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गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

२३८ श्रीगीतगोविन्दम् रतिक्रीड़ामें उसके केशपाश ढीले होकर इधर-उधर लहरा रहे हैं, उसमेंसे ग्रंथित पुष्प भी झर गये हैं। मधुरिपु—श्रीकृष्ण माधुर्यके शत्रु हैं, उनको माधुर्यका भान ही नहीं है। इसलिए वे मेरी उपेक्षा करके किसी दूसरी युवतीके साथ रतिविलासमें लिप्त हैं। युवतिरधिकगुणा—वह ब्रजरमणी मुझसे भी अधिक गुणशालिनी है, पर यह तो संभव ही नहीं है। अधिक गुणोंका व्यंगार्थ है—कम गुणोंवाली युवती रमण कर रही है, यह बड़े आश्चर्यकी बात है। इससे विपरीत रति सूचित होती है। विपरीत रतिमें युवतीका ही रतिकर्तृत्व रहता है। स्मरसमर—रतिकेलिको स्मर-समर कहा गया है। रतिक्रीड़ामें रति-विमर्दन आदि क्रिया होती है, जिससे नायिकाका कबरी बन्धन खुल जाता है, उसमें सन्निहित पुष्प झर जाते हैं, विश्रृंखलित हो जाते हैं। हरि-परिरम्भण-वलित-विकारा। कुच-कलशोपरि तरलित-हारा ॥ कापि मधुरिपुणा... ॥२ ॥ अन्वय—[अतःपरं षड्भिः तामेव विशिनष्टि] हरि-परिरम्भण- वलितविकारा (हरेः परिरम्भणेन आलिङ्गनेन वलितः रचितः विकारः रोमाञ्चादि-कामज-विकृतिर्यस्याः तादृशी) [तथा] कुच-कलसोपरि (स्तनकुम्भयोरुपरि) तरलित-हारा (तरलितः आन्दोलितः हारो यस्यास्तादृशी) [कापि अधिकगुणा इत्यादि प्रत्येकेन योजनीयम्] ॥२ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णका प्रगाढ़ रूपसे आलिङ्गन करनेपर मदन-विकारसे विमोहित उसमें रोमांच आदि विकार उत्पन्न हो गये होंगे और उसके कुचकलशों पर हार दोलायमान हो रहा होगा। पद्यानुवाद— हरि-परिरंभण-वलित-विकारा। कुच-कलशोपरि-तरलित-धारा ॥

सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २३९ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई॥ बालबोधिनी—श्रीराधा आनुमानिक तौर पर उस रमणीकी चेष्टाओंको चित्रित करते हुए कहती हैं कि श्रीकृष्णके द्वारा आलिङ्गित होनेसे उस युवतीमें कामोचित रोमांचादि मदन-विकार उद्भूत हो गये होंगे। कलश सरीखे उन्नत स्तनोंपर हार दोलायमान हो रहा होगा। हारकी चञ्चलता रतिकालमें युवती द्वारा रतिकर्तृत्व अथवा विपरीत रतिमें ही संभव है। विचलदल-कललितानन-चन्द्रा। तदधर-पान रभस-कृत-तन्द्रा ॥ कापि मधुरिपुणा... ॥३ ॥ अन्वय-विचलदलक-ललितानन-चन्द्रा (विचलद्भिः अलकैः चूर्णकुन्तलैः ललितः सुन्दरः आननमेव चन्द्रो यस्यास्तादृशी) [तथा] तदधर-पान-रभस-कृत-तन्द्रा (तस्य कृष्णस्य अधरपान- रसभेन अधरपानावेशेन कृता तन्द्रा आनन्द-निमीलनं यस्याः तादृशी) ॥३॥ अनुवाद—उसका मुखचन्द्र घुँघराली अलकावलियोंसे सुललित हो रहा होगा और श्रीकृष्णकी अधर-सुधाका पान करनेकी अतिशय लालसाके कारण नयनयुगल आनन्दपूर्वक निमीलित हो रहे होंगे। पद्यानुवाद- अलक-ललित मृदु आनन चन्द्रा। अधर-पान-मुद अधिकृत तन्द्रा ॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई ॥ बालबोधिनी—उस रमणीका मुखचन्द्र चंचल अलकावलियोंके कारण और भी अधिक शोभाशाली दीखता होगा। रति कालमें श्रीकृष्णकी अधर-सुधाका पान कर रतिजन्य आनन्दमें

२४० श्रीगीतगोविन्दम् निमग्न आँखें बन्द करके वह कपट निद्राका मिथ्या अभिनय कर रही होगी। चञ्चल-कुण्डल-ललित-कपोला। मुखरित-रसन-जघन-गति-लोला॥ कापि मधुरिपुणा...॥४॥ अन्वय—चञ्चल-कुण्डल-ललित-कपोला (चञ्चलाभ्यां तदधर-पानावेषादिति भावः कुण्डलाभ्यां ललितौ परममनोहरौ कपोलौ यस्याः सा) [तथा] मुखरित-रसन-जघन-गति-लोला (मुखरिता शब्दायमाना रसना काञ्ची यस्मिन् तादृशस्य जघनस्य गतिः तया लोला चपला)॥४॥ अनुवाद—कुण्डल-युगल चञ्चल होनेपर उसके कपोल- तलकी शोभा और भी बढ़ रही होगी, कटितट पर विराजमान मणिमय मेखलाकी क्षुद्र घण्टिकाएँ उसके जघन स्थल पर आन्दोलित होनेके कारण सुमधुररूपसे मुखरित हो रही होंगी। पद्यानुवाद— चंचल कुंडल ललित कपोला। मुखरित रसन जघन गति लोला॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई॥ बालबोधिनी—रतिक्रीड़ामें संलग्न उसके कुण्डल-युगलोंका आन्दोलित होना स्वाभाविक ही है—इससे उसके कपोलोंकी मनोहरता और भी बढ़ गयी होगी, मेखलामें संलग्न घुँघरू बार-बार बजते होंगे, जाँघोंका सदा संचलन होनेके कारण वह अति चंचल प्रतीत होती होगी। दयित-विलोकित-लज्जित-हसिता। बहुविध-कूजित-रति-रस रसिता— कापि मधुरिपुणा...॥५॥

सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २४१ अन्वय—दयित-विलोकित-लज्जित-हसिता (दयितस्य प्रियस्य विलोकितेन वीक्षणेन-लज्जितं लज्जायुक्तं हसितं हास्यं यस्याः तथोक्ता) [तथा] बहुविध कूजित-रति-रस-रसिता (बहुविधं पारावतादिवत् कूजितं यस्यां तादृशी या रतिः तस्या रसेन आस्वादेन रसिता रसपूर्णा) ॥५॥ अनुवाद—दयित श्रीकृष्णके द्वारा अवलोकित होने पर वह लज्जित होती होगी, हँसती होगी, रतिकालमें रतिसरसिता होकर कोकिल कलहंसादिके समान मदनविकार सूचक 'सीत्कार' शब्द करती होगी। पद्यानुवाद— हरि-आलोकित-लज्जित-हँसिता। बहु विधि कूजित रति-रस-रसिता ॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई ॥ बालबोधिनी—प्रियतम श्रीकृष्ण जब तृप्त होकर उसकी ओर देखते होंगे, तब वह लज्जित होकर गर्दन झुका लेती होगी, हँसती होगी, रतिरसातिरेकके कारण वह पक्षियों—कोकिल, कलहंसके समान विविध प्रकारकी मधुर सीत्कार ध्वनि करती होगी। विपुल-पुलक-पृथु-वेपथु-भङ्गा। श्वसित-निमीलित-विकसदनङ्गा— कापि मधुरिपुणा... ॥६॥ अन्वय—विपुल-पुलक-पृथु-वेपथु-भङ्गा (विपुलाः पुलकाः पृथुः महान् वेपथुः कम्पश्च तेषां भङ्गाः तरङ्गाः यस्याः तादृशी) [तथा] श्वसित-निमीलित-विकसदनङ्गा (श्वसितेन निमीलितेन च विकसन् आविर्भवन् अनङ्गः मदनः यस्याः तादृशी) ॥६॥ अनुवाद—अनंग-रससे पुलकित हो उसके रोमांच एवं

२४२ श्रीगीतगोविन्दम् कम्प ही उसके तरंगके समान हैं। सघन निःश्वास एवं नेत्र-निमीलनके द्वारा वह मदन-आवेश प्रकाशित करती होगी। पद्यानुवाद— विपुल पुलक पृथु वेपथु भंगा। श्वसित निमीलित उदित अनंगा ॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई ॥ बालबोधिनी—रतिकालमें पुलकावलियोंसे, कम्पनसे, स्वरभंग होनेसे वह लम्बी-लम्बी श्वासोच्छ्वास करती होगी, आनन्द प्राप्ति होने पर आँखें मूँद लेती होगी, जिससे उसका काम विकसित होता होगा। वेपथुभङ्ग—प्रस्तुत श्लोकमें रोमाञ्च तथा कम्पको तरंग सदृश इसलिए बताया है कि जिस प्रकार जलाशयमें एकके बाद दूसरी तरंग उत्पन्न होती है, उसी प्रकार उसके शरीरमें भी रोमांच तथा कम्प उत्तरोत्तर उत्पन्न होते होंगे।

श्रमजल-कण-भर-सुभग-शरीरा। परिपतितोरसि रति रण-धीरा ॥ कापि मधुरिपुणा... ॥७॥ अन्वय—श्रम-जल-कण-भर-सुभग-शरीरा (श्रमजलकणभरेण सुरतश्रमजात-स्वेदवारिबिन्दुसमूहेन सुभगं सुन्दरं शरीरं यस्याः सा) [तथा] रतिरणधीरा (सुरतसंग्रामे धीरा पण्डिता) [निःसहता- विस्मृत-स्वाङ्गानुसन्धानतया] उरसि (कान्तस्य वक्षसि) परिपतिता ॥७॥ अनुवाद—रतिरसनिपुण वह कामिनी सुरत-क्रीड़ा जन्य पसीनेकी बूँदोंसे और भी सुन्दर लगती होगी, रतिक्रियामें धैर्य धारण करनेवाली वह रतिश्रमश्रान्ता श्रीकृष्णके वक्षःस्थल पर निपतिता होकर कितनी शोभा पा रही होगी।

सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २४३ पद्यानुवाद- श्रमजल कण भर सुभग शरीरा। हरि-उर पतित सुरति रणधीरा॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई॥ बालबोधिनी-अनंग आवेशमें वह पूर्ण रूपसे थक गयी होगी। सुरतायासजन्य श्रमबिन्दुओंसे उसका मुखारविन्द कैसा चमकता होगा? स्वयंको विस्मृत होकर सुरतक्रियारूपी रणमें दक्ष वह श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर गिर गयी होगी, उसकी शोभा कैसी अद्भुत हो रही होगी। श्रीजयदेव-भणित-हरि-रमितम् । कलि-कलुष जनयतु परिशमितम्- कापि मधुरिपुणा... ॥८॥ अन्वय-श्रीजयदेव-भणित-हरि-रमितं (श्रीजयदेवेन भणितं यत् हरिरमितं हरेः रमणं) [भक्तानां] कलिकलुषं (कामादिकं) परिशमितं जनयतु ॥८॥ अनुवाद-कवि जयदेव द्वारा वर्णित यह हरि-रमण-विलास रूप रतिक्रीड़ा सबका कलि-कल्मष अर्थात् कामवासनाको शान्त करे। पद्यानुवाद- श्रीजयदेव कथित यह लीला। कलि-मल सहज विनाशनशीला ॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई ॥ बालबोधिनी-गीतगोविन्दके इस चौदहवें प्रबन्धका नाम हरिरमितचम्पकशेखर है। इस प्रबन्धमें विपरीत रतिका वर्णन है। रति-व्यापारका यह वर्णन अति पवित्र है। यह पाठकों तथा श्रोताओंके कलिदोषजन्य काम-विकारका प्रक्षालन करे।

