भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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षष्ठः सर्गः—धृष्ट-वैकुण्ठः २१७ श्रीजयदेव-कवेरिदमुदितम् । रसिकजनं तनुतामतिमुदितम्— नाथ हरे! सीदति... ॥८॥ अन्वय—श्रीजयदेव-कवेः उदितम् (उक्तम्) इदं [शृङ्गार-रस भावितान्तःकरणं] रसिकजनम् अतिमुदितं (अतिप्रीतं) तनुताम् (कुरुताम्)। [एतेन शृङ्गार-रसाविष्टैर्भक्तैरेव श्रीजयदेवोक्तवचन- मास्वादनीयमित्युक्तम्] ॥८॥ अनुवाद—श्रीजयदेव कवि द्वारा रचित इस गानसे रसिक जनोंके हृदयमें अतिशय हर्षका उदय हो। पद्यानुवाद— सुनते हैं जो जन इस जगमें, पाते गति कल्याणी ॥ हे हरि राधा आवास गृहे, कब तक वियोगका त्रास सहे? बालबोधिनी—कवि जयदेव कहते हैं कि सखीने जो श्रीराधाकी चेष्टा निवेदन-विषयक गीत गाया है, वह गीत शृंगार-रस द्वारा विभावित चित्तमय रसिक भक्तोंको अतिशय आनन्द प्रदान करे। प्रस्तुत गीतमें शृंगार-रसके विप्रलम्भ भाव-रसका चित्रण है। समुच्चय स्वर है। शठ नायक है। चिन्तासे व्याकुल होनेवाली वासकसज्जा नायिका है। विपुल-पुलक-पालिः स्फीत-सीत्कारमन्त- र्जनितजड़िमु काकु-व्याकुलं व्याहरन्ती। तव कितव! विधायामन्द-कन्दर्प-चिन्तां रस-जलनिधि-मग्ना ध्यानलग्ना मृगाक्षी ॥१॥ अन्वय—[स्व-सख्यार्त्ति-स्मरणेन व्याकुला सा सेर्षमिव पुनराह]—हे कितव (धूर्त्त; गतप्राणामिव तां वनमानीय निश्चिन्तोऽसीति धूर्त्ततया सम्बोधनम्) विपुल-पुलक-पालिः