गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २२७ इत्यर्थः] वनमपि न ययौ [कुतोऽत्रागमनमित्यर्थः] इदं मम रूपयौवनं विमलमपि (अनवद्यमपि) [तेन बिना] विफलम् (व्यर्थम्); [अतएव] हे [नाथ] सखीगण-वचन-वञ्चिता (कृष्ण इह अचिरेणैव स्वयमायास्यतीति सखीजनस्य आश्वासनवचनेन वञ्चिता विप्रलब्धा) अहम् इह (अधुना) कं शरणं यामि ॥१॥ अनुवाद—मेरा अमल रूप-यौवन व्यर्थ ही है, क्योंकि संकेत-कालमें हरि वनमें नहीं आये। सखियोंसे वञ्चित अब मैं किसकी शरणमें जाऊँ? पद्यानुवाद— बीत रहा संकेत-समय पर वे न कुंजमें आये विफल रूप यौवन नव मेरा जो न उन्हें यह भाये। मैं भोली ठग गयी सखीके आश्वासन वचनों में अब किसकी शरणोंमें जाऊँ भूली-सी सपनों में॥ बालबोधिनी—विरह-वेदनाकी अतिशय तीव्रताका अनुभव करती हुई श्रीराधाको अत्यन्त सन्ताप हो रहा है—सखी! तुमने तो कहा था मैं उन्हें अभी लेकर आती हूँ, तुम यहीं रहो, पर तुमने भी मेरी प्रताड़ना कर दी। चन्द्रोदयसे पहले यहाँ संकेत कुंजमें आनेकी बात थी, अब तो चन्द्रमा गगनमें अधिकाधिक उठता जा रहा है, तुम्हारे झूठे आश्वासनोंने मुझे ठग लिया है। मेरा यह निर्मल-अनवेद्य रूप-यौवन व्यर्थ ही प्रतीत होता है। यदि ये सार्थक होते तो वे अवश्य यहाँ उपस्थित होते। 'अहह' पदसे श्रीराधाका गहन कष्ट सूचित होता है। हे शब्दका प्रयोग सम्बोधनपरक है। यदनुगमनाय निशि गहनमपि शीलितं। तेन मम हृदयमिदमसमशर-कीलितम्— यामि हे! कमिह... ॥२॥ अन्वय—यदनुगमनाय (यस्य कृष्णस्य अनुगमनाय निरन्तरं सङ्गमाय) निशि (रात्रौ) [गृहवासं विहाय] गहनमपि (निविड़मपि)
२२८ श्रीगीतगोविन्दम् वनं शीलितं (सेवितम्), तेन (कृष्णेन हेतुना) इदं मम हृदयम् असमशर-कीलितं (असम-शरेण पञ्चबाणेन कामेन कीलितं नितरां विद्धमित्यर्थः) [हे नाथ सखीजन-वञ्चिता इह कं शरणं यामीति सर्वत्र योजनीयम्] ॥२॥ अनुवाद—हाय! जिनका अनुसरण करनेके लिए मैं इतनी गहन निशामें इस बीहड़ वनमें भी आ गयी और वही मेरे हृदयको कामबाणोंसे बेध कर रहा है। हाय! मैं किसकी शरणमें जाऊँ? पद्यानुवाद— जिसकी मिलन-चाह ले इतनी गहन निशामें आयी। वही हृदयको मदन-शरोंसे छेद रहा री मायी ॥ बालबोधिनी—श्रीराधा कहती हैं कि जिनके साथ मिलनके लिए मैं एकान्त निर्जन काननमें आयी, उसीने मेरे हृदयमें कामकी कील ठोक दी है या कामका कोई बीजमन्त्र ऐसा कीलित कर दिया है कि मैं कहींकी नहीं रही। 'अपि' से तात्पर्य है ऐसा मैंने पहले कभी नहीं किया था। मम मरणमेव वरमिति-वितथ-केतना। किमिति विषहामि विरहानलमचेतना— यामि हे! कमिह... ॥३॥ अन्वय—अति-वितथ-केतना (अतिवितथं नितान्तव्यर्थं केतनं देहः यस्याः तादृशी) [कृष्णविरहेण] अचेतना च [अहम्] इह (अधुना) किं (कथं) विरहानलं विषहामि [अतः] मरणमेव वरं (श्रेष्ठम्) ॥३॥ अनुवाद—यह शरीर धारण करना व्यर्थ है, मुझे मर जाना चाहिए। मैं अचेत हो रही हूँ, अब यह दुःसह विरहानल कैसे सहन करूँ? पद्यानुवाद— विरह-अनलमें जलूँ कहाँ तक? हुआ विधाता वाम। मरना ही अच्छा है अब तो, व्यर्थ हुई बदनाम ॥
सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २२९ बालबोधिनी—मैं भ्रष्ट हो रही हूँ, जिनके साथ संगमके लिए मैं घोर अन्धकारपूर्ण रात्रि-कालमें गम्भीर वनमें बैठी रही, विह्वल और अचेतन हो गयी, मैं उनके विरहसे कितनी अधीर हो रही हूँ, मैं कहाँ जाऊँ, मेरा तो मरना ही अच्छा है, कितना विरह ताप सहन करूँ मैं, आशाके सभी संकेत झूठे हो गये हैं। मेरा यह शरीर व्यर्थ ही है, नहीं तो हरि ऐसी उपेक्षा नहीं करते, सखीकी बातोंमें आकर मैंने यहाँ आनेका साहस कर लिया, पर मेरे सारे प्रयास व्यर्थ हैं, जीना व्यर्थ है। मामहह विधुरयति मधुर-मधु-यामिनी। कापि हरिमनुभवति कृत-सुकृत-कामिनी— यामि हे! कमिह... ॥४॥ अन्वय—अहह (खेदे मधुर-मधुयामिनी) (मधुरा मनोहारिणी मधुयामिनी वासन्ती रात्रिः) मां विधुरयति (व्याकुली करोति; या वासन्ती निशा दूरस्थमपि प्रियं सङ्गमयति, सैव सुकृताभावात् मां विधुरयतीति भावः)। कापि कृतसुकृत-कामिनी (कृतं सुकृतं यया तादृशी कामिनी भाग्यवती रमणी) हरिम् अनुभवति (तेन सह रहःकेलिसुखमनुभवतीत्यर्थः) ॥४॥ अनुवाद—ओह ! यह कैसा दुर्भाग्य है मेरा। यह सुमधुर वसन्तकी रात्रि मुझको विरह-वेदनासे अधीर कर रही है और उधर ऐसे समयमें निश्चित ही कोई कामिनी अपने पुण्यके फलस्वरूप परम सुखसे श्रीकृष्णके साथ रतिसुखका अनुभव कर रही है। पद्यानुवाद— इधर मधुर यह रात मुझे अब रह रह रुला रही है। उधर अन्य कृत सुकृत कामिनी हरिको भुला रही है॥ बालबोधिनी—अन्तर-हृदयकी विकट विरह-वेदनाको अभिव्यक्त करती हुई श्रीराधा कहती हैं—परमसुखस्वरूपा वसन्त ऋतुकी ये सरस रात्रियाँ मुझे अतिशय व्यथित कर
२३० श्रीगीतगोविन्दम् रही हैं, दूसरी ओर कोई सुकृतशालिनी किशोरी श्रीकृष्णके साथ रति-क्रीड़ाका रसास्वादन कर रही है। उस विलासिनीके प्रेमपाशमें बँधकर रमण करते हुए श्रीकृष्ण इस संकेत-भूमि पर नहीं आये। कितनी सुकृतिका अभाव है? मैं विरह-विधुरा होकर विलाप कर रही हूँ और दूसरी उनके साथ रति-सुखका अनुभव कर रही है। विश्वकोषमें विधुरका तात्पर्य 'विकलता' से है। अहह कलयामि वलयादि-मणि-भूषणम्। हरि-विरह-दहन-वहनेन बहु-दूषणम्— यामि हे! कमिह... ॥५॥ अन्वय—अहह, हरि-विरह-दहन-बहनेन (हरिविरह एव दहनो वह्निः तस्य वहनेन धारणेन) वलयादि-मणि-भूषणं (मत्परिहित-कङ्कणादि-रत्नालङ्कारः) बहुदूषणं (बहूनि दूषणानि यस्य तत् अत्यधिक-दोषावहं, विरहानलसन्धुक्षितत्वात् अतिकलेशकरमित्यर्थः) कलयामि (मन्ये) [प्रियावलोकफलोहि स्त्रीणां वेश इत्युक्तेः] ॥५॥ अनुवाद—हाय! मणिजड़ित बलयादि आभूषण समुदाय मेरे विरहानलको उद्दीपित कराकर मुझे अशेष दुःख प्रदान कर रहा है। अतः यह तो दोषयुक्त ही प्रतीत हो रहा है। पद्यानुवाद— मणि-भूषण दूषण लगते हैं, पिय बिन कुछ न सुहाता। बालबोधिनी—आह! सखि! तुमने बड़ा छल किया। मैंने पुष्पों-पल्लवों, मणियोंसे सजे इतने आभूषणोंसे शरीरको सजाया, पर सभी हरिके विरहकी आगमें अनल सदृश ही प्रतीत हो रहे हैं। मदनकी वेदनासे शरीर विरहाग्निमें तप्त हो रहा है। अब ये आभूषण नहीं रहे, अभिशाप हो गये हैं, क्योंकि प्रियके अवलोकनका फल ही रमणियोंका सौन्दर्य
सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २३१ एवं परिधान है अथवा अलङ्कारका प्रियत्व तो तभी अनुभव होता है, जब कोई उनको प्रेमपूर्वक देखनेवाला हो। अतः इनसे प्रियत्वकी प्रतीति नहीं, दोषकी प्रतीति होती है। कुसुम-सुकुमार-तनुमतनु-शर लीलया। स्रगपि हृदि हन्ति मामतिविषम-शीलया— यामि हे ! कमिह... ॥६॥ अन्वय—[का कथान्यभूषणानाम्]—[तत्प्रीतये] हृदि (हृदये) [निहिता] स्रक् अपि (कुसुममाल्यमपि; अतिसुकोमल- सुखस्पर्शमपीति भावः) अतिविषमशीलया (अतिविषमम् अतिदारुणं शीलं स्वभावो यस्यास्तादृश्या; अन्यस्तु बाणः क्षतुमुत्पाद्य व्यथयति, कामबाणस्तु विध्यन् अन्तर्भिनत्तीति विषमशीलत्वमस्य) अतनु-शरलीलया (कामबाण-विलासेन) कुसुम-सुकुमार-तनुं (कुसुमतः अपि सुकुमारी तनुः यस्याः तादृशीं; तत्सहन-सामर्थ्यमपि नास्त्यस्या इत्यर्थः) मां हन्ति (निपीडयति) ॥६॥ अनुवाद—(दूसरे आभूषणोंकी तो बात ही क्या) मेरे वक्षःस्थलपर स्थित यह वनमाला अतिशय कोमल कुसुमसे भी सुकुमार मेरे शरीरको भी काम-शरकी भाँति विषम रूपसे आघात प्रदान कर रही है। पद्यानुवाद— कुसुम देह पर कुसुम हार था, वहन नहीं हो पाता। बालबोधिनी—हे कान्त ! दूसरे आभूषणोंकी बात क्या कहूँ, उनकी प्रसन्नताके लिए जो वनमाला हृदयपर धारण करती हूँ, वही कामदेवका अस्त्र बनकर मेरे प्राण ले लेती है, काम-बाणकी भाँति हृदयको बेधने लगती है तथा उसका प्रहार इतना विषममय और असह्य होता है कि कुसुमसे भी अतिशय सुकुमार देह उसकी विषमताको सहन नहीं कर पाती है। बाणोंसे शरीर क्षत-विक्षत होता है तो मानो