२४४ श्रीगीतगोविन्दम् विरह-पाण्डु-मुरारि-मुखाम्बुजद्युतिरयं तिरयन्नपि वेदनाम्। विधुरतीव तनोति मनोभुवः सुहृदये हृदये मदनव्यथाम्॥ इति चतुर्दशः सन्दर्भः। अन्वय—[अथ चन्द्रं पश्यन्ती तं श्रीकृष्णमुखत्वेन उद्भाव्य तत्र अन्यया सह वर्त्तमानस्यापि मद्विरहेण पाण्डुत्वस्फुत्त्या स्वस्मिन् तस्य अतिप्रणयितां स्मरन्ती चन्द्रमाक्षिपति]—अये (खेदे) मनोभुवः (कामस्य) सुहृत् (मित्रभूतः) विरहपाण्डु-मुरारि- मुखाम्बुजद्युतिः (विरहेण मम विच्छेदेन पाण्डु यत् मुरारेः कृष्णस्य मुखाम्बुजं तस्य द्युतिरिव द्युतिर्यस्य तथाभूतः) [अतएव] वेदनां (सन्तप्तानां मनोव्यथां) तिरयन्नपि (आच्छादयन् निराकुर्वन्नपीत्यर्थः, चन्द्रदर्शनेन श्रीकृष्णमुखदर्शनजनितानन्दलाभादिति भावः) अयं विधुः (चन्द्रः) हृदये अतीव मदनव्यथां (कृष्णस्य अदर्शन-जनितामिति भावः) तनोति (विस्तारयति) [मदन-सुहृत्त्वेन तन्मुखस्मारकतया चन्द्रो मां व्यथयतीत्यभिप्रायः] ॥१॥ अनुवाद—प्रिय सखि! मेरे विरहमें पाण्डुवर्ण हुए श्रीमुरारीके मुखकमलकी कान्तिके समान धूसरित यह चन्द्रमा मेरी मनोव्यथाको तिरोहित कर कामदेवके सुहृद्भूत मेरे हृदयमें मदन-सन्तापकी अभिवृद्धि कर रहा है। बालबोधिनी—श्रीराधाने विलाप करते हुए सारी रात बितायी। जब चन्द्रमाको अस्ताचलकी ओर जाते देखा, तब अपने प्रति श्रीकृष्णके पूर्वरागका स्मरण कर अपनी प्रिय सखीसे कहने लगी—अरे सखि! कितने कष्टकी बात है। यह जो चन्द्रमा है, सन्तप्त व्यक्तियोंकी विरह-व्यथाको और भी बढ़ा रहा है। अब यह अस्तमित हो रहा है, जिससे मेरा मदनताप तिरोहित हो रहा है। इसके पाण्डुवर्णको देखकर मुझे श्रीहरिके मुखकमलका स्मरण हो रहा है—मेरे विरहमें वे कैसे निष्प्राण हो गये होंगे? अन्य प्रकारसे अनुमान करती हुई कहती हैं कि श्रीहरि मेरा परित्याग कर किसी दूसरी रमणीके साथ रमण कर रहे हैं, इसलिए उनकी ढलते चन्द्रमा जैसी कान्ति हो गयी है, यही कारण है कि हृदयमें सन्ताप और अधिक गहरा गया है।

सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २४५ पञ्चदशः सन्दर्भः। गीतम् ॥१५ ॥ गुर्जरीरागैकतालीतालेन गीयते। अनुवाद—गीत-गोविन्द काव्यका यह पन्द्रहवाँ प्रबन्ध गुर्जरी राग तथा एकताली तालसे गाया जाता है। इस गीतिमें श्रीकृष्णके साथ विलास करनेवाली रमणीको स्वाधीन-भर्त्तृकाके रूपमें दिखाया गया है, जो यमुना-पुलिनमें श्रीकृष्णके साथ विलास-परायणा है। समुदित-मदने रमणी-वदने चुम्बन-वलिताधरे। मृगमदतिलकं लिखति सपुलकं मृगमिव रजनीकरे॥ रमते यमुना-पुलिन-वने विजयी मुरारिरिधुना ॥१ ॥ध्रुवम् अन्वय—[पुनस्तस्या एव स्वाधीन-भर्त्तृकत्वं सूचयन् तल्लीलाविशेषमाह] —अधुना (इदानीं) विजयी (जयशीलः मण्डनादि-कौशलेन सर्वातिशायी) मुरारिः (श्रीहरिः) यमुनापुलिनवने (यमुनायाः पुलिनवर्त्तिनि कानने) [तया सह] रमते (क्रीड़ति); [तथाच] समुदितमदने (समुदितः सम्यक् वृद्धिंगतः मदनः यस्मात् तस्मिन् कामोद्दीपके इत्यर्थः; चन्द्रपक्षेऽपि स एवार्थः) चुम्बन-वलिताधरे (वदनपक्षे तिलकं लिखित्वा साध्विदं वदनमित्युक्त्वा चुम्बनाय वलिता विन्यस्तः अधरो यत्र, चन्द्रपक्षे चुम्बनेन वलितो युक्तोऽधरः यस्मात् इत्यर्थः) रमणी-वदने (तस्या एव कामिन्याः वदने) रजनीकरे (चन्द्रे) मृगमिव सपुलकं (सरोमाञ्चं स्पर्शेन जातरोमाञ्चं यथास्यात् तथा) मृगमदतिलकं (मृगमदस्य कस्तूरिकायाः तिलकं) लिखति (ददाति) ॥१ ॥ अनुवाद—रतिरणमें विजयी मधुरिपु यमुना-पुलिनके वनमें प्रियाके साथ रमण कर रहे हैं, पुलकावलियोंसे पूर्ण कामकी उद्दीपन-स्वरूपा उस रमणीके वदनमें चन्द्रमण्डलके ऊपर मृगलाञ्छनकी भाँति कस्तूरी तिलककी रचना कर रहे हैं एवं रोमाञ्चित हो उसका चुम्बन कर रहे हैं।

