गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१६ श्रीगीतगोविन्दम् भवति विलम्बिनि विगलित-लज्जा। विलपति रोदिति वासक-सज्जा- नाथ हरे! सीदति... ॥७॥ अन्वय-[पुनस्तदपगमे] भवति (त्वयि) विलम्बिनि (कृतविलम्बे) वासकसज्जा (वासक-सज्जावस्थां प्राप्ता; सज्जित- विलासगृहा इत्यर्थः) [सा] विगलित-लज्जा (विगलिता लज्जा यस्याः तादृशी सती) विलपति रोदिति च॥७॥ अनुवाद-जब श्रीराधाको बाह्यज्ञान होता है कि आप वह नहीं हैं, आप आनेमें देर कर रहे हैं, तो वह वासकसज्जा श्रीराधा लाज खोकर विलखने लगती हैं, रोने लगती हैं। पद्यानुवाद- लख विलम्ब वह वासकसज्जा, लज्जा खो तन-छीनी। रोती और विलपती रहती, कवि 'जय'की यह वाणी॥ बालबोधिनी-श्रीराधा वासकसज्जा नायिकाके रूपमें यहाँ निरूपित हुई हैं। जब श्रीराधा यह जान लेती हैं कि मैं जिसको आलिङ्गनकर चूम रही हूँ, वह श्रीकृष्ण नहीं प्रत्युत घना अन्धकार है तो वह अपने कृत्य पर लज्जित हो रोने-कलपने लगती हैं। उनकी बेसुधी ऐसी है कि आसपासके अंधकारके प्रसारको ही वह वर्ण-भ्रान्तिसे अपना प्रियतम मान लेती हैं। और फिर मेरे प्रियतम अभी तक क्यों नहीं आये कहकर बिलखने लगती हैं। वासकसज्जा-जो नायिका संकेत-कुञ्जमें उपस्थित होकर बड़े उत्साहसे नायककी प्रतीक्षा करती हुई कुञ्जको और उसमें पुष्प-शय्याको तथा स्वयंको सजाती हैं तथा नायकके पास बारम्बार दूतीको भेजती हैं, उसे वासकसज्जा नायिका कहते हैं।