२३२ श्रीगीतगोविन्दम् सामान्य-सी पीड़ा होती है, किन्तु इन कामबाणोंके द्वारा बिंधे हृदयकी व्यथा सह्य नहीं होती। अहमिह निवासामि न गणित-वनवेतसा। स्मरति मधुसूदनो यामपि न चेतसा— यामि हे! कमिह... ॥७॥ अन्वय—मधुसूदनः चेतसा (मनसा) अपि मां न स्मरति [अहो अस्थिर-सौहृदं मधुसूदनस्य]। अहं [पुनः] [भीतिमगणय्य] न गणितवन-वेतसा (न गणितं वनवेतसम् अतीवक्लेशकरमिति भावः, यया तादृशी) इह (भयङ्करे वने) [तत्समागमाकाङ्क्षया] निवसामि [अहो मे मूढ़ता] ॥७॥ अनुवाद—मैं यहाँ भयानक वेतस वनमें भी निर्भय होकर श्रीकृष्णके लिए बैठी हूँ, किन्तु कितने आश्चर्यकी बात है कि वे मधुसूदन मुझे एक बार भी स्मरण नहीं करते। पद्यानुवाद— जिनके लिए त्याग महलोंको बैठी वेतस वनमें। क्या आ पायी सुधि भी मेरी क्षण भर उनके मनमें॥ बालबोधिनी—श्रीराधा दैन्य प्रकाश करती हुई कहती है कि श्रीमन्मधुसूदनसे मिलनेके लिए सखीकी बात मानकर मैं इस भयङ्कर वनके भीतर निर्भय होकर बैठी हूँ, परन्तु मधुसूदनको मेरी कोई चिन्ता नहीं है, उनका सुहृदय बड़ा अस्थिर है, बड़े आश्चर्यकी बात है कि इस बीहड़ वनमें जिनके लिए मैं प्रतीक्षा कर रही हूँ, वे मेरा एक बार भी स्मरण नहीं करते। हाय! हाय! यह मेरा ही दुर्भाग्य है। हरि-चरण-शरण-जयदेव-कवि-भारती। वसतु हृदि युवतिरिव कोमल-कलावती— यामि हे! कमिह... ॥८॥
सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २३३ अन्वय—कोमल-कलावती (कोमला माधुर्यगुणसम्पन्ना कलावती कवित्व-कला-शालिनी च) हरि-चरण-शरण-जयदेव- कवि-भारती (हरिचरण-मेव शरणम् आश्रयो यस्याः तथाभूता जयदेवकवेः भारती वाणी) [यूनां हृदये कोमलकलावती कोमला मृद्वङ्गी कलावती रति-कलानिपुणा] युवतिरिव [रसज्ञानां भक्तानां] हृदि (हृदये) वसतु] ॥८॥ अनुवाद—कोमल वपुवाली मनोहर लावण्यवती कला- समलंकृत युवती जैसे सुन्दर गुणोंवाले युवकोंके मनमें सदा विराजमान रहती है, वैसे ही श्रीकृष्णके चरणोंके शरणागत श्रीजयदेव कविद्वारा विरचित यह सुललित गीति भक्तजनोंके मनमें सदा विराजमान हो। पद्यानुवाद— मंजुल वंजुल लता-कुंजमें मुझे बुलाये एकाकी। कहाँ विलसने लगे छली वे, झलकी किसकी झाँकी ॥ बालबोधिनी—जयदेव कवि कहते हैं कि उनके रक्षक एकमात्र श्रीकृष्णके चरण ही हैं। उनसे अलग उनका और कोई रक्षक नहीं है। जयदेव रचित कविता कोमल वर्णमयी और काव्य-सौष्ठवकी कलाओंसे समलंकृत है—यह कविता भक्तोंके हृदयमें उसी प्रकार स्थान प्राप्त करे, जिस प्रकार कोमल वपुवाली तथा शृङ्गार आदि रसवर्द्धिनी छह कलाओंसे विशिष्ट कोई सुन्दरी अपने नायकके हृदयमें विराजती है। यथा लावण्य विभूषिता कोई नायिका अपने नायकके मनको अत्यधिक आनन्द प्रदान किया करती है, उसी प्रकार यह काव्य भक्तोंके हृदयको भी आनन्दित करे—यह कविकी कामना है। तत्किं कामपि कामिनीमभिसृतः किं वा कलाकेलिभि- र्बद्धो बन्धुभिरन्धकारिणि वनाभ्यर्णे किमुद्भ्राम्यति। कान्त! क्लान्तमना मनागपि पथि प्रस्थातुमेवाक्षमः संकेतीकृत-मञ्जु-वञ्जुल-लता-कुञ्जेऽपि यन्नागतः ॥१॥
२३४ श्रीगीतगोविन्दम् अन्वय—[कृष्णागमन-विलम्बे तर्कयति]—कान्तः (कृष्णः) सङ्केतीकृत-मञ्जु-वञ्जुल-लता-कुञ्जेऽपि (सङ्केतीकृतं मञ्जु मनोज्ञं यत् वञ्जुल-लतानां वेतसलतानां कुञ्जं तस्मिन्नपि) यत् (यस्मात्) न आगतः तत् (तस्मात्) किं कामपि (अभिनव-प्रेमवन्धुरां) कामिनीम् अभिसृतः (उपगतः)? [मय्येव दृढानुरागोऽसौ कथमन्यामभिसारिष्यतीति वितर्कान्तरमाह]—किंवा वन्धुभिः (मित्रैः) कलाकेलिभिः (कलानां गीतादीनां केलिभिः क्रीड़ाकौशलैः) बद्धः (आसक्तीकृतः); [कृताभिसारसमये अस्मितदपि न सम्भवतीति विचिन्त्य वितर्कान्तरमाह]—[मामभिसरन् तरूणां नीरन्ध्रतया] अन्धकारिणि वनाभ्यर्णे (वनप्रदेशे) किम् उद्भ्राम्यति [पन्थानमविदित्वेति भावः]; [चतुरशिरोमणेः सहस्रशोऽनुभूतस्थले भ्रमः कथं स्यादिति विचिन्त्य निश्चिनोति]— क्लान्तमनाः (मद्विश्लेषदुःखेन चन्द्रोदयानन्तरं तस्याः का दशा भवेदिति चिन्तया च क्लान्तम् उपतप्तं मनो यस्य तादृशः) [सन्] पथि मनागपि (अल्पमपि) प्रस्थातुम् अक्षम एव॥