गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ श्रीगीतगोविन्दम् सायंकाल पथिक वेशमें श्रीकृष्णके समीप आकर श्रीराधाके द्वारा दिये हुए इन संकेत वाक्योंको कहा—“श्रीराधाके घरमें अतिथि बनने पर उन्होंने मुझसे कहा कि हे भ्रात ! इस भाण्डीर वृक्षके तले विश्राम क्यों कर रहे हो? यहाँ तो श्रीकृष्ण (काल) सर्प रहता है। सामने ही दृष्टिगोचर होनेवाले आनन्दप्रद नन्दालयमें चले जाओ। तुम वहाँ क्यों नहीं जा रहे हो?” कहीं उनके पिता श्रीनन्द महाराज इन बातोंका भावार्थ समझ न लें, इसलिए श्रीकृष्ण उनसे गोपन करनेके लिए श्रीराधाजीके द्वारा प्रेरित दूतको जो धन्यवाद दिया है, वे वाणियाँ जययुक्त हों। बालबोधिनी—महाकवि जयदेव इस श्लोकके द्वारा आशीर्वाद देते हुए इस सर्गका उपसंहार करते हैं। सायंकालके अतिथिकी प्रशंसासे युक्त श्रीगोविन्दकी वाणियोंकी जय हो। जय-जयकारसे श्रीकृष्णकी सर्वोत्कृष्टता सिद्ध होती है। जैसे श्रीकृष्णने पथिकके मुँहसे निःसृत श्रीराधा-विषयक बातको छिपानेके लिए पथिकसे कहा—हे भाई! यहाँ काले सर्पके घरमें वटवृक्षके नीचे क्यों विलाप कर रहे हो? यहाँसे सामने ही दृष्टिगोचर होनेवाले आनन्दप्रद नन्दके घरमें चले जाओ, जो थोड़ी ही दूरपर स्थित है। जब सखीको लौटनेमें विलम्ब होता हुआ देखा तो श्रीराधाने एक दूतीको कोई बहाना बनाकर श्रीकृष्णके समीप भेजा। उस दूतीने सन्ध्याके समय पथिक वेशमें श्रीकृष्णके समीप जाकर श्रीराधाके द्वारा दिये हुए जो संकेत वाक्य कहे थे, उसको गोपन करनेके लिए श्रीकृष्णने जो प्रशंसायुक्त वाणी कही, उसकी जय हो। इति श्रीगीतगोविन्दमें धृष्ट-वैकुण्ठनामक षष्ठसर्गकी बालबोधिनी वृत्ति।