भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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२१८ श्रीगीतगोविन्दम् (विपुला महती पुलकानां रोमाञ्चानां पालिः पङ्क्ति यस्याः तवाङ्ग-स्पर्श-चिन्तनेन सञ्जातरोमाञ्चा इत्यर्थः) स्फीत-शीत्कारं (स्फीतः प्रवृद्धः शीत्कारः तव दशन-क्षतादि-कल्पनेन जनित इति भावः यत्र तद् यथा स्यात् तथा) अन्तः (अभ्यन्तरे) जनित-जड़िम-काकु-व्याकुलं (जनितो योऽसौ जड़िमा जाड्यम् अस्फुटत्वमित्यर्थः तेन जाता या काकुः तया काक्वा ध्वनेर्विकारेण परिरम्भण-चुम्बनादि-स्मरण-जनितेन इति भावः व्याकुलं यथास्यात् तथा) व्याहरन्ती (ब्रुवती) सा मृगाक्षी (मृगनयना, मृगी इव सरलचित्ता इत्यभिप्रायः) अमन्द-कन्दर्प- चिन्तां (अमन्दा गाढ़ा या कन्दर्पचिन्ता कामचिन्ता तां) विधाय (परिकल्प्य) तव रस-जलधि-निमग्ना (रस-जलधौ शृङ्गार-रस-सागरे निमग्ना; एतेन आलम्बनं बिना कथं सा जीवतीति अर्थात् ज्ञेयम्; समुद्रमग्ना यथा काष्ठमवलम्बते तथा इयमपि उपायान्तराभावात् त्वयि एव) ध्यानलग्ना (ध्याने तव चिन्तने लग्ना च) [वर्त्तते इति शेषः] ॥१॥ अनुवाद—हे शठ! अति रोमांचसे युक्त, अन्तर्जनित जड़ता एवं काकुध्वनि द्वारा स्पष्ट रूपसे सीत्कार करती हुई वह मृगाक्षी राधिका आपके अतिशय तीव्र मदन-विकारके आवेशमें आपके प्रेम-रस सागरमें निमज्जित हो किसी प्रकार प्राण धारण करती है। पद्यानुवाद— विपुल पुलक तन, अतुल ललक मन, ध्यान सुरति सुख-लीना। मिलन कल्पना रस-सागरमें डूब रही मति दीना ॥ बालबोधिनी—श्रीराधाके प्रेमोन्मादका-कन्दर्पोन्मादका चित्रण करती हुई सखी कहती है—हे शठ! हे धूर्त! हे कपटी! वह