१॥ अनुवाद—संकेत स्थल रूपमें निर्दिष्ट मनोहर लताकुञ्जमें मेरे प्राणवल्लभ श्रीकृष्ण क्यों नहीं आये? इसका क्या रहस्य है? क्या वे किसी दूसरी कामिनीके साथ अभिसार करने चले गये? क्या अपने सखाओंके साथ क्रीड़ा-आमोदमें प्रमत्त हो निर्दिष्ट समयका उन्होंने अतिक्रमण कर दिया है? क्या सघन वृक्षोंकी छायामें घोर अन्धकारके कारण संकेत-स्थली न मिलने पर इधर-उधर भटक रहे हैं? क्या मेरे विरहमें अत्यन्त क्लान्त हो एक कदम भी चल पानेमें असमर्थ हो गये हैं? पद्यानुवाद— अथवा आये यहीं हाय पर, छाई अति अँधियारी, यहाँ-वहाँ क्या मुझे खोजते, भटक रहे वनवारी? श्रीहरि-चरण-शरण 'कवि जय'की प्रमदा सम मृदुवाणी भक्तोंके भावुक हृदयोंमें गूँज उठे कल्याणी॥
सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २३५ बालबोधिनी-श्रीकृष्णके संकेत स्थल पर न आनेके कारण विरहिणी राधिका मन-ही-मन कितने प्रकारके सन्देह-संशय कर रही हैं- उनके न आनेका कारण क्या हो सकता है? मनः कल्पित सन्देहोंको प्रस्तुत करती हुई श्रीराधा कहती है, यह मनोहर वेतस-लतागृह हम दोनोंके मिलनका संकेत-स्थान था, फिर उन्हें क्या हो गया? वे क्यों नहीं आये? क्या वे दूसरी नायिकाके साथ अभिसार करने चले गये? पर मेरे प्रति उनका अनुराग कम कैसे हो सकता है? मुझे यहाँ ऐसे ही छोड़कर वे अन्यत्र विहार कैसे कर सकते हैं? क्या केलिपरायण और कलापरायण उनके बान्धवोंने उन्हें यहाँ आनेसे रोककर क्रीड़ावनमें ही रख लिया? यह भी संभव नहीं है, क्योंकि वे अभिसारके समयको किस प्रकार भूल सकते हैं? ऐसा लगता है वे चतुर चूड़ामणि अन्धकारकी अधिकताके कारण मुझको प्राप्त न कर सकनेके कारण मुझे इधर-उधर ढूँढ़ रहे हों, पर वे तो इस वनमें अभिसारके लिए कितनी ही बार आये होंगे! वे परिचित पथ कैसे भूल सकते हैं? यह भी संभव नहीं है। तो क्या वे मुझसे विच्छिन्न होनेसे क्लान्त होकर चलनेमें ही असमर्थ हो गये हैं? अथवा चन्द्रोदयके पश्चात् श्रीराधाकी दशा कैसी होगी, यह सोचकर विच्छेद दुःखसे कातर होकर यहाँ नहीं आये? प्रस्तुत पदमें शार्दूलविक्रीड़ित छन्द तथा संशय नामक अलङ्कार है। अथागतां माधवमन्तरेण सखीमियं वीक्ष्य विषादमूकाम्। विशङ्कमना रमितं कयापि जनार्दनं दृष्टवदेतदाह ॥२॥ इति त्रयोदशः सन्दर्भः। अन्वय-[चन्द्रोदयेन श्रीकृष्णागमनप्रतिवन्धे सति तं बिना सख्या आगमने तस्या विप्रलब्धावस्थां वर्णयितुमाह]- [विप्रलब्धालक्षणं यथा- 'प्रियःकृत्वापि सङ्केतं यस्या नायाति
२३६ श्रीगीतगोविन्दम् सन्निधिम्। प्रिलब्धेति सा ज्ञेया नितान्तमवमानिता।।” इति साहित्यदर्पणे।।] अथ (वितर्कानन्तरं) माधवम् अन्तरेण (हरिं बिना) आगतां [अतः] विषादमुकां (दुःखातिशयेन वक्तुमशक्ताम् अकृत-कार्यत्वादित्यर्थः) सखीं वीक्ष्य इयं (राधा) जनार्दनं कयापि रमितं दृष्टवत् (दृष्टमिव) विशङ्कमाना [सती] एतत् (वक्ष्यमाणं वचनम्) आह॥२॥ अनुवाद—माधवके बिना सखीको आया देख विषण्ण चित्तसे मौन धारणकर श्रीराधा आशंकित होकर सोचने लगीं—जनार्दन किसी और कामिनीके साथ रमण कर रहे हैं क्या? बालबोधिनी—चन्द्रोदय हो जानेके कारण श्रीराधा, श्रीकृष्णके संकेत-स्थल पर न आनेके कितने ही कारणोंका अनुमान कर रही थीं और सखीको श्रीकृष्णके बिना लौटती देखकर वह विप्रलब्धा स्थितिकी पराकाष्ठाको प्राप्त हो गयीं। दारुण वेदनाके कारण कुछ भी बोलनेमें असमर्थ हो गयीं। सखी भी विषण्ण अवस्थाको प्राप्त कर अवाक् थी। सखीको मौन देखकर यह अनुमान लगा लिया कि ब्रजराजनन्दन किसी अन्य नायिकाके साथ रमण करते हुए देखनेके कारण ही यह उदास एवं मौन हैं, इसलिए कुछ बोल नहीं रही हैं। श्रीराधा विलाप कर उठीं—जनार्दन हैं न—लोगोंको पीड़ा देना ही तो उनका काम है—अतः मुझे भी पीड़ित कर रहे हैं। विप्रलब्धा नायिका—निरन्तर अभिवर्द्धित अनुरागके कारण नायिका दूतीको भेजकर पहले किसी संकेत-स्थल पर पहुँच जाती है, परन्तु दैवयोगसे निर्दिष्ट समय बीत जानेपर भी नायक वहाँ उपस्थित न हो तो वह नायिका विप्रलब्धा कहलाती है। प्रस्तुत श्लोकमें उपेन्द्रवज्रा छन्द है।
सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २३७ अथ चतुर्दशः सन्दर्भः। गीतम् ॥१४॥ वसन्तरागयतितालाभ्यां गीयते। अनुवाद—यह चौदहवाँ प्रबन्ध वसन्त राग तथा यति तालके द्वारा गाया जाता है। समर-समरोचित-विरचित-वेशा, दलित-कुसुम-दर विलुलित केशा। कापि मधुरिपुणा विलसति युवतिरधिकगुणा ॥१॥ध्रुवम् अन्वय—हे सखि स्मर-समरोचित-विरचित-वेशा (स्मरसमरस्य उचितो विरचितो वेशो यया सा) [ततश्च रणावेशेन] दलित- कुसुम-दर-विलुलित-केशा (दलितानि विमर्दितानि कुसुमानि येभ्यः तादृशाः दरविलुलिताः ईषद्विस्रस्ताः केशा यस्याः तादृशी) कापि अधिकगुणा (मत्तेऽपि अधिकगुणवती) युवतिः मधुरिपुणा सह विलसति ॥१॥ अनुवाद—सखि! मदन-समरके योग्य वेशभूषाका परिधान किये हुए और अनङ्ग-रसके आवेशमें कबरी-बन्धन आलुलायित होने (बिखर जाने) के कारण कुसुमसमूह विगलित होनेसे विमर्दित केशोंवाली मुझसे भी अधिक गुणशालिनी कोई युवती मधुरिपुके साथ सुखपूर्वक विलास कर रही है। पद्यानुवाद— स्मर-समरोचित-विरचित-वेशा। गलित-कुसुम-वर-विलुलित-केशा ॥ शोभित है युवती री कोई। हरि से विलास रही जो खोई ॥ बालबोधिनी—आशंकिता श्रीराधा सखीसे कहती हैं—हे सखि ! मुझसे भी अधिक कोई सुन्दर रमणी काम-संग्रामके अनुकूल वेश धारणकर मधुरिपुके साथ विलास कर रही है।
२३८ श्रीगीतगोविन्दम् रतिक्रीड़ामें उसके केशपाश ढीले होकर इधर-उधर लहरा रहे हैं, उसमेंसे ग्रंथित पुष्प भी झर गये हैं। मधुरिपु—श्रीकृष्ण माधुर्यके शत्रु हैं, उनको माधुर्यका भान ही नहीं है। इसलिए वे मेरी उपेक्षा करके किसी दूसरी युवतीके साथ रतिविलासमें लिप्त हैं। युवतिरधिकगुणा—वह ब्रजरमणी मुझसे भी अधिक गुणशालिनी है, पर यह तो संभव ही नहीं है। अधिक गुणोंका व्यंगार्थ है—कम गुणोंवाली युवती रमण कर रही है, यह बड़े आश्चर्यकी बात है। इससे विपरीत रति सूचित होती है। विपरीत रतिमें युवतीका ही रतिकर्तृत्व रहता है। स्मरसमर—रतिकेलिको स्मर-समर कहा गया है। रतिक्रीड़ामें रति-विमर्दन आदि क्रिया होती है, जिससे नायिकाका कबरी बन्धन खुल जाता है, उसमें सन्निहित पुष्प झर जाते हैं, विश्रृंखलित हो जाते हैं। हरि-परिरम्भण-वलित-विकारा। कुच-कलशोपरि तरलित-हारा ॥ कापि मधुरिपुणा... ॥२ ॥ अन्वय—[अतःपरं षड्भिः तामेव विशिनष्टि] हरि-परिरम्भण- वलितविकारा (हरेः परिरम्भणेन आलिङ्गनेन वलितः रचितः विकारः रोमाञ्चादि-कामज-विकृतिर्यस्याः तादृशी) [तथा] कुच-कलसोपरि (स्तनकुम्भयोरुपरि) तरलित-हारा (तरलितः आन्दोलितः हारो यस्यास्तादृशी) [कापि अधिकगुणा इत्यादि प्रत्येकेन योजनीयम्] ॥२ ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णका प्रगाढ़ रूपसे आलिङ्गन करनेपर मदन-विकारसे विमोहित उसमें रोमांच आदि विकार उत्पन्न हो गये होंगे और उसके कुचकलशों पर हार दोलायमान हो रहा होगा। पद्यानुवाद— हरि-परिरंभण-वलित-विकारा। कुच-कलशोपरि-तरलित-धारा ॥
सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २३९ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई॥ बालबोधिनी—श्रीराधा आनुमानिक तौर पर उस रमणीकी चेष्टाओंको चित्रित करते हुए कहती हैं कि श्रीकृष्णके द्वारा आलिङ्गित होनेसे उस युवतीमें कामोचित रोमांचादि मदन-विकार उद्भूत हो गये होंगे। कलश सरीखे उन्नत स्तनोंपर हार दोलायमान हो रहा होगा। हारकी चञ्चलता रतिकालमें युवती द्वारा रतिकर्तृत्व अथवा विपरीत रतिमें ही संभव है। विचलदल-कललितानन-चन्द्रा। तदधर-पान रभस-कृत-तन्द्रा ॥ कापि मधुरिपुणा... ॥३ ॥ अन्वय-विचलदलक-ललितानन-चन्द्रा (विचलद्भिः अलकैः चूर्णकुन्तलैः ललितः सुन्दरः आननमेव चन्द्रो यस्यास्तादृशी) [तथा] तदधर-पान-रभस-कृत-तन्द्रा (तस्य कृष्णस्य अधरपान- रसभेन अधरपानावेशेन कृता तन्द्रा आनन्द-निमीलनं यस्याः तादृशी) ॥३॥ अनुवाद—उसका मुखचन्द्र घुँघराली अलकावलियोंसे सुललित हो रहा होगा और श्रीकृष्णकी अधर-सुधाका पान करनेकी अतिशय लालसाके कारण नयनयुगल आनन्दपूर्वक निमीलित हो रहे होंगे। पद्यानुवाद- अलक-ललित मृदु आनन चन्द्रा। अधर-पान-मुद अधिकृत तन्द्रा ॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई ॥ बालबोधिनी—उस रमणीका मुखचन्द्र चंचल अलकावलियोंके कारण और भी अधिक शोभाशाली दीखता होगा। रति कालमें श्रीकृष्णकी अधर-सुधाका पान कर रतिजन्य आनन्दमें
२४० श्रीगीतगोविन्दम् निमग्न आँखें बन्द करके वह कपट निद्राका मिथ्या अभिनय कर रही होगी। चञ्चल-कुण्डल-ललित-कपोला। मुखरित-रसन-जघन-गति-लोला॥ कापि मधुरिपुणा...॥४॥ अन्वय—चञ्चल-कुण्डल-ललित-कपोला (चञ्चलाभ्यां तदधर-पानावेषादिति भावः कुण्डलाभ्यां ललितौ परममनोहरौ कपोलौ यस्याः सा) [तथा] मुखरित-रसन-जघन-गति-लोला (मुखरिता शब्दायमाना रसना काञ्ची यस्मिन् तादृशस्य जघनस्य गतिः तया लोला चपला)॥४॥ अनुवाद—कुण्डल-युगल चञ्चल होनेपर उसके कपोल- तलकी शोभा और भी बढ़ रही होगी, कटितट पर विराजमान मणिमय मेखलाकी क्षुद्र घण्टिकाएँ उसके जघन स्थल पर आन्दोलित होनेके कारण सुमधुररूपसे मुखरित हो रही होंगी। पद्यानुवाद— चंचल कुंडल ललित कपोला। मुखरित रसन जघन गति लोला॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई॥ बालबोधिनी—रतिक्रीड़ामें संलग्न उसके कुण्डल-युगलोंका आन्दोलित होना स्वाभाविक ही है—इससे उसके कपोलोंकी मनोहरता और भी बढ़ गयी होगी, मेखलामें संलग्न घुँघरू बार-बार बजते होंगे, जाँघोंका सदा संचलन होनेके कारण वह अति चंचल प्रतीत होती होगी। दयित-विलोकित-लज्जित-हसिता। बहुविध-कूजित-रति-रस रसिता— कापि मधुरिपुणा...॥५॥
सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २४१ अन्वय—दयित-विलोकित-लज्जित-हसिता (दयितस्य प्रियस्य विलोकितेन वीक्षणेन-लज्जितं लज्जायुक्तं हसितं हास्यं यस्याः तथोक्ता) [तथा] बहुविध कूजित-रति-रस-रसिता (बहुविधं पारावतादिवत् कूजितं यस्यां तादृशी या रतिः तस्या रसेन आस्वादेन रसिता रसपूर्णा) ॥५॥ अनुवाद—दयित श्रीकृष्णके द्वारा अवलोकित होने पर वह लज्जित होती होगी, हँसती होगी, रतिकालमें रतिसरसिता होकर कोकिल कलहंसादिके समान मदनविकार सूचक 'सीत्कार' शब्द करती होगी। पद्यानुवाद— हरि-आलोकित-लज्जित-हँसिता। बहु विधि कूजित रति-रस-रसिता ॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई ॥ बालबोधिनी—प्रियतम श्रीकृष्ण जब तृप्त होकर उसकी ओर देखते होंगे, तब वह लज्जित होकर गर्दन झुका लेती होगी, हँसती होगी, रतिरसातिरेकके कारण वह पक्षियों—कोकिल, कलहंसके समान विविध प्रकारकी मधुर सीत्कार ध्वनि करती होगी। विपुल-पुलक-पृथु-वेपथु-भङ्गा। श्वसित-निमीलित-विकसदनङ्गा— कापि मधुरिपुणा... ॥६॥ अन्वय—विपुल-पुलक-पृथु-वेपथु-भङ्गा (विपुलाः पुलकाः पृथुः महान् वेपथुः कम्पश्च तेषां भङ्गाः तरङ्गाः यस्याः तादृशी) [तथा] श्वसित-निमीलित-विकसदनङ्गा (श्वसितेन निमीलितेन च विकसन् आविर्भवन् अनङ्गः मदनः यस्याः तादृशी) ॥६॥ अनुवाद—अनंग-रससे पुलकित हो उसके रोमांच एवं