२४६ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— यमुन-पुलिनके सघन कुंजमें रमते आज मुरारी। प्रियकी अमर सुहागिनी होकर जीती बाजी हारी॥ रचते मृगमद तिलक पुलक कर मदन-मुदित मुख उसके। चुम्बन वलित अधर लगते हैं, मधुर रसातुर जिसके॥ बालबोधिनी—श्रीराधा अपनी कल्पनाओंके वितानमें प्रलाप करती हुई कहती हैं—(विरहमें भाव-नेत्रों द्वारा अपनी पूर्व लीलाका स्मरण कर उसीका वर्णन करती हैं) इस कामसंग्राममें मधुरिपु मुझे पराभूतकर इस समय निकुंजमें विजय-उत्सव मना रहे हैं। श्रीराधा उस काल्पनिक रमणीका स्वरूप बताते हुए कहती हैं कि यमुनापुलिनके वनमें श्रीकृष्ण मण्डनादि कला-कौशलके द्वारा उस रमणीके साथ क्रीड़ा कर रहे हैं। उस रमणीके मुख-कमल पर मृगमदसे तिलककी रचना कर रहे हैं, जिससे वह अति पुलकित हो रही है। चुम्बनकी अभिलाषासे श्रीकृष्णने उसका मुख अपने सम्मुख कर लिया है, उसमें काम पूर्ण रूपसे उदित हो गया है, श्रीकृष्ण भी अति रोमाञ्चित हो रहे हैं, वे अपनेको संभाल नहीं पा रहे हैं, बड़ी कठिनाईसे टेढ़ा-मेढ़ा तिलक रच रहे हैं। उसकी शोभा ऐसी हो रही है, मानो चन्द्रमण्डलके ऊपर मृगलाञ्छन हो। उसके अधर एवं मुखमण्डल पर चुम्बन करनेसे श्रीकृष्णके अधर-पुटोंमें उस तिलकका चिह्न अङ्कित हो गया है। घनचय-रुचिरे रचयति चिकुरे तरलित-तरुणानने। कुरुबक-कुसुमं चपला-सुषमं रतिपति-मृग-कानने— रमते यमुना-पुलिन वने..... ॥२॥ अन्वय—[न केवलं तस्या वदने तिलकं लिखति अपितु]—घनचय-रुचिरे (मेघचयवत् रुचिरे शोभने) तरलित- तरुणानने (तरलितं, चञ्चलितं तद्गुणवर्णने मुखरीकृतमित्यर्थः

सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २४७ तरुणस्य श्रीहरेः आननं मुखं येन तत्र) [तथा] रतिपति-मृगकानने (रतिपतिः कामएव मृगः तेन सदाश्रितत्वात् तस्य कानने विचरणस्थाने, कामोद्दीपके इतिभावः) [तस्याः] चिकुरे (कुन्तले) चपला-सुषमं (चपलाया विद्युत्इव सुषमा परमा शोभा यस्य तादृशं) कुरुबककुसुमं (रक्तझिण्टीपुष्पं) रचयति (तत्पुष्पैः तस्याः कवरीं ग्रथनातीत्यर्थः) ॥२॥ अनुवाद—मदन-मृगके विहार-कानन-स्वरूप उस युवतिके मेघ-समूहके समान मनोहर कुन्तल (केशपाश) हैं, जिससे उसका तरुण करुण आनन सतत उल्लसित होता है, उनमें वे कुरुवक कुसुम सन्निवेशित कर रहे हैं। पद्यानुवाद— गोरे मुखपर श्याम तिलकने ऐसी ही छवि धारी। मिरग साथ ज्यों खिल उठती है चन्दाकी उजियारी॥ चपलसे, कुरुबक कुसुमोंसे, सजल मेघसे काले— केशोंको उसके सजते हैं, भीगेसे मतवाले॥ यमुन-पुलिनके सघन कुंजमें रमते आज मुरारी। प्रियकी अमर सुहागिनि होकर जीती बाजी हारी॥ बालबोधिनी—श्रीराधा अपनी सखीसे श्रीकृष्णकी शृङ्गार- क्रीड़ाका विवरण करती हुई कहती हैं—उन्होंने केवल उसके ललाट पर ही तिलक रचना की हो, केवल ऐसा ही नहीं है, अपितु कनेर पुष्पोंसे उसके केशोंकी भी सज्जा की है। उसके बाल इस प्रकार काले, स्निग्ध, घने एवं घुँघराले हैं, मानो कोई सजल मेघोंका समूह हो। वह केशपाश ऐसा लगता है, मानो कामदेवरूपी मृगके निर्भय घूमनेके लिए घना कानन हो। इस केशपाशके अवलोकन मात्रसे ही युवकोंका मन चञ्चल हो जाता है। श्रीहरिके द्वारा रमणीके केशपाशमें सुसज्जित कुरुवकके पुष्प विद्युतकी अतिशय छटाको धारण कर रहे हैं।

