गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठः सर्गः ‘धृष्ट-वैकुण्ठः’ अथ तां गन्तुमशक्तां चिरमनुरक्तां लतागृहे दृष्ट्वा। तच्चरितं गोविन्दे मनसिजमन्दे सखी प्राह ॥१॥ अन्वय—अथ (अनन्तरं) चिरम् अनुरक्तां (एकान्तानुरागिणीं) तां प्रियतम-वैकल्यश्रवणेन दशमीदशोन्मुखीमिव) राधां लतागृहे (कुञ्जे) [अपेक्षमाणां] [तथा सामर्थ्याभावात् स्वयं] गन्तुमशक्तां दृष्ट्वा [अति व्याकुला] सखी (दूती) मनसिजमन्दे (मनसिजेन प्रियार्त्तिश्रवणजात-मनोदुःखेन मन्दे निरुत्साहीकृते) गोविन्दे (कृष्णे) तच्चरितं (तस्याः राधायाः चरितं) प्राह। अनेन राधाया वासकसज्जावस्था प्रकटिता। तल्लक्षणो यथा—“कुरुते मण्डनं यातु सञ्जिते वास-वेश्मनि। सातु वासकसज्जा स्याद् विदित-प्रिय- सङ्गमा॥” इति साहित्यदर्पणे] ॥१॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके पास जानेमें असमर्थ तथा चिरकालसे उनमें अनुरक्त श्रीराधाको लतागृहमें देखकर मदन-विकारसे आर्त गोविन्दसे सखीने कहा— बालबोधिनी—श्रीराधा श्रीकृष्णके प्रति प्रबल अनुरागिणी होनेपर भी विरहवेदनाजनित क्षीणताके कारण उनके सन्निकट अभिसारके लिए नहीं जा सकीं। प्रियसखी लतागृहमें राधिकाको इस स्थितिमें रखकर श्रीकृष्णके निकट जाकर उनकी चेष्टाओंका वर्णन करती है। श्रीकृष्ण मदन-सन्तापके कारण विषण्ण चित्तसे बैठे हुए हैं। अतएव उनकी गति मन्द पड़ गयी है। श्रीराधा श्रीगोविन्दमें अनुरक्ता हैं। लतागृहसे संकेतस्थलका तात्पर्य है। प्रस्तुत श्लोकमें आर्या छन्द है।