२४२ श्रीगीतगोविन्दम् कम्प ही उसके तरंगके समान हैं। सघन निःश्वास एवं नेत्र-निमीलनके द्वारा वह मदन-आवेश प्रकाशित करती होगी। पद्यानुवाद— विपुल पुलक पृथु वेपथु भंगा। श्वसित निमीलित उदित अनंगा ॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई ॥ बालबोधिनी—रतिकालमें पुलकावलियोंसे, कम्पनसे, स्वरभंग होनेसे वह लम्बी-लम्बी श्वासोच्छ्वास करती होगी, आनन्द प्राप्ति होने पर आँखें मूँद लेती होगी, जिससे उसका काम विकसित होता होगा। वेपथुभङ्ग—प्रस्तुत श्लोकमें रोमाञ्च तथा कम्पको तरंग सदृश इसलिए बताया है कि जिस प्रकार जलाशयमें एकके बाद दूसरी तरंग उत्पन्न होती है, उसी प्रकार उसके शरीरमें भी रोमांच तथा कम्प उत्तरोत्तर उत्पन्न होते होंगे।
श्रमजल-कण-भर-सुभग-शरीरा। परिपतितोरसि रति रण-धीरा ॥ कापि मधुरिपुणा... ॥७॥ अन्वय—श्रम-जल-कण-भर-सुभग-शरीरा (श्रमजलकणभरेण सुरतश्रमजात-स्वेदवारिबिन्दुसमूहेन सुभगं सुन्दरं शरीरं यस्याः सा) [तथा] रतिरणधीरा (सुरतसंग्रामे धीरा पण्डिता) [निःसहता- विस्मृत-स्वाङ्गानुसन्धानतया] उरसि (कान्तस्य वक्षसि) परिपतिता ॥७॥ अनुवाद—रतिरसनिपुण वह कामिनी सुरत-क्रीड़ा जन्य पसीनेकी बूँदोंसे और भी सुन्दर लगती होगी, रतिक्रियामें धैर्य धारण करनेवाली वह रतिश्रमश्रान्ता श्रीकृष्णके वक्षःस्थल पर निपतिता होकर कितनी शोभा पा रही होगी।
सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २४३ पद्यानुवाद- श्रमजल कण भर सुभग शरीरा। हरि-उर पतित सुरति रणधीरा॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई॥ बालबोधिनी-अनंग आवेशमें वह पूर्ण रूपसे थक गयी होगी। सुरतायासजन्य श्रमबिन्दुओंसे उसका मुखारविन्द कैसा चमकता होगा? स्वयंको विस्मृत होकर सुरतक्रियारूपी रणमें दक्ष वह श्रीकृष्णके वक्षःस्थलपर गिर गयी होगी, उसकी शोभा कैसी अद्भुत हो रही होगी। श्रीजयदेव-भणित-हरि-रमितम् । कलि-कलुष जनयतु परिशमितम्- कापि मधुरिपुणा... ॥८॥ अन्वय-श्रीजयदेव-भणित-हरि-रमितं (श्रीजयदेवेन भणितं यत् हरिरमितं हरेः रमणं) [भक्तानां] कलिकलुषं (कामादिकं) परिशमितं जनयतु ॥८॥ अनुवाद-कवि जयदेव द्वारा वर्णित यह हरि-रमण-विलास रूप रतिक्रीड़ा सबका कलि-कल्मष अर्थात् कामवासनाको शान्त करे। पद्यानुवाद- श्रीजयदेव कथित यह लीला। कलि-मल सहज विनाशनशीला ॥ शोभित है युवती री कोई। हरिसे विलस रही जो खोई ॥ बालबोधिनी-गीतगोविन्दके इस चौदहवें प्रबन्धका नाम हरिरमितचम्पकशेखर है। इस प्रबन्धमें विपरीत रतिका वर्णन है। रति-व्यापारका यह वर्णन अति पवित्र है। यह पाठकों तथा श्रोताओंके कलिदोषजन्य काम-विकारका प्रक्षालन करे।
२४४ श्रीगीतगोविन्दम् विरह-पाण्डु-मुरारि-मुखाम्बुजद्युतिरयं तिरयन्नपि वेदनाम्। विधुरतीव तनोति मनोभुवः सुहृदये हृदये मदनव्यथाम्॥ इति चतुर्दशः सन्दर्भः। अन्वय—[अथ चन्द्रं पश्यन्ती तं श्रीकृष्णमुखत्वेन उद्भाव्य तत्र अन्यया सह वर्त्तमानस्यापि मद्विरहेण पाण्डुत्वस्फुत्त्या स्वस्मिन् तस्य अतिप्रणयितां स्मरन्ती चन्द्रमाक्षिपति]—अये (खेदे) मनोभुवः (कामस्य) सुहृत् (मित्रभूतः) विरहपाण्डु-मुरारि- मुखाम्बुजद्युतिः (विरहेण मम विच्छेदेन पाण्डु यत् मुरारेः कृष्णस्य मुखाम्बुजं तस्य द्युतिरिव द्युतिर्यस्य तथाभूतः) [अतएव] वेदनां (सन्तप्तानां मनोव्यथां) तिरयन्नपि (आच्छादयन् निराकुर्वन्नपीत्यर्थः, चन्द्रदर्शनेन श्रीकृष्णमुखदर्शनजनितानन्दलाभादिति भावः) अयं विधुः (चन्द्रः) हृदये अतीव मदनव्यथां (कृष्णस्य अदर्शन-जनितामिति भावः) तनोति (विस्तारयति) [मदन-सुहृत्त्वेन तन्मुखस्मारकतया चन्द्रो मां व्यथयतीत्यभिप्रायः] ॥१॥ अनुवाद—प्रिय सखि! मेरे विरहमें पाण्डुवर्ण हुए श्रीमुरारीके मुखकमलकी कान्तिके समान धूसरित यह चन्द्रमा मेरी मनोव्यथाको तिरोहित कर कामदेवके सुहृद्भूत मेरे हृदयमें मदन-सन्तापकी अभिवृद्धि कर रहा है। बालबोधिनी—श्रीराधाने विलाप करते हुए सारी रात बितायी। जब चन्द्रमाको अस्ताचलकी ओर जाते देखा, तब अपने प्रति श्रीकृष्णके पूर्वरागका स्मरण कर अपनी प्रिय सखीसे कहने लगी—अरे सखि! कितने कष्टकी बात है। यह जो चन्द्रमा है, सन्तप्त व्यक्तियोंकी विरह-व्यथाको और भी बढ़ा रहा है। अब यह अस्तमित हो रहा है, जिससे मेरा मदनताप तिरोहित हो रहा है। इसके पाण्डुवर्णको देखकर मुझे श्रीहरिके मुखकमलका स्मरण हो रहा है—मेरे विरहमें वे कैसे निष्प्राण हो गये होंगे? अन्य प्रकारसे अनुमान करती हुई कहती हैं कि श्रीहरि मेरा परित्याग कर किसी दूसरी रमणीके साथ रमण कर रहे हैं, इसलिए उनकी ढलते चन्द्रमा जैसी कान्ति हो गयी है, यही कारण है कि हृदयमें सन्ताप और अधिक गहरा गया है।
