भारतकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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१९८ श्रीगीतगोविन्दम् पद्यानुवाद— श्रीजयदेव कथित यह वाणी, हरि-राधा-रस सानी। मुदित हृदय उसका करती है, जिसने ध्वनि पहचानी॥ बालबोधिनी—इस अष्टपदीके अन्तमें कवि जयदेव कहते हैं कि हे भागवतजन ! श्रीकृष्णकी सेवामें सदैव तत्पर रहने वाले उन्होंने सुमधुर इस कथा-काव्यकी रचना की है। अतः श्रीकृष्ण उन पर सदैव प्रसन्न रहते हैं। अपनी-अपनी स्फूर्तिके कारण जो सबकी कामनाके विषय बने हुए हैं, ऐसे दयाके सिन्धु, परम रमणीय श्रीकृष्णको आप सभी प्रमुदित हृदयसे नमस्कार करें। विकिरति मुहुः कुश्वासानाशाः पुरो मुहुरीक्षते प्रविशति मुहुः कुञ्जं गुञ्जन्महुर्बहु ताम्यति। रचयति मुहुः शय्यां पर्याकुलं महुरीक्षते मदन-कदन-क्लान्तः कान्ते ! प्रियस्तव वर्तते ॥१॥ अन्वय—[अतिशीघ्रमभिसारयितुं प्रियतमदुःखं वर्णयति]—हे कान्ते (चार्वङ्गि) तव प्रियः (कृष्णः) [प्रिया मे नागता इति मत्वा] मुहुः (बारंबारं) श्वासान् (निश्वासान् विरहजनितान् आयातीति सम्भाव्य] पुरः (अग्रतः) मुहुः आशाः (दिशः) ईक्षते (आलोकयति); [कदाचित् अन्येन पथा आगतेति मत्वा] मुहुः कुञ्जं प्रविशति; [तत्रापि त्वामपश्यन् कथं नागतेति] मुहुः (पुनःपुनः) गुञ्जन् (कथं नागता, किंवा पथि काचित् दुर्घटना जातेत्यादि अव्यक्तं वदन्) बहु (अत्यन्तं) ताम्यति (ग्लायति); [मयि बद्ध-दृढानुरागा सा साम्प्रतमेवा- गमिष्यतीति] मुहुः शय्यां रचयति; [मच्चित्त-जिज्ञासार्थं कदाचित् इतो निर्गता तिष्ठतीति मत्वा] मुहुश्च पर्याकुलं (परितः आकुलं यथा तथा) ईक्षते (पश्यति) [इत्थं] मदन-कदन-क्लान्तः (मदनस्य कदनेन पीडनेन क्लान्तः कातरः सन्) वर्त्तते ॥१॥