२४८ श्रीगीतगोविन्दम् घटयति सुघने कुच-युग-गगने मृगमद-रुचिरुषिते । मणिसरममलं तारक-पटलं नख-पद-शशि-भूषिते ॥ रमते यमुना-पुलिन वने..... ॥३॥ अन्वय—सुघने (निविड़े; शोभनमेघयुक्ते च) नखपद-शशि- भूषिते (नखपदं नखक्षतं तदेव शशी तेन भूषिते) [तथा] मृगमद-रुचि-रूषिते (मृगमदस्य कस्तूरिकायाः या रुचिः कान्तिः तया रूषिते म्रक्षिते; गगनपक्षे कस्तूरीदीप्त्यैव म्रक्षिते) कुचयुग-गगने (कुचयुगमेव वृहत्त्वात् गगनं (तत्र) अमलं (निर्मलम् उज्ज्वलमिति यावत्) मणिसरं (मुक्ताहारं) [एव] तारक-पटलं (नक्षत्रराजिं) घटयति (योजयति) ॥३॥ अनुवाद—उस सुकेशीके गाढ़ नीलवर्णा कस्तूरीकी धूलिसे रुषित (विलेपित) परस्पर नितान्त सन्निहित विशाल कुचयुग- मण्डलरूप गगन जो अर्द्धचन्द्राकार नखक्षतसे परिशोभित है, उस पर निर्मल तारक-दलके समान मनोहर मणिमय हारको अर्पित कर रहे हैं। पद्यानुवाद— मृगमद-रंजित कुच-युग-गगने, नखपद शशिसे विलसे। चमक रहे मणि-हार अमल अति, चम-चम तारक-दलसे ॥ यमुन-पुलिनके सघन कुंजमें, रमते आज मुरारी। प्रियकी अमर सुहागिनि होकर, जीती बाजी हारी॥ बालबोधिनी—श्रीराधा कह रही हैं कि नखके अर्द्धचन्द्राकार चिह्नोंसे विभूषित उस रमणीके वक्षस्थलपर मणियोंकी मालारूप तारासमूह विन्यस्त कर रहे हैं। आकाश तथा स्तनद्वयमें एक विचित्र ही मनोरम अन्विति है। कुचयुगगगने—दोनों स्तन उस प्रकार विस्तृत हैं, जैसे आकाश विस्तृत होता है। आकाशके बिम्बसे स्तनोंके पीनत्वकी प्रतीति करायी गयी है। सुघने—परस्पर सन्निहित उस नायिकाके स्तन अति कठोर हैं, जैसे आकाश सघन सुन्दर बादलोंसे युक्त होता है।

सप्तमः सर्गः - नागर-नारायणः २४९ मृगमदरुचिभूषिते-सुरतजन्य श्रमके कारण स्तनोंपर स्वेदविन्दु क्षरित होते हैं, तब उन्हें सुखानेके लिए कस्तूरीके चूर्णको मला जाता है, गगन भी तो कस्तूरीवत् नील कान्तियुक्त होता है। तारकपटलं नखपद शशिभूषिते-उस सुकेशीके कुच युगल रूपी गगनमें तारोंके समुदाय सदृश मुक्ता सरोवर परिलक्षित हो रहा है। उसमें श्रीकृष्णके नखोंके अग्रभागके आघातसे विभूषित चिह्न अर्द्धचन्द्राकारकी शोभाको प्राप्त हो रहे हैं। उसके स्तनमण्डलको श्रीकृष्ण मोतियोंकी मालारूपी ताराओंसे सजा रहे हैं। ये सम्पूर्ण उपमान एक सुन्दर बिम्ब-योजना है। तिलक मृग है, ललाट चन्द्रमा है और केशपाश अभयारण्य बन गया है। कुरुवकके फूल बिजलीकी चमक एवं वक्षस्थल आकाश हो गया है। नख-क्षत चन्द्रमा एवं छोटी-छोटी मणियाँ ताराओंके रूपमें सुशोभित हुई हैं। जित-विस-शकले मृदु-भुज-युगले करतल-नलिनी-दले। रकत-वलयं मधुकर-निचयं वितरति हिम-शीतले ॥ रमते यमुना-पुलिन वने..... ॥४॥ अन्वय-जित-विस-शकले (जितानि विसशकलानि मृणालखण्डानि येन तादृशे) करतल-नलिनीदले (करतलमेव नलिनीदलं पद्मपत्रं यत्र तस्मिन्) [तथा] [सम्भोगिन्याः कामतापराहित्यात्] हिमशीतले (हिमवत् शीतले) मृदुभुजयुगले (कोमलबहुद्वये) मधुकर-निचयं (भ्रमरपङ्क्तिम्) [एव] मरकतवलयं (मरकतमयं वलयं) वितरति (परिधापयति) ॥४॥ अनुवाद-सुकेशी, पीनस्तनी उस रमणीके मृणालदण्डसे भी सुशीतल भुजयुगल जिनमें उसके सुकुमार करतलरूपी नलिनी-दल सुशोभित हो रही हैं, उनमें वे भ्रमर-सदृश मरकतमय वलयरूपी कंगन धारण करा रहे हैं।

२५० श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— तालखण्डसे युग भुज, करतल राजित नलिनी दलसे। पहिनाते मरकत-कंकण जो लगते छाये अलिसे॥ यमुन-पुलिनके सघन कुंजमें रमते आज मुरारी। प्रियकी अमर सुहागिनि होकर जीती बाजी हारी॥ बालबोधिनी—श्रीराधा कह रही हैं—उस भाग्यशालिनीकी दोनों भुजाएँ कोमलतामें मृणालदण्डको भी मात कर देनेवाली हैं। सुकुमार गौर वर्ण, हिमके समान दोनों हाथोंकी सुशीतल हथेलियाँ कमलके समान लाल-लाल हैं। जिस प्रकार लाल कमल-दलोंके ऊपर नीले-नीले भौंरे अत्यन्त अभिराम प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार उसके करतलोंमें श्रीकृष्ण नीलमणिजड़ित कंगनरूपी भौंरे धारण करा रहे हैं। कोमल बाहोंमें ये कंगन ऐसे सुशोभित होते हैं मानो उन हाथोंको घेरकर भौंरे एक कली-पंक्ति बना रहे हों। हिमशीतले—सम्भोगकारिणी रमणीका भुजयुगल श्रीकृष्णके स्पर्शसे काम-ताप शून्य होकर हिमवत् शीतल हो गया है अथवा उस रमणीमें कामका अभाव है—यह भी सूचित होता है। उसके ठण्डे हाथोंमें यह कंगन एक नया ताप प्रदान करेगा। रति-गृह-जघने विपुलापघने मनसिज-कनकासने। मणिमय-रसनं तोरण-हसनं विकिरति कृत-वासने॥ रमते यमुना-पुलिन वने.....॥५॥ अन्वय—विपुलापघने (विपुलम् अपघनम् अङ्गम् आयतन- मित्यर्थः यस्य तादृशे विशाले इत्यर्थः) मनसिज-कनकासने (मनसिजस्य कामस्य कनकासने स्वर्णपीठे) [तथा] कृतवासने (कृता वासना लीला-विशेषवासना येन तादृशे दृष्टमात्रेणैव कामोद्दीपके इत्यर्थः) [तस्याः] रतिगृहजघने (रतेः शृङ्गारस्य गृहम् आश्रय एव जघनं कटि-पुरोभागः नितम्बो वा तस्मिन्)

सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २५१ तोरणहसनं (तोरणस्य बहिर्द्वारशोभार्थ माङ्गल्यस्रजः हसनम् उपहासः यस्मात् तत्; ततोऽप्यधिकमनोज्ञमित्यर्थः) मणिमयरसनं (मणिमयं रसनं काञ्चीं) विकिरति (निक्षिपति) [तत्स्पर्शाजात- कम्पतया अयथातथं विन्यस्यतीत्यर्थः] ॥५॥ अनुवाद—मांसल, सुगन्धित, विपुलतर कन्दर्पके सुवर्ण-पीठ- स्वरूपके समान रतिगृह तुल्य उस रमणीके जघन-स्थलमें मणिमय मेखलारूपी मंगल तोरण धारण करा रहे हैं। पद्यानुवाद— मनसिज कनकासन सम उसके मांसल रतिगृह-जघने। सजा रहे तोरण सम कांची (स्मित अंकित वर वदने) ॥ यमुन-पुलिनके सघन कुंजमें रमते आज मुरारी। प्रियकी अमर सुहागिनि होकर जीती बाजी हारी॥ बालबोधिनी—श्रीराधा कह रही हैं कि उस रमणीकी जाँघें रतिकेलिकी आश्रयस्वरूप हैं। विपुल, कमनीय एवं मांसलताको प्राप्त वह उरुस्थल कामदेवका सुवर्णरचित पीठस्वरूप है, जिसके अवलोकनसे ही श्रीकृष्णके मनमें मदन-लालसा जाग्रत हो जाती है। कृतवासनं—नायिकाएँ अपने अंगोंको एक विशेष प्रकारकी सुगन्ध-सिद्ध धूपसे सुवासित करती हैं, जिससे नायक उसके वशमें हो जाते हैं। उस रमणीने अपनी जाँघोंको इसी प्रकारसे सुवासित करके श्रीकृष्णको अपने वशमें कर लिया है। कनकासने—कामदेवका हेमपीठ। 'कनक' शब्दका अर्थ धतूरा भी होता है, जो शंकरजीको अति प्रिय है। श्रीशंकरने कामदेवको भस्मीभूत कर दिया था, अतः उनके प्रिय 'कनक' शब्दके प्रयोगके द्वारा कामकी उत्तेजनाको सूचित किया है। मणिमयरसनं तोरणहसनं—जब कोई राजा सिंहासनारूढ़ होता है, तो द्वारपर मंगलमय वन्दनवार सजाया जाता है।

२५२ श्रीगीतगोविन्दम् यहाँ कामरूप राजाके गौरवर्णनीय उरुस्थल रूपी हेमसिंहासन पर आरूढ़ होनेके लिए उसे मणिमय मेखलारूपी वन्दनवारसे श्रीकृष्ण सजा रहे हैं। विकिरति—उरु-स्थलके स्पर्शसे कन्दर्पजनित कम्पन भाव उदित होता है, अतः मणिमय मेखलाको ठीक-ठीक रूपसे धारण करानेमें समर्थ नहीं हुए। फिर भी पहनानेकी कोशिश की गयी है—एक लीलाविशेषकी भावना बन गयी है। चरण-किसलये कमला-निलये नख-मणिगण-पूजिते। बहिरपवरणं यावक-भरणं जनयति हृदि योजिते॥ रमते यमुना-पुलिन वने.....॥६॥ अन्वय—हृदि (वक्षसि) योजिते (विनिहिते) कमला-निलये (कमलायाः सौन्दर्याधिदेवतायाः श्रियाः निलये आवासे) नखमणिगण-पूजिते (नखा एव मणिगणाः तैः पूजिते अर्चिते) चरणकिशलये (पादपल्लवे) यावक-भरणं (यावकं अलक्तकमेव भरणम् आभरणं) बहिरपवरणं (बहिरावरणं) जनयति (करोति) [श्रीनिवासस्य मणियुतस्य च बहिरावृतिर्युक्तैवेत्यर्थः] [यद्वा कमलानिलये हृदि इत्येवमन्वयः कार्यः]॥६॥ अनुवाद—उस नितम्बिनीके अरुण मनोहरश्रीसे सम्पन्न एवं नखरूपी मणियोंसे विभूषित पद-पल्लवोंको नखक्षत एवं मणियोंसे समलंकृत एवं लक्ष्मीके वासस्थल अपने हृदयपर स्थापित करते हुए बड़े यत्नसे आवरण-आच्छादन करते हुए जावक-रससे रञ्जित कर रहे हैं। पद्यानुवाद— कमलाके समान आवास-हृदय पर पग उसके हैं धरते। और हाथसे 'जावक' रचना फिर मातल हो करते॥ बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णकी नवीन रति-केलिका वर्णन करते हुए कहती हैं—उस बड़भागिनीके चरण-कमल लक्ष्मीके आश्रय-स्वरूप हैं, रक्तिम वर्णके नवीन कोमल

