भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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२२० श्रीगीतगोविन्दम् अनुवाद—वरतनु श्रीराधा कई बार अपने अंगोंमें अलङ्कार धारण करती हैं, पत्तोंके संचरित होनेपर 'आप आ गये हैं'—इस प्रकारकी परिशङ्का करती हैं, आपके लिए मृदु शय्याकी रचना करती हैं, आपके आनेमें विलम्ब होनेपर अधिक दुःखी होती हैं। इस प्रकार अलंकरण, विकल्प, तल्परचना, प्रेमालाप, संकल्प आदि अनेक प्रकारकी लीलाओंमें आसक्त रहकर भी आपके विरहमें वह रात्रि नहीं बिता पा रही हैं। पद्यानुवाद— पत्तोंकी आहटसे आनेकी जब शङ्का होती सजा अंक मृदु शैया सत्वर उत्सुक है अति होती। कल्प, तल्प, संकल्प भावमें यद्यपि उलझी रहती तुम बिन नहीं काट पाती निशि, घड़ियाँ गिनती रहती॥ बालबोधिनी—वासकसज्जाकी मनःस्थितियोंका, आकुल क्रिया और चेष्टाओंका वर्णन करती हुई सखी श्रीकृष्णसे कहती है—श्रीराधा ध्यान आदिके द्वारा तुम्हारे साथ रमण करती हुई भी आपसे साक्षात् संयोग प्राप्त नहीं होनेके कारण अति विकल हैं। हे माधव ! मेरी वरसुन्दरी सखी आपके आगमनकी प्रत्याशामें आपको आकर्षित करनेवाले आभूषणोंसे अपने श्रीअङ्गोंको विभूषित करती हैं। तरु-पल्लव जब समीरसे आन्दोलित होकर खड़खड़ाता है, तो उसे इस बातकी शङ्का होती है कि आप आ रहे हैं। पुनः आप अवश्य आयेंगे—ऐसा सोचकरके किसलयोंसे सेजकी रचना करती है। आपमें खोयी हुई आपकी ही बाट जोहती हुई आपका ही ध्यान करती हैं। आपको वहाँ प्रस्तुत न देखकर अत्यन्त दुःखित हो जाती हैं। इस प्रकार अलङ्कार-धारण, आपके आगमनकी शङ्का, आपके निश्चित आगमनके संकल्पसे शय्या-रचना आदि अनेक प्रकारकी क्रियाओंमें तल्लीन रहकर भी आपके बिना रात्रिका अतिवाहन करनेमें नितान्त असमर्थ हैं।