गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठः सर्गः—धृष्ट-वैकुण्ठः २१५ कथं त्वरितम् अभिसारं (सङ्केतस्थानं) न उपैति (आगच्छति) इति अनुवारं (पुनः पुनः) सखीं (मां) वदति (पृच्छति) ॥५॥ अनुवाद—बार-बार अपनी सखीसे पूछती हैं—सखि! श्रीकृष्ण अभिसरणके लिए शीघ्र ही क्यों नहीं आते? पद्यानुवाद— बार-बार कहती है 'सखि! कब आयेंगे वनमाली?' बालबोधिनी—सखी श्रीकृष्णसे कहती है—हे श्रीकृष्ण! कभी-कभी तो ऐसा होता है कि श्रीराधा बार-बार मेरे सामने आती हैं और यही पूछती हैं—श्रीहरि इस संकेत स्थान पर मुझसे मिलनेके लिए त्वरित क्यों नहीं आते? श्लिष्यति चुम्बति जलधर-कल्पम्। हरिरुपगत इति तिमिरमनल्पम्— नाथ हरे! सीदति... ॥६॥ अन्वय—[पुनश्च अत्यावेशेन] हरिः उपगतः (आयातः) इति [बुद्ध्वा] जलधर-कल्पं (मेघसदृशं) अनल्पं (प्रगाढं) तिमिरं (अन्धकारं) श्लिष्यति (आलिङ्गति) चुम्बति च ॥६॥ अनुवाद—जलधरके समान प्रतीत होनेवाले घने अन्धकारको “हरि आ गये”—ऐसा समझकर आलिङ्गन और चुम्बन करती हैं। पद्यानुवाद— जान जलद सम तम को—“तुम हो” फूल उठी मतवाली। करने लगी उसीका चुम्बन, आलिङ्गन मधुमाती ॥ बालबोधिनी—जब वह कुछ जलभरे मेघके समान स्निग्ध नीलकान्तिवाले विपुल अन्धकारको देखती हैं तो उन्हें लगता है—‘श्रीकृष्ण, तुम आ गये हो' और उस स्निग्ध अंधकारको ही अङ्कमें भर लेती हैं और चुम्बन करने लगती हैं।