पल्लवोंके समान हैं। उसके पद-नख मणियोंकी कान्तिको धारण किये हुए हैं, उन चरण-युगलको वे अपने हृदयमें संश्लिष्ट करके बैठे हैं, उनके उस वक्षःस्थलमें लक्ष्मी सदा निवास करती है। उनका वह वक्षःस्थल उस रति-निष्णाता रमणी द्वारा अर्पित नखक्षतों एवं मणिसमूहोंसे समलंकृत है। उसके उन स्वाभाविक अरुण वर्ण पदोंमें श्रीकृष्ण अपने करकमलोंसे महावर (आलक्तक रस) लगाकर बाह्य-आच्छादन- अलंकरण प्रदानकर बड़े यत्नसे उन्हें संरक्षण प्रदान कर रहे हैं। नखमणिपूजित विशेषण रमणी एवं श्रीकृष्ण दोनोंमें अन्वित होता है। रमयति सुभृशं कामपि सुदृशं खलहलधरसोदरे। किमफलमवसं चिरमिह विरसं वद सखि! विटपोदरे॥ रमते यमुना-पुलिन वने..... ॥७॥ अन्वय—सखि, खल-हलधर-सोदरे (खलः धूर्त्तः हलधरस्य बलदेवस्य सोदरः तस्मिन्; हलधरस्य इति सोल्लुण्ठनोक्तिः- लाङ्गलभृतः-सूतरामविदग्धस्य इत्यर्थः) कृष्णे कामपि सुदृशं (सुलोचनां कामिनीं) सुभृशं (प्रगाढं) रमयति [सति] इह विटपोदरे (वनमध्ये) अफलं (विफलं) विरसं (रसहीनं यथा तथा) किं (कथं) [अहम्] अवसम् (अवस्थितास्मि) [इत्येतत्] वद (कथय) [मामभिसार्य अन्या सह रमणात् हरेः खलत्वम्] ॥७॥ अनुवाद—हलधरके सहोदर, अविवेकी, गँवार, खल वे श्रीकृष्ण निश्चित रूपसे किसी सुनयनाका प्रगाढ़ आलिङ्गन कर उसके साथ रमण कर रहे हैं, तब सखि! तुम्हीं बताओ, मैं इस लतानिकुंजमें कब तक विरस भावसे बैठी-बैठी प्रतीक्षा करती रहूँ?

२५४ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— ‘पापी’ के पर-तिय-विलासको देखूँ आँखें मींचे। कब तक विरस प्रतीक्षा सखि ! मैं करूँ विटपके नीचे ? यमुन-पुलिनके सघन कुंजमें रमते आज मुरारी। प्रियकी अमर सुहागिनि होकर जीती बाजी हारी ॥ बालबोधिनी—श्रीराधा प्रतीक्षा करती-करती नैराश्यको प्राप्त होकर अपनी सखीसे कहती हैं—सखि ! कुछ तो बोलो, मौनका त्याग करो, अब इस वनके लतानिकुंजमें व्यर्थ ही बहुत देर तक रुकनेसे क्या लाभ है ? 'खल हलधरसहोदरे'—हलधर बलरामजीका नाम है, उनका छोटा भाई कृष्ण, जो अतिशय खल है। हलधरका अर्थ होता है, हलवाहा। श्रीकृष्ण हलवाहेके समान ही खल, गँवार और अविदग्ध हैं। मेरी उपेक्षा कर, मुझे ठग कर उस सुलोचनाके साथ रमण कर रहे हैं। अरे, वह सुलोचना कैसी ? वे तो अपने जैसी किसी गँवार रमणीके साथ ही रमण कर रहे हैं, मेरा उनसे क्या लेना-देना ? मैं उन पर विश्वास स्थापनकर इस बीहड़ वनमें सारी रात बैठी रही, मेरी कितनी उपेक्षा की है। मैं इस कुंजमें दहकती रहूँ, क्या मैं उन्हें ढूँढती ही रहूँ? मेरे पास चारा क्या है? पर सखि ! कैसे सहन करूँ? उन्होंने यहाँ आनेकी बात कही थी, परन्तु वे तो अन्य प्रेयसीके साथ विलासपरायण हो रहे हैं। इस पन्द्रहवें प्रबन्धकी नायिका स्वाधीनभर्तृका है, जिसके गुणोंसे आकृष्ट होकर श्रीकृष्ण उसके सान्निध्यका त्याग न कर श्रीराधाकी उपेक्षा कर रहे हैं। इह रस-भणने कृत-हरि-गुणने मधुरिपु-पद-सेवके। कलि-युग-रचितं न वसतु दुरितं कविनृप जयदेवके ॥ रमते यमुना-पुलिन वने..... ॥८ ॥ अन्वय—रसभणने (रसस्य शृङ्गाररसस्य भणनं कथनं यत्र तस्मिन्) कृतहरिगुणने (कृतं हरेः गुणनं गुणकीर्त्तनं येन

सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २५५ तादृशे) मधु-रिपु-पद-सेवके (श्रीकृष्णपदसेवके) इह (अस्मिन्) कविनृप-जयदेवके (कविश्रेष्ठ-जयदेवे) कलियुग-चरितं (कलि- युगधर्म-वशादाचरितं) दुरितं (पापं) न वसतु ॥८॥ अनुवाद—शृङ्गार-रससे परिपूर्ण श्रीकृष्णकी लीला-कथाओंका कीर्तन करनेवाले, मधुसूदनके सेवक मुझ कविराज जयदेवमें कलियुग आचरित दुरित दोष प्रविष्ट न हों। बालबोधिनी—श्रीजयदेव इस अष्टपदीकी संरचनामें स्वयंको मधुरिपुके सेवकोंमें सर्वश्रेष्ठ मानकर यह प्रार्थना करते हैं कि इस गीतिको सुननेवालोंमें कलियुगके दूषणीय चरित्र प्रविष्ट न हों। 'रसभणने' से तात्पर्य है—रसपूर्ण शृङ्गारिक उक्तियाँ कहनेवाला। 'हरिगुणने' से तात्पर्य है—श्रीहरिकी कथाओंका अभ्यास करनेवाले कविराज जयदेव। इस प्रबन्धमें आयी कविकी सभी उक्तियाँ रसकी उद्दीपना करानेवाली हैं। इस रसकी अभिव्यक्तिसे कलियुगके प्रभावसे तामसी चित्तवृत्तियाँ हृदयमें प्रविष्ट नहीं हो पाती हैं। इस प्रबन्धका नाम हरिरसमन्मथतिलक है, जिसे प्रबन्धराज कहा गया है। यह द्रुत ताल एवं द्रुत लयसे गाया जाता है। इसकी राग मल्हार है। नायातः सखि ! निर्दयो यदि शठस्त्वं दूति ! किं दूयसे ? स्वच्छन्दं बहुवल्लभः स रमते, किं तत्र ते दूषणम् ? पश्याद्य प्रिय-सङ्गमाय दयितस्याकृष्यमाणं गुणै रुत्कण्ठार्तिभरादिव स्फुटदिदं चेतः स्वयं यास्यति ॥१॥ इति पञ्चदशः सन्दर्भः। अन्वय—[इदानीं विषण्णवदनां सखीं सनिवेदमाह]—सखि, निर्दयः (दयाहीनः) शठः (धूर्त्तः अन्तरन्यत् बहिरन्यत्कारीत्यर्थः) यदि न आयातः हे दूति, त्वं किं (कथं) दूयसे (दुःखितासि) ? बहुवल्लभः (बह्व्यः वल्लभ्यः प्रेयस्यः यस्य सः कृष्ण)

