गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २२७ इत्यर्थः] वनमपि न ययौ [कुतोऽत्रागमनमित्यर्थः] इदं मम रूपयौवनं विमलमपि (अनवद्यमपि) [तेन बिना] विफलम् (व्यर्थम्); [अतएव] हे [नाथ] सखीगण-वचन-वञ्चिता (कृष्ण इह अचिरेणैव स्वयमायास्यतीति सखीजनस्य आश्वासनवचनेन वञ्चिता विप्रलब्धा) अहम् इह (अधुना) कं शरणं यामि ॥१॥ अनुवाद—मेरा अमल रूप-यौवन व्यर्थ ही है, क्योंकि संकेत-कालमें हरि वनमें नहीं आये। सखियोंसे वञ्चित अब मैं किसकी शरणमें जाऊँ? पद्यानुवाद— बीत रहा संकेत-समय पर वे न कुंजमें आये विफल रूप यौवन नव मेरा जो न उन्हें यह भाये। मैं भोली ठग गयी सखीके आश्वासन वचनों में अब किसकी शरणोंमें जाऊँ भूली-सी सपनों में॥ बालबोधिनी—विरह-वेदनाकी अतिशय तीव्रताका अनुभव करती हुई श्रीराधाको अत्यन्त सन्ताप हो रहा है—सखी! तुमने तो कहा था मैं उन्हें अभी लेकर आती हूँ, तुम यहीं रहो, पर तुमने भी मेरी प्रताड़ना कर दी। चन्द्रोदयसे पहले यहाँ संकेत कुंजमें आनेकी बात थी, अब तो चन्द्रमा गगनमें अधिकाधिक उठता जा रहा है, तुम्हारे झूठे आश्वासनोंने मुझे ठग लिया है। मेरा यह निर्मल-अनवेद्य रूप-यौवन व्यर्थ ही प्रतीत होता है। यदि ये सार्थक होते तो वे अवश्य यहाँ उपस्थित होते। 'अहह' पदसे श्रीराधाका गहन कष्ट सूचित होता है। हे शब्दका प्रयोग सम्बोधनपरक है। यदनुगमनाय निशि गहनमपि शीलितं। तेन मम हृदयमिदमसमशर-कीलितम्— यामि हे! कमिह... ॥२॥ अन्वय—यदनुगमनाय (यस्य कृष्णस्य अनुगमनाय निरन्तरं सङ्गमाय) निशि (रात्रौ) [गृहवासं विहाय] गहनमपि (निविड़मपि)