गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमः सर्गः—आकाङ्क्ष-पुण्डरीकाक्षः १९७ पद्यानुवाद— रैन सिरानी, पिय अभिमानी कर न सजनि! अब देरी। जाकर उनसे सत्वर मिल ले—इतनी अनुनय मेरी॥ बालबोधिनी—सखी कह रही है—श्रीकृष्ण बड़े मनस्वी हैं, लाक्षणिक अर्थ यह है कि श्रीकृष्ण अन्यमनस्क हो रहे हैं, तुम्हें मनानेके लिए अत्यन्त प्रयत्नशील हैं, तुम दूसरेके साथ उनके अभिसारकी चिन्ता मत करो। मनस्वीके संदर्भमें यह कथनीय है कि वे अपने स्वाभिमानकी सुरक्षाके लिए तुम्हारे पास तक नहीं आ सके, कहीं वे तुम्हारा त्याग न कर दें—'हरिरभिमानी, त्वत्तो लाघवं न सहते, पश्चात्त्वा त्यक्षति'। जो कार्य तुम्हें बादमें करना है, उसे अभी क्यों नहीं कर लेतीं? रात बीतती जा रही है। अभिसरणीय बेला समाप्त हो रही है। मेरी बात मानो, तुम श्रीकृष्णके पास सत्वर ही चलो और उनकी अभिलाषाएँ पूर्ण करो। श्रीजयदेवे कृत-हरि-सेवे भणति परमरमणीयम्। प्रमुदित-हृदयं हरिमितिसदयं नमत सुकृत-कमनीयम्॥ धीर समीरे यमुना तीरे... ॥८॥ अन्वय—कृत-हरि-सेवे (कृत्वा हरिसेवा येन तस्मिन्) श्रीजयदेव भणति [सति] [भोः साधवः] प्रमुदितः-हृदयं (प्रमुदितं हृदयं यथा तथा अथवा सदानन्द-चेतसं हरिम्) अतिसदयं (परमकृपालुं) परमरमणीयं (एकान्तमनोहरं) सुकृतकमनीयं (सुकृतेन शोभन-चरितेन कमनीयं; सर्वैर्विशेषेण वाञ्छनीयमित्यर्थः) हरिं [यूयं] नमत॥८॥ अनुवाद—हे साधुजन! परम मनोहर काव्य-रचयिता, श्रीहरि-सेवी जयदेवकृत इस गीतिसे प्रमुदित हृदय, अतिशय सदय, परम मधुर, शोभन-चरित तथा कमनीय गुणोंसे युक्त श्रीकृष्णको प्रमुदित हृदयसे नमस्कार करो।