२५६ श्रीगीतगोविन्दम् स्वच्छन्दं (निःशङ्कं) रमते; तत्र ते (तव) दूषणं किं (को दोषः); [इत्थं सखीमनूद्य निर्वेदभङ्ग्या आत्मनो दशमीदशामाह]— पश्य अद्य (इदानीं) दयितस्य (कृष्णस्य) गुणैः (सौन्दर्यादिभिः) [रज्जुभिश्चेति ध्वनिः; यथा कश्चित् रज्वाकृष्टः सन् याति तद्वत्] आकृष्यमाणम् इदं (तदप्राप्तितापोद्धनितधैर्यं) [मम] चेतः (चित्तम्) उत्कण्ठार्त्तिभरादिव (उत्कण्ठा औत्सुक्यम् आर्त्तिः पीड़ा च तयोः भरात् आधिक्यात् हेतोः) स्फुटत् इव (विदलदिव) स्वयं यास्यति ॥१॥ अनुवाद— सखी—हे सखि राधे! वे नहीं आये। श्रीराधा—वे निर्दय, निष्ठुर, शठ यदि नहीं आये तो तुम दुःखी क्यों हो रही हो? सखी—वे बहुवल्लभा हैं, स्वच्छन्दतापूर्वक रमण करते हैं। श्रीराधा—इसमें तुम्हारा क्या दोष है? देखो, आज मेरा मन उस प्राणकान्त प्रियतम श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट होकर तथा उत्कण्ठाके भारसे विदीर्ण होकर उनसे मिलनेके लिए स्वयं ही जायेगा। बालबोधिनी—श्रीकृष्णके न आने पर इस विषण्णवदना दूतीको ही हेतु मानकर अत्यन्त विरह-व्यथाके साथ अपनी उत्कण्ठा प्रकट करती हुई रहती है। सखीने श्रीराधासे कहा—हे सखि राधे! उन अनेक प्रेयसियोंवालेको मैंने बहुत बुलाया, पर वे निर्दय आये ही नहीं। श्रीराधाने प्रत्युत्तरमें कहा—हे दूति! यदि वे शठ और धूर्त आये ही नहीं, तो इसमें तुम्हारा क्या दोष है? तुम दुःखी क्यों हो रही हो? तुमने अपना दौत्य-कर्म बहुत अच्छी प्रकारसे कर दिया। दूतीने कहा—मैं इसलिए दुःखी हो रही हूँ कि मैं उन्हें ला नहीं सकी। वे बहुबल्लभा हैं, उनकी अनेक प्रेयसियाँ हैं, वे स्वच्छन्द हैं, जहाँ मन चाहे, वहीं रमण करते हैं। पुनः श्रीराधाने कहा—तब तुम्हारा क्या दोष है? अब तुम देखना,

सप्तमः सर्गः - नागर-नारायणः २५७ मेरा चित्त उनके गुणोंसे आकर्षित होकर उनसे मिलनेके लिए असहनीय वेदनासे फट रहा है और इस पीड़ाका प्राण बनकर उन तक पहुँच जायेगा। कैसा चित्त है— स्वतः सिद्ध रूपसे श्रीकृष्णके गुणोंसे आकृष्ट। 'उत्कण्ठार्तिभराद्' से तात्पर्य है, प्रियमिलनकी इच्छा-पीड़ाके भारसे विदीर्ण चित्त। मेरे द्वारा रोके जाने पर भी रुकेगा नहीं। उनके पास पहुँचेगा ही। अथवा देखो, सखि ! इस समय दयितके साथ दूसरी रमणीके मिलन होनेसे उनकी प्राप्ति सम्भव नहीं है, फिर भी मेरी उत्कण्ठा प्रतिक्षण बढ़ती जा रही है। अथवा हरिके संगमसे पूर्वानुभूत स्मर-सुखको प्राप्त करनेवाला यह चित्त वहाँ जायेगा ही, इसमें न तुम्हारा दोष है और न मेरा। वह रमणी भी उपालम्भके योग्य नहीं है, विधाता ही विमुख हो गया है। अथवा इस प्रकार यह चित्त वहाँ जायेगा ही और निवृत्तिको प्राप्तकर उपरमित हो जायेगा। इस प्रकार श्रीराधा शान्त निर्वेदकी स्थितिमें श्रीकृष्णका गुणगान करती हुई दशमी दशाको प्राप्त हो गयीं। अपने गुणोंके द्वारा श्रीकृष्ण जिस रमणीका सुख-विधान करते हैं, उसे किसी प्रकारका कष्ट नहीं होता, श्रीराधा श्रीकृष्णकी प्राप्तिके अभावमें अति विपन्ना, विषण्णा अवस्थाको प्राप्त हो गयीं। प्रस्तुत श्लोकके पूर्वार्द्धमें श्रीराधाका सखीके साथ वचन-प्रतिवचन है। श्रीराधाके मनमें भाव यह है कि स्वयं यह दूती ही श्रीकृष्णको बुलाने गयी और उनके साथ रमण कर लौट आयी है। अतः वह कृष्णको शठ, निर्दय इत्यादि कहती है। कैसे गँवार हैं वे, नायिका और दूतीमें भी अन्तर नहीं जानते। प्रस्तुत श्लोकमें विक्रीड़ित छन्द है और काव्यलिङ्ग नामक अलङ्कार है।