सप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २४५ पञ्चदशः सन्दर्भः। गीतम् ॥१५ ॥ गुर्जरीरागैकतालीतालेन गीयते। अनुवाद—गीत-गोविन्द काव्यका यह पन्द्रहवाँ प्रबन्ध गुर्जरी राग तथा एकताली तालसे गाया जाता है। इस गीतिमें श्रीकृष्णके साथ विलास करनेवाली रमणीको स्वाधीन-भर्त्तृकाके रूपमें दिखाया गया है, जो यमुना-पुलिनमें श्रीकृष्णके साथ विलास-परायणा है। समुदित-मदने रमणी-वदने चुम्बन-वलिताधरे। मृगमदतिलकं लिखति सपुलकं मृगमिव रजनीकरे॥ रमते यमुना-पुलिन-वने विजयी मुरारिरिधुना ॥१ ॥ध्रुवम् अन्वय—[पुनस्तस्या एव स्वाधीन-भर्त्तृकत्वं सूचयन् तल्लीलाविशेषमाह] —अधुना (इदानीं) विजयी (जयशीलः मण्डनादि-कौशलेन सर्वातिशायी) मुरारिः (श्रीहरिः) यमुनापुलिनवने (यमुनायाः पुलिनवर्त्तिनि कानने) [तया सह] रमते (क्रीड़ति); [तथाच] समुदितमदने (समुदितः सम्यक् वृद्धिंगतः मदनः यस्मात् तस्मिन् कामोद्दीपके इत्यर्थः; चन्द्रपक्षेऽपि स एवार्थः) चुम्बन-वलिताधरे (वदनपक्षे तिलकं लिखित्वा साध्विदं वदनमित्युक्त्वा चुम्बनाय वलिता विन्यस्तः अधरो यत्र, चन्द्रपक्षे चुम्बनेन वलितो युक्तोऽधरः यस्मात् इत्यर्थः) रमणी-वदने (तस्या एव कामिन्याः वदने) रजनीकरे (चन्द्रे) मृगमिव सपुलकं (सरोमाञ्चं स्पर्शेन जातरोमाञ्चं यथास्यात् तथा) मृगमदतिलकं (मृगमदस्य कस्तूरिकायाः तिलकं) लिखति (ददाति) ॥१ ॥ अनुवाद—रतिरणमें विजयी मधुरिपु यमुना-पुलिनके वनमें प्रियाके साथ रमण कर रहे हैं, पुलकावलियोंसे पूर्ण कामकी उद्दीपन-स्वरूपा उस रमणीके वदनमें चन्द्रमण्डलके ऊपर मृगलाञ्छनकी भाँति कस्तूरी तिलककी रचना कर रहे हैं एवं रोमाञ्चित हो उसका चुम्बन कर रहे हैं।
२४६ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— यमुन-पुलिनके सघन कुंजमें रमते आज मुरारी। प्रियकी अमर सुहागिनी होकर जीती बाजी हारी॥ रचते मृगमद तिलक पुलक कर मदन-मुदित मुख उसके। चुम्बन वलित अधर लगते हैं, मधुर रसातुर जिसके॥ बालबोधिनी—श्रीराधा अपनी कल्पनाओंके वितानमें प्रलाप करती हुई कहती हैं—(विरहमें भाव-नेत्रों द्वारा अपनी पूर्व लीलाका स्मरण कर उसीका वर्णन करती हैं) इस कामसंग्राममें मधुरिपु मुझे पराभूतकर इस समय निकुंजमें विजय-उत्सव मना रहे हैं। श्रीराधा उस काल्पनिक रमणीका स्वरूप बताते हुए कहती हैं कि यमुनापुलिनके वनमें श्रीकृष्ण मण्डनादि कला-कौशलके द्वारा उस रमणीके साथ क्रीड़ा कर रहे हैं। उस रमणीके मुख-कमल पर मृगमदसे तिलककी रचना कर रहे हैं, जिससे वह अति पुलकित हो रही है। चुम्बनकी अभिलाषासे श्रीकृष्णने उसका मुख अपने सम्मुख कर लिया है, उसमें काम पूर्ण रूपसे उदित हो गया है, श्रीकृष्ण भी अति रोमाञ्चित हो रहे हैं, वे अपनेको संभाल नहीं पा रहे हैं, बड़ी कठिनाईसे टेढ़ा-मेढ़ा तिलक रच रहे हैं। उसकी शोभा ऐसी हो रही है, मानो चन्द्रमण्डलके ऊपर मृगलाञ्छन हो। उसके अधर एवं मुखमण्डल पर चुम्बन करनेसे श्रीकृष्णके अधर-पुटोंमें उस तिलकका चिह्न अङ्कित हो गया है। घनचय-रुचिरे रचयति चिकुरे तरलित-तरुणानने। कुरुबक-कुसुमं चपला-सुषमं रतिपति-मृग-कानने— रमते यमुना-पुलिन वने..... ॥२॥ अन्वय—[न केवलं तस्या वदने तिलकं लिखति अपितु]—घनचय-रुचिरे (मेघचयवत् रुचिरे शोभने) तरलित- तरुणानने (तरलितं, चञ्चलितं तद्गुणवर्णने मुखरीकृतमित्यर्थः