द-मन्द मुस्कराने लगे। प्रस्तुत श्लोकमें कवि जयदेवकी लोकमङ्गलकी कामना प्रकट हुई है। हास्य रस, शार्दूल विक्रीड़ित छन्द, स्वभावोक्ति अलङ्कार, नायक शठ एवं नायिका अभिसारिका है। श्रीगीतगोविन्दके सोलहवें सन्दर्भकी बालबोधिनी वृत्ति समाप्त। इति सप्तमः सर्गः।